अभी पिछले साल ही ( 2018) में पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में चुनाव हुए थे। पाकिस्तान में हुए उन चुनावों में सबकी नज़र कुछ खास सवालों के जवाब ढूंढ रही थी। पहला सवाल ये था, कि क्या इमरान खान क़ामयाब हो पाएंगे ? जिसका जवाब हमें बख़ूबी मिला और इमरान खान पाकिस्तान के सर्वोच्च पद पर पहुंच गए।

इन्हीं चुनावों में एक चीज़ और हुई कि पाकिस्तान के आतंकवादी संगठन जमातुद्दावा के सरगना हाफ़िज़ सईद ने एक पार्टी बनाई और मिल्ली मुस्लिम लीग और चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया। हाफ़िज़ सईद के अलावा एक काम और हुआ, वो ये कि धार्मिक आधार पर राजनीति करने वाली राजनीतिक पार्टियों ने गठबंधन करके चुनाव लड़ा। अब पूरी दुनिया के साथ हम भारतीयों की भी नज़र इस बात पर थी, कि धर्म के नाम पर भारत से अलग होकर एक अलग देश बने पाकिस्तान की जनता क्या धर्म के नाम पर राजनीति करने वालों को वोट देंगे ?

वहीं एक सवाल और भारी चर्चा में था, कि क्या पाकिस्तानी जनता हाफ़िज़ सईद जैसे व्यक्ति को राजनीतिक रूप से ऑक्सीजन देंगे। वह व्यक्ति जिस पर कई आतंकी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप है, क्या पाकिस्तानी जनता उस नेता की पार्टी को जितायेगी। जब नतीजे आये, तो हमारा वो दुश्मन पड़ौसी हमें चौंका गया। एक ऐसा शख्स जो मुसलमान- मुसलमान और इस्लाम-इस्लाम कहकर आतंकवाद को समर्थन करता था। उस आतंकी विचारधारा वाले व्यक्ति को दुश्मन देश की जनता नकार देती है।

अब हम हम इन्हीं चीज़ों को भारतीय परिपेक्ष्य में देखते हैं।

2019 का लोकसभा चुनाव चल रहा है, इस दौरान भोपाल से भारतीय जनता पार्टी ने मालेगांव ब्लास्ट की अभियुक्त  प्रज्ञा ठाकुर को अपना उम्मीदवार बनाया है, ज्ञात होकी प्रज्ञा ठाकुर ज़मानत पर बाहर है। अब देखना ये है, कि क्या भोपाल की बड़ी हिंदू आबादी आतंकी गतिविधियों में संलिप्तत रही प्रज्ञा ठाकुर को वोट देगी ?

यह सवाल इसलिये भी जायज़ है, क्योंकि पिछले कुछ सालों में हम कई बार ये देख चुके हैं, कि दंगे के आरोपियों और मुस्लिमों के ख़िलाफ़ बयान देने वाले नेताओं को अब हमारे देश की जनता सत्ता की चाबियां सौंप देती है। हमने ये भी देखा है, कि किस तरह मोब लिंचिंग के आरोपियों का केंद्रीय मंत्री माला पहनाकर सम्मान करते हैं। किस तरह अख़लाक़ के हत्यारे यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ मंच साझा करते हैं। इतना ही नही, देश का प्रधानमंत्री भी हिंदू-मुस्लिम और कब्रस्तान और श्मशान की बयानबाजी में व्यस्त दिखाई देता है।

पाकिस्तान को टोकते टोकते, उसी की तरह हो गए

याद करिये , उस समय को जब ऐसी ही हरकतों के लिए हम पाकिस्तान को टोका करते थे, धार्मिक आधार पर बने उस दुश्मन पड़ोसी को टोकते टोकते कब उसी की तरह व्यवहार करने लगे, पता ही नही चला।

अब वो कट्टरता और धर्म के नाम पर नफ़रत फ़ैलाने वालों को नकार रहे हैं, और हम उसी रंग में रंगते जा रहे है। आखिर क्यों ?

भारत और पाकिस्तान में एक चीज़ है कॉमन

दोनों ही मुल्कों ज़ुबान और कल्चर के अलावा एक चीज़ और कॉमन है, वो है आतंकवाद के आरोप में पकड़े गए वो आतंकी जिनको राजनीतिक रूप से संबंध अच्छे रहे हैं, और आरोप गंभीर रहे हैं। उन्हें पकड़ा तो जाता है, पर अदालतों में गवाह अपने बयान से पलट जाते हैं । और फ़िर वो आरोपी बरी हो जाते हैं। पाकिस्तान की अदालतों से हाफ़िज़ सईद का बच निकलना और भारतीय अदालतों से प्रज्ञा ठाकुर को ज़मानत मिलना, दोनों ही सत्ता के रहमो करम का नतीजा है।

पाकिस्तानी जनता ने तो आम चुनावों में हाफ़िज़ सईद को नकार दिया, अब बारी है हमारे देश की, क्या भोपाल की जनता ऐसे व्यक्तित्व को चुनेगी, जिसके ऊपर आतंक के आरोप थे और गवाहों ने गवाही भी दी थी। पर केंद्र में सत्ता परिवर्तन के बाद प्रज्ञा ठाकुर का केस कमज़ोर किया गया और फ़िर बरी और अब प्रज्ञा ठाकुर भाजपा की उम्मीदवार हैं। क्या देश का बहुसंख्यक हिंदू समाज आतंकी विचारधारा की महिला को नकारने का साहस दिखायेगी ?