संघ प्रमुख मोहन भागवत का भाषण चर्चा का विषय बना हुआ है। लोग उनके भाषण के निहितार्थ निकालने में लगे हैं। जिनका संघ के बारे में अध्ययन नहीं है, वे इसे संघ में बदलाव की संज्ञा दे रहे हैं। लेकिन न संघ बदला है, न ही कभी बदलेगा। दरअसल मोहन भागवत के भाषण को उसके पुराने आचरण से ही समझना होगा।

इतिहास गवाह है कि जब जब भी जनसंघ या बाद में भाजपा पर संकट मंडराया है, उसने अपना वादा और अपनी भाषा बदली है। आपको याद होगा कि जब सरदार पटेल ने संघ पर प्रतिबंध लगााया था तो यही लोग भाषा बदल कर पटेल और नेहरू के सामने गिड़गिड़ा कर भविष्य में राजनीति न करने की कसमें खाकर संघ से प्रतिबंध हटवाया था। 1971 भी याद होगा जब इंदिरा गांधी के साथ पूरा देश खड़ा था और पूरे देश में संघ की आवाज नहीं सुनी जा रही थी तो संघ के मूुखौटे अटल बिहारी वाजपेयी ने इंदिरागांधी को दुर्गा कह कर रास्ता बनाया था।

1975 के आपातकाल में गिरफ्तारी के बाद संघ प्रमुख देवरस किस प्रकार गिडिगिडाये थे, यह भी आप सबको याद होगा। 1984 को याद कीजिए जब इंदिरा के कत्ल के बाद पूरा संघ कांग्रेसी हो गया था। दिल्ली के सिखों के कत्लेआम में उसने कांग्रेस के बराबर हिस्सा लिया था। भागवत के ताजा बयान को उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

दरअसल संघ जब भी अपने राजनीतिक संगठन पर संकट देखता है तो वह कांग्रेस की चापलूसी में लग जाता है, ताकि कांग्रेस के राज में उसे किसी संकट का सामना न करना पड़े। मोहन भागवत का ताजा बयान इसी संकट में देखा जाना चााहिए। अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा की हालत कमजोर है। सो संघ प्रमुख ने पुराने नेताओं की नकल कर कांग्रेस को नर्म करने के लिए यह रूख अपनाया है। इसका मतलब यह नहीं कि भागवत साहब अपने पूर्व गुरुओं हेडगेवार, गोलवलकरकर व सावरकर की नीतियों से हट गये हैं।

दरअसल भागवत का संगठन जमीनी हकीकतों को जानता है। भागवत का ताजा बयान अगले चुनाव में भाजपा की संभावित पराजय को देख कर कांग्रेस से रियासतें पाने की एक चाल मात्र हैं। इसे इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। वरना भागवत वाकई यह मानते हैं कि मुसलमानों के बिना हिंदू राष्ट्र की कल्पना सच नहीं हो सकती तो ऐसे में उन्हें सार्वजनिक रूप से उन तीनों के विचारों से सार्वजनिक तौर से असहमति घोषित करनी होगी। वरना इसे मोहन भागवत की घिनौनी साजिश ही समझिए।