जिस जमीन पर टाइटिल सूट का विवाद है, वह तो अदालत के विचाराधीन है ही। पर जिस पर टाइटिल सूट का कोई विवाद नहीं है उस जमीन को अधिग्रहित करने के लिये सुप्रीम कोर्ट से पूछना क्यों जरूरी है ? पूछना इसलिए जरूरी है कि उसपर किसी भी प्रकार के स्थायी निर्माण पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक लगायी गयी है। वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत टंडन जी का यह कमेंट पढें,
” इस 67 एकड़ अधिग्रहित ज़मीन पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला मार्च 2003 का है जिसमे अदालत ने इस गैर विवादित ज़मीन पर कुछ भी निर्माण करने पर तब तक के लिए रोक लगा दी थी जब तक टाइटिल सूट पर फैसला नहीं हो जाता है. सरकार ने उस फैसले को संशोधित करने की अर्ज़ी लगाई है. ये ध्यान रहे ये सिर्फ अर्ज़ी है पिटीशन नहीं है.”

सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक लगाने का एक उद्देश्य यह भी है कि जब कभी विवादित भूखंड का फैसला हो तो वहां चाहे मस्ज़िद बने या मंदिर, जो भी बने उसके आवागमन हेतु मार्ग की व्यवस्था इसी 67 एकड़ भूखंड द्वारा की जा सके। इस भूखंड पर खाली प्लॉट्स, मानस भवन, सीता रसोई जैसे कई छोटी बड़ी धर्मशालाएं और मंदिर तथा दरगाहें और कब्रिस्तान भी बने हैं। मंदिर और धर्मशालाएं, वहां स्थित पीएसी और सीआरपीएफ के लिये अस्थायी कैंप बना दिये गए हैं, और खाली ज़मीनें सुरक्षा के विभिन्न घेरों में आ गयी हैं। अब यहां सिवाय पुलिस के कोई अन्य गतिविधियां नहीं चल रही है।

अगर यह ज़मीन जिसकी है उसे वापस कर दीं जाती है तो पहले वे ज़मीनें जिसे वापस की जाएंगी उससे राम जन्मभूमि न्यास या जो भी ट्रस्ट मंदिर बनाएगा वापस लेगा और तब इसपर आगे का काम बढ़ेगा। जो खाली प्लॉट्स पड़े हैं, वे चाहे हिँदू के हों या मुस्लिम के वे न्यास को मिल भी जाएंगे और उसमें कोई विशेष कठिनाई नहीं आएगी। पर दरगाहें, और क़ब्रिस्तान समस्या बन जाएंगे,  और फिर नए विवाद खड़े हो सकते हैं। जो भवन जैसे मानस मंदिर, सीता रसोई आदि हैं उन्हें तो तोड़ा जा सकता है और ज़मीन खाली कराई जा सकती है। लेकिन, सरकार के इस प्रार्थनापत्र का अदालत में विरोध भी विरोधी पक्ष करेगा। अब इस पर क्या तर्क और कानूनी विंदु उठते हैं, यह तो अदालत में जब मामला आये तो पता चले।

जिस जमीन पर विवाद है,  वह है, 2.77 एकड़ का भूखंड जिसका एक हिस्सा निर्मोही अखाड़ा को, दूसरा राम लला बिराजमान को ( यह वाद बाद में दायर हुआ था जिसे जस्टिस लोढ़ा ने रामलला को पक्ष बनाकर दायर किया था ) और तीसरा हिस्सा वक़्फ़ बोर्ड को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिया था, जिसकी अपील इस समय सुप्रीम कोर्ट में चल रही है। इसके अतिरिक्त और किसी ज़मीन पर बंदिश नहीं है। सरकार उसे अधिग्रहित कर सकती है। पर सरकार जिस जमीन पर विवाद नहीं है उसके अधिग्रहण के बारे में सुप्रीम कोर्ट से क्यो पूछ रही है ? और जो आज पूछा जा रहा है, वह एक एसएलपी के द्वारा क्यों नहीं पूछा जा रहा है ?

सरकार मंदिर मसले के हल के लिए न तो गम्भीर है और न ही इच्छुक। वह इस मामले को बस राजनीतिक लाभ और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के उद्देश्य से जिंदा बनाये रखना चाहती है ताकि इस मसले के आड़ में वह अपनी राजनैतिक प्रासंगिकता तमाम, न पूरे किये गए वायदों पर उठते सवालों के बीच बनाये रख सके। नरसिम्हा राव की सरकार ने उक्त भूमि के अधिग्रहण और एक अध्यादेश लाने का इरादा 1992 में किया था, पर उसे सबसे अधिक विरोध भाजपा का ही झेलना पड़ा था । विश्वास कीजिये, न तो यह सरकार मन्दिर बनाने का कोई प्रयास करेगी और न ही किसी अन्य को करने देगी। इस मसले का हल भाजपा के अंत की घोषणा होगी।

पहले कहा गया कि केंद्र में जब भाजपा सरकार में आएगी तो यह मसला हल हो जाएगा यानी मंदिर बन जायेगा। केंद्र में सरकार 1998 से 2004 तक रही, कोई भी प्रयास सरकार द्वारा मामला हल करने के लिये नहीं हुआ।

फिर कहा गया कि, एनडीए में तमाम दल थे, जब अपने दम पर भाजपा सत्ता में आएगी तो राम मन्दिर बनेगा। 2014 में 282 सीट अपने दम पर भाजपा लायी और सरकार बनी। 2014 से अब जब चलाचली की बेला आ गयी तब भी क्या प्रयास किया गया ? कुछ नहीं हुआ।

फिर कहा गया कि जब केंद्र और राज्य में दोनों जगह भाजपा की सरकार आएगी तो मंदिर बनेगा। 2016 में राज्य में अकेले भाजपा की सरकार आ गयी और मुख्यमंत्री भी मंदिर आंदोलन से जुड़े महंत योगी आदित्यनाथ बन गए। पर 2016 से अब तक कुछ भी सार्थक नहीं हुआ। क्यो।

राम से भाजपा के लोग जो जो मांगते गये राम इन्हें वह सब देते गये। पर अहंकार और दर्प इतना कि राम भक्त हनुमान को दलित, आदिवासी, जाट मुसलमान न जाने क्या क्या बना दिया। राम तो टेंट में हैं ही। जब सरकार बनी तो अंबानी भाइयों की संपत्ति बढ़ी, अनिल अंबानी को बिना ज़मीन के,  ठेका मिला, चहेते पूंजीपतियों के काम के लिये सरकार, दुनियाभर में नगरी नगरी द्वारे द्वारे फिरती रही। मंदिर मुद्दे पर वही ढाक के तीन पात।  राम 1992 से टेंट में बैठने के लिये इसलिए अभिशप्त हैं कि इन्ही अधार्मिक या छद्म रामभक्तों ने उनका, जैसा भी था,  मंदिर गिरा दिया और फिर उनके दर्शन के लिये सरकार का कोई जिम्मेदार व्यक्ति नहीं गया। और न ही अदालत से जल्दी सुनवायी का कोई प्रयास ही किया गया।

आपसी सहमति बनाने की बात तो इनके एजेंडे में ही नहीं है, बल्कि एजेंडा ही यह है कि आपसी तनाव बना रहे । झगड़ा हो, दंगे हों और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण हो। आज तक दस्तावेजों का जो फारसी, उर्दू, हिंदी में हैं और विपुल मात्रा में हैं का अंग्रेजी अनुवाद नहीं हो सका। जबकि यह मामला हल हो इसके लिये पहले चंद्रशेखर जब प्रधानमंत्री थे तो अयोध्या प्रकोष्ठ बना था। अब है या नही यह नही पता। यह प्रकोष्ठ ही इसलिए बना था कि यह न केवल अदालत में पैरवी करे बल्कि आपसी सहमति का भी मार्ग ढूंढे।

दरअसल, अब अपनी नाकामी और मंदिर मुद्दे पर उदासीनता का ठीकरा संघ औऱ भाजपा के लोग सुप्रीम कोर्ट पर फोड़ना चाहते हैं। अगर आप इधर हाल में मीडिया में आये, अमित शाह, नरेंद्र मोदी, आरएसएस के भैय्यू जी जोशी, और अब इंद्रेश कुमार के बयानों पर गौर करें तो आप मुझसे सहमत होंगे कि अब इस गिरोह का निशाना सुप्रीम कोर्ट है । अमित शाह ने कहा, कि अदालत को वह फैसले देने चाहिये जो लागू किये जा सके। नरेंद्र मोदी ने कहा कि जनभावनाओं के अनुरूप अदालतों को अपने निर्णय देने चाहिये। भैय्यू जी जोशी ने कहा, कि सुप्रीम कोर्ट मंदिर मामले पर जनभावना समझे। अब इंद्रेश कुमार का बयान आया है कि लोग अदालत और जजों पर राम मंदिर मुक़दमे में फैसले के लिये दबाव डालें। योगी आदित्यनाथ का यह बयान भी आप की नज़र से गुजरा होगा, जिसमे उन्होनें कहा है कि अदालत फैसले न कर सके तो वे चौबीस घन्टे में यह मसला हल कर सकते हैं।

मैं इस बात को कि इन बयानों से अदालत की मानहानि होती है या नहीं, अदालत के ऊपर ही छोड़ता हूँ, पर इन सब बयानों से एक बात बिल्कुल साफ है कि, संघ और भाजपा को यह एहसास होने लगा है कि उनकी मिथ्या राम भक्ति की पोल खुलने लगी है। जैसे जैसे ये बयान आये वैसे वैसे ही भाजपा आईटी सेल और उनके कट्टर समर्थकों और सच्चे हिन्दू का स्वयंभू मेडल धारण किये लोग, अदालती कार्यवाही पर, तारीख पर तारीख और अन्य तल्ख व्यंग्यात्मक टिप्पणियां सोशल मीडिया पर साझा करने लगे जिससे लोगों में यह धारणा बने कि सरकार तो चाहती है कि मंदिर आज ही बने पर अदालत इसे लटकाये हुये है। अदालत के विरुद्ध धरना प्रदर्शन आदि तो हो नहीं सकता तो यही एक उपयुक्त बहाना है जो आज उछाला जा सकता है।

अगर कानूनन सुप्रीम कोर्ट की अनुमति ज़रूरी है तो यह अनुरोध की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट से 2014 के बाद ही की जा सकती थी। पर अब जब एक महीने के बाद चुनाव की अधिसूचना जारी होनी है और आचार संहिता के लागू होते ही तमाम प्रतिबंध लग जाने हैं तो इस समय इस तमाशे का क्या औचित्य है ? यह हड़बड़ाहट, केवल एक भोजपुरी कहावत से समझी जा सकती है, कि दुआरे आइल बरात….. !

© विजय शंकर सिंह

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