जिस घर की दीवार कमजोर हो जाए उसे मामूली सी हवा का झोंका भी हिला देता है, ऐसा कहा जाता है या जिस किसी भी घर में दीमक लग जाए ‘उस घर की दीवार खोखली हो जाती है।  हालांकि यह कहावतें ही है लेकिन सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता, वर्तमान राजनीति के परिदृश्य में ऐसा ही देखा जा रहा है और खास तौर से कांग्रेस पार्टी में कांग्रेस अपने एक तूफान से उबर नहीं पाती कि दूसरा सामने आकर खड़ा हो जाता है। पहले मध्य प्रदेश की राजनीति में एसा तूफानी चक्रवात आया जिस ने कमलनाथ की सरकार को उखाड़ कर फेंक दिया, फिर वही तूफान राजस्थान की सर जमीन पर भी देखा गया लेकिन अशोक गहलोत की चाक-चौबंद किले बंदी ने उस तूफान से अपने आप को बचा लिया ।
अभी उस तूफान की सरसराहट थमी नहीं थी, कि एक और नया तूफान कांग्रेस की पृष्ठभूमि में घूमने लगा, वह किसी दूसरे का खड़ा किया हुआ तूफान नहीं बल्कि खुद कांग्रेस की सरजमी से पैदा हुआ चक्रवात है।
मामला अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठने या बैठाने का है, बस उसी बात को लेकर कांग्रेस के 23 नेताओं ने आलाकमान को चिट्ठी लिखी जिसमें कहा गया बेहतर होता कांग्रेस का स्थाई नेतृत्व तय कर लिया जाता । बस बवाल हो गया, गांधी परिवार के कुछ खास लोगों ने सोनिया जी के तबीयत को लेकर इस समय खड़ा किया वबाल बल्कि यूं कहें कि लिखी हुई चिट्ठी को मुद्दा बनाया। कि इस समय हालात यह नहीं कहते कि कांग्रेस पार्टी में अंदरूनी कलह हो और अध्यक्ष की कुर्सी को लेकर कोई वाद विवाद बने।
सुना गया कि राहुल गांधी ने इस मामले में कहा कि चिट्ठी लिखने वाले बीजेपी से मिले हुए हैं, मामले ने इतना तूल पकड़ा की देश के कोने कोने तक इसी बात पर चर्चाएं होने लगी l बाद में गुलाम नबी आजाद के ट्वीट आए कि यह साबित हो जाता है, हम बीजेपी के मिले हुए हैं तो मैं राजनीति छोड़ दूंगा l बाद में कपिल सिब्बल ने ट्वीट करके अपने ट्वीट को वापस लेते हुए कहा, कि राहुल जी से मेरी बात हुई और उन्होंने कहा कि मैंने ऐसा कुछ नहीं कहा है।

इस पर एक बड़े वर्ग का कहना है कि अगर बात कांग्रेस के घर के अंदर की थी, तो ऐसा माहौल बाहर आकर नहीं बनाया जाना चाहिए था, कि कांग्रेस की जिससे थू थू जग जाहिर होने लगे l क्योंकि इस समय सत्तासीन पार्टी यह चाहती है, कि कांग्रेस सफा ए हस्ती से मिट जाए l बल्कि यूं कहें कि आज के दौर में हर सत्तासीन पार्टी चाहती है, उसके विपक्ष में रहने वाली पार्टी नेस्ट नाबूत और बर्बाद हो जाए। वह दौर कुछ और था जब सत्ता में बैठने वाले यह चाहते थे, कि एक ऊंचे व्यक्तित्व का धनी व्यक्ति विपक्ष के गलियारे पर बैठे और सत्ता से सवाल करे  और सत्ता उसके सवालों पर चल कर अपनी राह ठीक करे l  वक्त बदलता गया और नए-नए उतार-चढ़ाव आते गए।

हालांकि कांग्रेस का यह दौर नया नहीं है, बाबू जगजीवन राम से लेकर वीपी सिंह अर्जुन सिंह माधवराव सिंधिया शरद पवार तक कई नेताओं के ऐसे हाल देखे गए l हालांकि उस समय कांग्रेस एक मजबूत हाथ में होती थी, जबकि आज ऐसा वक्त नहीं है। आज कांग्रेस आज जिन हाथों में है वह मजबूत नहीं कहलाते है ।

आगे पीछे समय पर नजर दौड़ाई जाए तो यह बात भी सामने आती है कि राहुल गांधी भी कांग्रेस का नेतृत्व कर चुके हैं। यह अलग बात है कि लोकसभा के चुनाव के रिजल्ट आने के बाद राहुल ने अपनी मर्जी से अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया था और लाख मान मनोबल के बाद भी वे अध्यक्ष बनने को तैयार नहीं हुए। जिसकी वजह से सोनिया जी को अंतरिम अध्यक्ष की बागडोर संभालने मजबूर होना पड़ा l वहींकांग्रेस का एक खेमा आज भी कांग्रेस के नेतृत्व के लिए गांधी परिवार को ही बेहतर मानता है । यह अलग बात है कि राहुल गांधी बार बार कह चुके हैं, कि मैं या मेरे परिवार का कोई भी व्यक्ति कांग्रेस का अध्यक्ष नहीं बनना चाहता है । अब सवाल यह उठता है कि अगर यह सत्य है की गांधी परिवार का कोई भी व्यक्ति अध्यक्ष नहीं बनना चाहता तो फिर कांग्रेस के नेताओं द्वारा लिखी गई चिट्ठी पर बवाल क्यों खड़ा किया गया ।

इस तरह के उतार-चढ़ाव और राजनीति के दो राहे पर सिर्फ कांग्रेस ही आकर खड़ी होती है, ऐसा नहीं है। बीजेपी में भी कई बड़े-बड़े दिग्गजों को पार्टी से बाहर जाना पड़ा जिसमें शत्रुघ्न सिन्हा, यशवंत सिन्हा, नवजोत सिंह सिद्धू, उमा भारती और कल्याण सिंह जैसे नेता भी रहे हैं। यह और बात है कि इसमें कुछ फिर वापस आकर पार्टी में समा गए ।

अपने तजुर्बे के हिसाब से आज जो राजनीति का दौर है, इससे पहले ऐसा कभी नहीं रहा। जहां जरा जरा सी बात में लोग पार्टी फोरम से बाहर आकर मीडिया और अखबारों की सुर्खी बने और देश हित की बात और जनहित की बात को दरकिनार कर लोग इसी फालतू बकवास में आपस में लगे रहे ।

वर्तमान में देश जिन हालातों से गुजर रहा है, उन हालातों को मद्देनजर रखते हुए यहां सत्ता को भी गंभीरता से सोचने और विपक्ष को भी गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है और इन दोनों को आईना दिखाने के लिए मीडिया है, लेकिन अफसोस यह दोनों अपनी जिम्मेदारी से गाफ़िल तो है ही मीडिया भी आज अपनी जिम्मेदारी छोड़ कर स्वार्थ सिद्धि में लगकर सत्ता की चाटुकारिता के ही गुणगान गाता नजर आता है ।  ऐसा नहीं है कि पूरा का पूरा मीडिया उसी स्वार्थ सिद्धि की राह पर चल पड़ा हो जिसमें कुछ बड़े बड़े मीडिया घराने चलते हुए नजर आते हैं, हो सकता है देर सबेर उन मीडिया घरानों को भी समझ आ जाए और वह स्वार्थ सिद्धि के मकड़जाल से निकलकर देशहित और जनहित में सामने आकर अपनी आवाज बुलंद करने लगें। हालांकि हर घनघोर अंधेरे के बाद लाज़िम है कि उजाले की किरण दिखे ।