नाम था अकबर हुसैन रिज़वी। जज थे। शायर हुए तो लोग कहने लगे अकबर ‘इलाहाबादी।’ और फिर अकबर को ‘इलाहाबादी’ कहलाना इतना पसंद आया कि इस शहर की पहचान खुद अकबर बन गए। 16 नवंबर 1846 की पैदाइश थी। मने पहली जंगे आज़ादी से एक दशक पहले ही जन्म हो गया था। आज हैप्पी बड्डे है बड़े मियाँ का।
अकबर व्यंग बिल्कुल इलाहाबादी अंदाज़ में किया करते थे। उस वक्त का एक क़िस्सा मशहूर है। हुआ कुछ यूं था कि ‘कलकत्ता की मशहूर गायिका गौहर जान एक मर्तबा इलाहाबाद गई और जानकी-बाई तवाइफ़ के मकान पर ठहरी। जब गौहर जान रुख़्सत होने लगी तो अपनी मेज़बान से कहा कि “मेरा दिल ख़ान बहादुर सय्यद अकबर इलाहाबादी से मिलने को बहुत चाहता है।” जानकी-बाई ने कहा कि “आज मैं वक़्त मुक़र्रर करलूंगी, कल चलेंगे।” चुनांचे दूसरे दिन दोनों अकबर इलाहाबादी के हाँ पहुँचीं।
जानकी-बाई ने तआ’रुफ़ कराया और कहा ये कलकत्ता की निहायत मशहूर-ओ-मा’रूफ़ गायिका गौहर जान हैं। आपसे मिलने का बेहद इश्तियाक़ था, लिहाज़ा इनको आपसे मिलाने लायी हूँ। अकबर ने कहा, “ज़ह-ए-नसीब, वर्ना मैं न नबी हूँ न इमाम, न ग़ौस, न क़ुतुब और न कोई वली जो क़ाबिल-ए-ज़यारत ख़्याल किया जाऊं। पहले जज था अब रिटायर हो कर सिर्फ अकबर रह गया हूँ। हैरान हूँ कि आपकी ख़िदमत में क्या तोहफ़ा पेश करूँ। ख़ैर एक शे’र बतौर यादगार लिखे देता हूँ।” ये कह कर मुंदरजा ज़ैल शे’र एक काग़ज़ पर लिखा और गौहर जान के हवाले किया।

ख़ुशनसीब आज भला कौन है गौहर के सिवा,
सब कुछ अल्लाह ने दे रखा है शौहर के सिवा।

अकबर इलहाबादी ने अपनी इबतेदाई तालीम सरकारी स्कूल में हासिल की थी। 1869 में तहसीलदार बन गए तो 1894 में जज बनने का शर्फ़ हासिल हुआ। 1898 में अकबर इलहबादी को खान बहादुर का खिताब मिला। उन्होंने 1857 की पहली जंगे आज़ादी और महात्मा गांधी के अहिंसा आंदोलन का शुरुआती हिस्सा देखा था। सन 1921 में उसी शहर से दुनिया को अलविदा कह दिया, जहां अकबर हुसैन रिज़वी पैदा हुए और अकबर इलाहाबादी बने।