असम की एनआरसी से एक बड़ा कानूनी सवाल उठ खड़ा हुआ है कि किसी व्यक्ति को कैसे देश का वैध नागरिक माना जाय। वे कौन से दस्तावेज हैं जो किसी व्यक्ति की नागरिकता प्रमाणित करते हैं ? यह सवाल और भी अनेक तरह के भ्रम उत्पन्न कर रहा है जिससे लोगों मे असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो गयी है।

असम में विदेशी घुसपैठियों की समस्या से निपटने के लिये सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर एक नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिज़न एनआरसी बनाने की बात की गई। 1600 करोड़ रुपये के भारी भरकम बजट से केवल एक राज्य में एनआरसी की कवायद शुरू हुयी। असम विदेशी घुसपैठ की समस्या से सबसे पीड़ित राज्य है और अपनी भाषा, संस्कृति और पहचान को लेकर संवेदनशील भी है। यह संवेदनशीलता न केवल असम मे है बल्कि यह पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में है। इसका कारण उनका कबीलाई संस्कृति और आटविक क्षेत्रो का होना भी है।

एक लंबे आंदोलन के बाद 1985 मे जब राजीव गांधी और असम आंदोलन के नेताओ के बीच समझौता हुआ तो निम्न मुख्य बातें तय हुयी।  15 अगस्त 1985 को केंद्र सरकार और आंदोलनकारियों के बीच समझौता हुआ जिसे असम समझौते के नाम से जाना जाता है।

असम समझौते के अनुसार

  • 25 मार्च, 1971 के बाद असम में आए सभी बांग्लादेशी नागरिकों को यहाँ से जाना होगा, चाहे वे हिंदू हों या मुसलमान।
  • 1951 से 1961 के बीच असम आए सभी लोगों को पूर्ण नागरिकता और मतदान का अधिकार देने का फैसला लिया गया।
  • 1961 से 1971 के बीच असम आने वाले लोगों को नागरिकता तथा अन्य अधिकार दिये गए, लेकिन उन्हें मतदान का अधिकार नहीं दिया गया।
  • इस समझौते का पैरा 8 कहता है कि 25 मार्च, 1971 या उसके बाद असम में आने वाले विदेशियों को कानून के अनुसार निष्कासित किया जाएगा। ऐसे विदेशियों को बाहर निकालने के लिये तात्कालिक एवं व्यावहारिक कदम उठाए जाएंगे।
  • इस समझौते में असम के आर्थिक विकास के लिये पैकेज भी दिया गया तथा असमिया भाषी लोगों की सांस्कृतिक, सामाजिक और भाषायी पहचान सुरक्षित रखने के लिये विशेष कानूनी और प्रशासनिक उपाय किये गए।
  • असम समझौते के आधार पर मतदाता सूची में भी संशोधन किया गया।

इस सब के बाद असम में एनआरसी की प्रक्रिया पूरी हुयी, और जब अंतिम सूची प्रकाशित हुयी तो 19 लाख लोगों के नाम उस सूची में नहीं आ पाए। अब ये 19 लाख लोग प्रथम दृष्टया देश के नागरिक नहीं माने गए। अब इनका क्या किया जाय, यह एक जटिल सवाल सभी के सामने आ खड़ा हुआ। अगर ये देश के नागरिक नहीं हैं और अवैध घुसपैठ करके देश मे आये हैं तो इनको उनके देश वापस भेजा जाय, या जब तक वापस नहीं भेजे जाते, इन्हें डिटेंशन सेंटर में रखा जाय, यही दो मुख्य विकल्प हैं। अभी सरकार ने इनको इनके देश मे भेजने के बारे में कोई फैसला नहीं किया है। असम में कुछ डिटेंशन सेंटर बने हैं, जिसमे कुछ ऐसे लोग ज़रूर रखे गए हैं। उधर अवैध घुसपैठ के लगातार लगते आरोप को बांग्लादेश ने गंभीरता से लिया और अपनी आपत्ति दर्ज करायी और कहा कि, उसे बताया जाय कि कितने अवैध घुसपैठिये बांग्लादेश से है, उनकी सूची दी जाय, वह अपने नागरिकों को वापस लेने को तैयार है। इस पर भारत सरकार की तरफ से कोई प्रतिक्रिया अभी तक नहीं आयी है।

एनआरसी में भी कई गंभीर अनियमितताएं सामने आ रही हैं। ऐसे नागरिकों के भी नाम उक्त रजिस्टर में नहीं आ पाए हैं जो जीवन भर सेना, सुरक्षा बल या सरकारी नौकरी में रहे हैं। एक ही परिवार के कुछ सदस्यों के नाम हैं तो कुछ के नाम नहीं है। यह तो एक सामान्य सोच की बात है कि आखिर एक ही परिवार में एक व्यक्ति नागरिक हो और दूसरा घुसपैठ करके आया हो। ऐसी अनियमितताओं से निपटने के लिये विदेशी नागरिक ट्रिब्यूनल और उसके बाद, हाईकोर्ट तथा अंत मे सुप्रीम कोर्ट तक अपील करके अपनी नागरिकता सिद्ध करने का विकल्प सरकार ने दिया है। लोग इस न्यायिक विकल्प का मार्ग भी चुन रहे है।

अभी हाल ही में अपने एक निर्णय में गुआहाटी हाईकोर्ट ने यह बताया है कि आधार कार्ड, बैंक दस्तावेज, भूमि राजस्व की रसीद से किसी व्यक्ति की नागरिकता साबित नहीं हो सकती है। पैन कार्ड और बैंक दस्तावेजों पर याचिकाकर्ता की निर्भरता को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया और कहा,

“भारत में यह मामला बाबुल इस्लाम बनाम भारत संघ [WP(C)/3547/2016] में पहले ही आयोजित किया जा चुका है कि पैन कार्ड और बैंक दस्तावेज़ नागरिकता का प्रमाण नहीं हैं।”

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने कहा है कि

” भूमि राजस्व (Land Revenue) के भुगतान की रसीद के आधार पर किसी व्यक्ति की नागरिकता साबित नहीं होती है। साथ ही, पैन  कार्ड और बैंक दस्तावेज़ भी नागरिकता साबित नहीं करते हैं। “

न्यायमूर्ति मनोजीत भुयान और न्यायमूर्ति पार्थिवज्योति सैकिया की पीठ ने विदेशी ट्रिब्यूनल, बक्सा के आदेश के खिलाफ ज़ुबैदा बेगम द्वारा दायर रिट याचिका को खारिज करते हुए ये टिप्पणियां कीं। इस आदेश में ज़ुबैदा बेगम को 1971 के घटनाक्रम के परिपेक्ष्य में विदेशी घोषित किया गया था।

पुलिस अधीक्षक (बी) के एक संदर्भ के आधार पर विदेशी ट्रिब्यूनल, बक्सा, तामुलपुर, असम ने याचिकाकर्ता को नोटिस जारी कर उसे भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए कहा था।ट्रिब्यूनल से पहले, उसने कहा कि उसके माता-पिता के नाम 1966 की वोटर लिस्ट में थे। उसने दावा किया कि उसके दादा-दादी के नाम भी 1966 की वोटर लिस्ट में दिखाई दिए थे। याचिकाकर्ता ने आगे कहा कि सन 1970 और सन 1997 की मतदाता सूची भी में भी उसके पिता का नाम था।

ट्रिब्यूनल ने पाया कि याचिकाकर्ता अपने अनुमानित माता-पिता के साथ संबंध दिखाने वाला कोई भी दस्तावेज पेश नहीं कर सकी। हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के इन निष्कर्षों से सहमति व्यक्त की।

इस फैसले में कहा गया था कि समर्थित साक्ष्य के अभाव में केवल एक मतदान फोटो पहचान पत्र प्रस्तुत करना नागरिकता का प्रमाण नहीं होगा।

यह भी पाया गया कि याचिकाकर्ता अपने अनुमानित भाई के साथ संबंध दिखाते हुए दस्तावेज पेश नहीं कर सकी, जिसका नाम 2015 की मतदाता सूची में दिखाई दिया था। कोर्ट ने कहा कि गांव बूरा द्वारा जारी प्रमाण पत्र किसी व्यक्ति की नागरिकता का प्रमाण नहीं हो सकता।

इन निष्कर्षों पर हाईकोर्ट ने रिट याचिका को खारिज कर दिया और कहा

“हम पाते हैं कि ट्रिब्यूनल ने इससे पहले रखे गए साक्ष्यों की सही ढंग से सराहना की है और हम ट्रिब्यूनल के निर्णय में व्यापकता देख सकते हैं। यही स्थिति होने के नाते, हम इस बात को दोहराएंगे कि याचिकाकर्ता अपने अनुमानित माता-पिता और उसके अनुमानित भाई के साथ संबंध को साबित करने में विफल रही, इसलिए, हम पाते हैं कि यह रिट याचिका योग्यता रहित है और उसी के अनुसार, हम इसे खारिज करते हैं।”

अब एनआरसी के नागरिक पहचानो अभियान के एक क्लासिक उदाहरण को देखें। यह उदाहरण है असम के बक्सा जिले के तमुलपुर गांव की जावीदा का। दरअसल असम के बक्सा जिले के तमुलपुर के गुवाहारी गांव की रहने वाली जाबीदा बेगम उर्फ जाबीदा खातून का नाम एनआरसी लिस्ट से बाहर हो गया था। मई 2019 में फॉरेन ट्रिब्यूनल द्वारा उन्हें विदेशी घोषित कर दिया गया था। जाबीदा ने खुद को भारतीय साबित करने के लिए निम्न दस्तावेज गुवाहाटी हाईकोर्ट के समक्ष पेश किए थे।

  • पैन कार्ड
  • वोटर आईडी कार्ड
  • भू राजस्व, लगान की रसीद
  • वर्ष 1966 की मतदाता सूची जिसमे उनके दादा दादी का नाम था।
  • वर्ष 1970 की मतदाता सूची, जिसमें उनके माता पिता का नाम था।
  • ग्राम प्रधान द्वारा दिया गया निवास प्रमाण पत्र।
  • राशन कार्ड।
  • बैंक की पासबुक।

अब उनसे इन सब दस्तावेज़ों के बाद यह कहा गया कि अपने माता पिता की जन्मतिथि प्रमाणपत्र प्रस्तुत करें। पर यह दस्तावेज वह पेश नहीं कर पायी और उनकी नागरिकता की अपील खारिज हो गयी। लेकिन हाईकोर्ट के फैसले के अनुसार, वह “अपने कथित माता-पिता और भाई-बहन के साथ संबंध साबित करने में विफल रही।” असम में भारतीय नागरिक माने जाने के लिए, उन्हें यह साबित करना होगा कि वह या उनके पूर्वज 1971 से पहले असम में रह रहे हैं।

इसी संदर्भ में एक और अदालती फैसले की चर्चा करते हैं। यह मामला महाराष्ट्र के मुंबई का है। अवैध बांग्लादेश से आने के आरोप पर वर्ष 2017 में मुम्बई पुलिस ने अब्बास शेख और राबिया शेख के खिलाफ मुंबई के मैजिस्ट्रेट कोर्ट में एक मुक़दमा दायर किया। अपनी नागरिकता के सुबूत के रूप में अब्बास ने अपने राशनकार्ड की मूल प्रति दाखिल की। अदालत ने सुनवाई के बाद कहा कि,

” एक जन्म प्रमाणपत्र, डोमिसाइल या अधिवासी प्रमाणपत्र और एक पासपोर्ट को किसी की नागरिकता प्रमाणित करने के लिये पर्याप्त दस्तावेज हैं। यहां तक कि एक वोटर आईडी कार्ड भी नागरिकता का सुबूत हो सकता है। क्योंकि जब भी कोई व्यक्ति वोटर आईडी कार्ड के लिये आवेदन करता है तो वह, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के अंतर्गत घोषणापत्र देता है।

लेकिन मुम्बई के मैजिस्ट्रेट कोर्ट के फैसले और असम हाईकोर्ट के फैसले में जो विरोधाभास है उसका निराकरण सरकार एनआरसी के बारे में एक युक्तियुक्त नियमावली बना कर कर सकती है या फिर यह मामले सुप्रीम कोर्ट में जाएँ तो सुप्रीम कोर्ट का क्या दृष्टिकोण होता है, उसे देखना होगा। अभी एनआरसी का जो मॉडल देश के सामने है वह असम के अनुभवों के आधार पर है और असम के अनुभव न केवल से यही यह सवाल उठ खड़ा होता है कि आखिर वे कौन से दस्तावेज हैं जिनसे किसी की नागरिकता प्रमाणित होती है ?

गृहमंत्री अपने एक बयान में कहते हैं कि आधार कार्ड और वोटर आईडी कार्ड नागरिकता का प्रमाण नहीं है। अदालत उपरोक्त दस्तावेजों को भी प्रमाण नहीं मानता है। अपने माता पिता के जन्म प्रमाणपत्र तो संभवतः बहुतों के पास न हों। खुद मेरे पास भी नहीं है। अभी असम के एनआरसी का यह हाल है कि वहां इसे लेकर चारो ओर भ्रम, आक्रोश और अफरातफरी फैली है। जब यही कवायद पूरे देश मे होगी तो क्या होगा, इसका अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है।

© विजय शंकर सिंह