अयोध्या मामला भले ही कानूनी रूप से एक भूमि के टाइटिल सूट का मामला हो, पर यह एक टाइटिल सूट का मामला होते हुए भी बहुत ही संवेदनशील मामला है। इसका एक और सर्वमान्य हल मध्यस्थता भी है। सुप्रीम कोर्ट ने इस समाधान को भी आजमाने के लिए सुनवायी की और 8 मार्च को इसी विंदु पर अपना निर्णय देने जा रही है। इसके साथ ही विवादित स्थल पर हिंदुओं को प्रार्थना पूजा के लिये अनुमति देने की डॉ सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका पर भी सुप्रीम कोर्ट 8 मार्च को ही अपना फैसला सुनाएगी।

मध्यस्थता के विचार का सुझाव 26 फरवरी के सुनवायी के दिन, संविधान पीठ के एक जज जस्टिस एसए बोबडे ने दिया था। उसी आधार पर पीठ ने सभी पक्षकारों से पूछा था कि क्या वे मध्यस्थता के लिये राजी हैं। 6 मार्च को जब सुनवायी हुयी तो, मुस्लिम पक्ष जिसमे सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड भी है ने कहा कि वे मध्यस्थता के प्रयास के लिये सहमत हैं।

हालांकि हिन्दू पक्ष जिनमे रामलला विराजमान के याचिकाकर्ता भी हैं ने इस प्रस्ताव पर आपत्ति की और कहा कि यह एक सामान्य भूमि के टाइटिल सूट का मामला नहीं है, और जन मानस हो सकता है मध्यस्थता के विचार और निर्णय से सहमत न हो।

उभय पक्षों का यही दृष्टिभेद सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मध्यस्थता का आदेश पारित करने के समय बाधा बन सकता है। मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने कहा है कि मध्यस्थता पर विचार किया जा सकता है क्योंकि भूमि विवाद के न्यायिक समाधान के पूर्व आपसी बात चीत से एक समझौते का मार्ग ढूंढने में कोई हर्ज और वैधानिक बाधा नहीं है।

यूपी के एडवोकेट सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मध्यस्थता का निर्णय जजों को तभी लेना चाहिये जब वे आश्वस्त हों कि इस समस्या का समाधान निकल सकता है। हालांकि कि तुषार मेहता के इस बात का राजीव धवन ने विरोध किया कि उत्तरप्रदेश सरकार इस मामले में कोई पक्ष नहीं है और वह कह चुकी है कि वह इस मामले से दूर रहेगी।

हिन्दू पक्ष का कहना है कि मध्यस्थता में कौन कौन पक्ष सम्मिलित होगा और पंच कौन बनेगा को लेकर भी आमराय बनानी मुश्किल होगी। क्योंकि बहुत से धर्मिक संगठन अपनी अपनी बात कहना चाहेंगे। इस पक्ष का यह भी कहना है कि मध्यस्थता के बाद आने वाला फैसला बाध्यकारी नहीं होता है। अतः पुनः विवाद उठ सकता है। अगर ऐसा हुआ तो यह सारा प्रयास निष्फल हो जाएगा।

उन्होंने यह भी कहा एक आम नोटिस जारी कर के जनता के सभी वर्गों को इस मध्यस्थता की सूचना देनी होगी ताकि लोग अपनी अपनी बात कह सकें। हालांकि इससे मध्यस्थता का कार्य और भी जटिल हो जाएगा। फिर भी उभय पक्ष ने यह कहा कि एक मध्यस्थ या मध्यस्थों के कई पैनल गठित कर के समझौते का रास्ता ढूंढा जा सकता है।

जजों ने सभी पक्षो को मध्यस्थता के लिये पंचों के नाम सुझाने के लिये भी कहा और कुछ नाम पीठ ने भी सुझाये। पीठ ने जो नाम सुझाये, उसमें जस्टिस दीपक मिश्र, जस्टिन जीएस केहर, दोनों पूर्व सीजेआई रह चुके हैं और जस्टिस एके पटनायक हैं।

मध्यस्थता के निर्णय के साथ अदालत मध्यस्थता की कार्यवाही के मीडिया कवरेज के विंदु पर भी कुछ फैसला सुना सकती है। प्रकरण की संवेदनशीलता को देखते हुए अदालत मध्यस्थता कार्यवाही के मीडिया प्रसारण और प्रकाशन पर भी रोक लगाने का विचार कर सकती है। हालांकि यह अभी तय नहीं है कि मीडिया कवरेज को लेकर अदालत का क्या रुख रहता है।