इस संबंध में पिछली दो पोस्ट पढ़ने के बाद आप यह तो जान गए होंगे कि, भारत की डिजिटल बैंकिंग भगवान भरोसे चल रही है। और सरकार, बैंक और टेक कंपनीज मौन साध कर बैठे हैं। हमारी रिसर्च के चौकाने वाले परिणामों के बाद हमने भारत के लगभग सभी बड़ी बैंको की ऍप्स की हार्डकोर फंक्शनल टेस्टिंग शुरू करने का फैसला किया। सबसे पहले हमने अपने एंड्रॉयड फोन को “रूट’ किया जिसका मतलब में आगे बताऊँगा और एक के बाद एक ऐसे रिजल्ट आए की हमारी आंखे खुली की खुली रह गई।
एंड्रॉइड फोन में रूटिंग वही होता है, जैसे ios में जेलब्रेक होता है। हिंदी में रुट का मतलब होता है जड़; रूटिंग आपको एंड्राइड के जड़ तक पहुँचाने में मदद करता है। बिना रुट तक पहुँचे आप एंड्रॉयड की सिस्टम फाइल्स को हाथ तक नही लगा सकते है। जब आप किसी एंड्रॉयड फोन को रुट कर लेते हैं, तो उसकी सारी सुरक्षा व्यवस्था लचर हो जाती है। और उसमें कायदे से कोई भी ऑनलाइन बैंकिग ऍप्स बिलकुल नही चलना चाहिए। लेकिन जब हमने सभी बैंकों और वालेट्स कि टेस्टिंग शुरू की, तो लगभग सारी एप्पलीकेशन या तो एक चेतावनी के बाद उसमें चल गईं या हमने मेजिक्स जैसे सॉफ्टवेयर डालकर चला लीं अब आप सोच लीजिए भारत की ऑनलाइन बैकिंग कितनी सेफ है?
इस समस्या के पीछे बैंकों की मजबूरिया टेक कंपनी के हित और सरकार की गलत नीतियां हैं। बैंक सब कुछ डिजिटल कर रहे हैं, क्योंकि एक सेविंग ऑफलाइन अकॉउंट के मेंटेनेंस में 40-50 डॉलर खर्च होते हैं और डिजिटल में यह काम 8-10 डॉलर में ही हो जाता है। गिरती अर्थव्यवस्था में डूबते बैंको को डिजिटल तिनके का ही सहारा है।
लेकिन सायबर सेक्युरिटी को लेकर बैंक चुप हैं। वो आपसे नेटबैंकिंग का पैसा ले रहे हैं, लेकिन अपनी नेटबैंकिंग एप्लिकेशन का डेवलपमेंट किसी भी चलती फिरती कंपनी या डेवलपर से करवा सकते हैं। डेवलपर को जितना पैसा मिलेगा वो उतने ही सिक्योरिटी मापदंड का पालन करेगा क्योकि अंतरराष्ट्रीय स्तर के मानकों के हिसाब से डेवलपमेंट की टेक कास्ट बहुत ज्यादा आती है। इसलिए बैंक कास्ट कटिंग के चलते इस महत्वपूर्ण सुरक्षा को दरकिनार कर रहे हैं और आप सबके बैंकिंग खातों की सुरक्षा को दांव पर लगा रहे हैं। लेकिन विदेश में ऐसी लापरवाही क्यो नही हो रही है।
विदेशों में सरकारे एक राष्ट्रीय स्तर की नोडल एजेंसी बनाती हैं, जिसमे देश के टॉप साइबर सिक्योरिटी और डाटा एक्सपर्ट रहते हैं। जिसके एप्रूवल के बिना कोई भी ऑनलाइन बैंकिग एप्प डिजिटल मार्केट में रिलीज नही होती है। बैंक ऑफ अमेरिका और रॉयल बैंक आफ स्कॉटलैंड जिन्होंने सबसे पहले नेटबैंकिंग शुरुआत हुई थी। वो भी सरकार द्वारा नियुक्त जिमाल्टो जैसी एजेंसी के सर्टिफिकेट के बगैर अपना डिजिटल आप्लिकेशन नही बना सकते हैं। भारत में आरबीआई की गाइडलाइंस केवल खाना पूर्ति करती है, मुझे शक है कि भारत के बैंक इसका भी पालन करते होंगे लेकिन बड़ा सवाल है, कि सरकार क्यो कुछ नही कर रही है?
सरकार की गलत आर्थिक नीतियों ने बैंकों की हालात पहले से खराब कर रखी है और अगर सरकार बैंको पर सायबर सुरक्षा पर खर्च करने का दबाव बनाती है, तो बैंकिंग सेवाएं और महंगी हो जाएंगी और बैंकों की रही सही साख भी गिर जाएगी। सरकार दोहरा गेम खेल रही है, वो टेक कंपनी की नकेल भी नही कस रही है। क्योंकि उसके डाटा एनालिटिक्स से उसे राजनीतिक फायदा होता है और दूसरी तरफ बैंकों और वालेट्स के असुरक्षित डिजिटलीकरण को अनुमति देकर नोटबंदी जैसे निर्णयो को जस्टिफाई कोशिश कर रही है। इन सबके बीच सेन्डविच आम भारतीय नागरिक ही बन रहा है, जिसकी चिंता न तो सरकार को है न बैंक को और न ही टेक कंपनियों को है। डिजिटल दुनिया में टिकटाक का मजा है, भारत मे अंधेर नगरी चोपट राजा है।
इस अंतिम भाग के साथ मे यह सीरीज खत्म कर रहा हूँ मुझसे बहुत लोगो ने इन सब समस्या का हल पूछा है और मेने अपने पिछली सारी टेक पोस्ट में 20 सूत्र देने का वादा भी किया था। लेकिन अब मैंने यह विचार त्याग दिया है, क्योंकि मुझे लगता है मुझसे कोई कमी रह गई है। इसलिए आप लोग सरकार को नींद से नही जगा पा रहे है आप इस संदेश को सरकार तक पहुँचाये, तो ही हमारी मेहनत सफल होगी आप मेरा नाम दे या न दे कोई फर्क नही पड़ता है। हमारी इस मेहनत का सार मेरे सबसे पंसदीदा साहित्यकार दुष्यंत के शब्दो मे…

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।
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Apurva Bhardwaj

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