हमें नहीं लगता कि दोषियों को सज़ा मिल पाएगी । अब तक जो आरोपी हैं वो पकड़े तक नहीं जा सके हैं ।”
पहलू के बेटे इरशाद ने जून में जो आशंका जताई थी वो सितंबर में सही साबित हो गई ।
तो हुआ वही जिसका अंदेशा था । एक आदमी अपनी मौत से पहले छह लोगों के नाम पुलिस की रिपोर्ट में लिखवाता है। वो कहता है कि उसे इन्हें लोगों ने बेरहमी से मारा-पीटा।
अगले दिन उस आदमी की मौत हो जाती है। उसकी मौत के पांच महीने बाद उन छह लोगों का नाम जांच से हटा दिया जाता है,जिनका उसने नाम लिया, यही नहीं सबसे मजेदार बात ये कि पुलिस पांच महीने बाद तक उन लोगों को गिरफ्तार तक नहीं कर पाती, हालांकि उनकी गिरफ्तारी के लिए पांच हज़ार का इनाम जरुर रखती है। हां सात दूसरे लोगों की गिरफ्तारी जरुर की जाती है ,जिनमें से पांच अभी जमानत पर हैं।
ये कहानी है नूह के जयसिंहपुर गांव के पहलू खान मॉब लिंचिंग केस की जांच की । आठ बच्चों के पिता और अपनी 85 साल की मां के इकलौते बेटे पहलू 1 अप्रैल को जयपुर के एक पशु मेले से दो गाय घर ला रहे थे रास्ते में अलवर के बहरोड़ में उनके ट्रक को रोका गया और इतना मारा गया कि दो दिन बाद वो दुनिया से चल बसे। 2 अप्रैल को उन्होंने एक डाईंग डेक्लेरेशन पुलिस को दिया, जिसमें 6 मुख्य आरोपियों के नाम पुलिस को बताए । कहानी इतनी भर है कि वो लोग तब से अब तक पुलिस के हाथ तक तो आए ही नही थे,अब उन्हें मामले से क्लीन चिट भी दे दी गई है।

गौरक्षको की हिंसा का शिकार पहलू खान

ये क्लीन चिट सीबीआईसीआईडी की जांच रिपोर्ट में दी गई है। हालांकि शुरुआत से ही ये समझना मुश्किल नहीं था कि जांच की दिशा को राजनीतिक फायदे वाली गली की ओर मोड़ा जा रहा है।
इस तस्वीर में पहलू खान पर हमला करने वालों की तस्वीर साफ़ दिखाई दे रही है

मामले की शुरुआती जांच के दौरान ही बहरोड़ पुलिस के रवैये पर पहलू के बड़े बेटे इरशाद खान ने सवाल उठाए थे ””पुलिस हमें ही गौ-तस्कर साबित करने में लगी हुई थी,हम रमजान के दिनों में दूध के लिए गाय खरीद कर ला रहे थे, हमारे पास जयपुर मेले की बकायदा रसीद भी है”।
एक हमलवर इस तस्वीर में साफ़ दिखाई पड़ रहा है

इरशाद के सवालों में दम भी हैं क्योंकि अब जब इन सभी लोगों की गिरफ्तारी के लिए रखा गया पांच हजार का ईनाम पुलिस ने हटा दिया है,तो सवाल ये भी है कि इन पर ये ईनाम रखा ही क्यों गया था ?
क्या इन लोगों को पकड़ना पुलिस के लिए इतना ही मुश्किल था,जबकि ये हिंदुवादी संगठनों से जुड़े दबंग स्थानीय नेता बताए जा रहे हैं ।
कांग्रेस के गढ़ माने जाने वाले मेवात के मुस्लिम बहुल इलाके में राजनीतिक ध्रुवीकरण की संभावना की तरह देखे गए इस केस के पीड़ितों को दोहरी मार से गुजरना पड़ा। पहलू के परिवार को गौरक्षकों के कहर के बाद राज्य सरकारों की अनदेखी भी बर्दाश्त करनी पड़ी। क्या ये सच नहीं कि हरियाणा और राजस्थान सरकार ने इन्हें पीड़ित मानने से ही इनकार कर दिया तभी तो दोनों सरकारों की ओर से कोई प्रतिनिधि जख्म पर मरहम लगाने अब तक पहलू के घर नहीं आया है।
इतना ही नहीं राजस्थान के गृहमंत्री ने तो पहलू के बेटे इरशाद को गौ तस्कर ही कह डाला था, हालांकि सच्चाई ये है कि जिन दो केसों का गृहमंत्री ने जिक्र किया था उन दोनों में ही उसे 2015 में कोर्ट की ओर से बरी कर दिया गया था।
लेकिन पीड़ितों पर सबसे बड़ी घेराबंदी तो देश की संसद में उस वक्त हुई जब केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने पहलू खान के साथ हुई मॉब लिंचिंग की वारदात को ही नकार दिया था। । दरअसल अपने बयान को लेकर बाद में आलोचना के घेरे में आए नकवी का ये बयान सत्ता का आत्मविश्वास ना होकर एक राजनीतिक संदेश था। जिसे समझने के लिए कुछ आंकड़ें समझने होंगे।
पिछले 8 सालों में गाय से संबंधित हमलों के 63 केस पुलिस थानों तक पहुंचे हैं
जिनमें से 97 फीसदी मई 2014 के बाद दर्ज किए गए हैं.
इनमें से 86 फीसदी पीड़ित मुस्लिम समुदाय से संबंध रखते हैं
आधे से ज्यादा केस बीजेपी शासित प्रदेशों से आते हैं
इनमें से 21 फीसदी मामलों में पीड़ितों के खिलाफ ही केस किया गया
5 फीसदी में कोई गिरफ्तारी तक नहीं हुई ।
( indiaspend.com )
आंकड़ों से साफ़ है कि पहलू खान मॉब लिंचिंग केस ध्रुवीकरण की सीरीज़ में एक कड़ी ही है। इस केस के आगे और पीछे कई ऐसे ही दूसरे केस हैं,जहां इंसाफ की रफ्तार क्या है,वो आंकड़ें ही बता रहे हैं। इसलिए पहलू खान तो एक चेहरा है भर है जो समाज,राजनीति और न्याय व्यवस्था की विसंगतियों को सामने ले आता है। लेकिन इन सबके बीच उनकी 85 साल की मां के इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं ” गाय साथ रखने की वजह से मेरे बेटे को क्यों मारा गया ,हम तो सदियों से गाय भैंस पालते आ रहे हैं।”
पहलू खान की माँ

गाय के नाम पर होने वाली इन्ही हत्याओ पर एक डोक्युमेन्ट्री फ़िल्म बनाई गई है, जिसका नाम है – “इन द नेम ऑफ़ मदर”

देखें डोक्युमेन्टरी – ” इन द नेम ऑफ़ मदर “

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Alpyu Singh

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