इंस्पायरेशनल स्टोरी

क्यों की जाती है महेंद्र सिंह धोनी से भावना जाट की तुलना?

क्यों की जाती है महेंद्र सिंह धोनी से भावना जाट की तुलना?

भावना जाट रेस इवेंट खिलाड़ी हैं, भावना की परवरिश एक मध्य वर्गीय परिवार में हुआ। भावना शुरू से ही जीवन में कुछ बड़ा करना चाहती थीं, अपना और परिवार का नाम रौशन करना चाहती थीं। और उन्होंने ऐसा किया भी। पर यहां तक पहुंचना उनके लिए किसी और खिलाड़ी से कहीं ज्यादा मुश्किल रहा।

अपने संघर्ष के दिनों में उन्हें और उनके परिवार और समाज से प्रैक्टिस के दौरान बहुत कुछ सुनना और सहना पड़ता था। इसीलिए कुछ लोग उनके संघर्ष की तुलना क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी के संघर्ष से करते हैं।

जीवन में आए कई उतार-चढ़ाव

बता दें कि, टोक्यो ओलंपिक के रेस वॉकिंग इवेंट में भावना ने 20 किलो मीटर रेस वॉकिंग में क्वालीफाई किया था । वह इसमें 32 वें स्थान पर रही। फिर भी पूरे देश का दिल जीत लिया। राजस्थान का नाम भी दुनियाभर में रौशन कर दिया।

भावना बताती हैं कि आज वही लोग उनके घर पर आए हुए हैं जो उन्हें और उनके परिवार वालों को ताना मारते थे और जब वो शॉट्स में प्रैक्टिस करती थी तो उन्हें घूर कर देखते थे। सर्टिफिकेट आने पर बोलते थे। यह ऐसे ही रखे रह जाएंगे। जीवन में इनका कोई काम नहीं है। लड़की है घर में बैठाओ, शादी करो। भावना ने यह सब बातें ओलंपिक से लौटने के बाद राजसमंद वापस आकर दैनिक भास्कर को दिए एक इंटरव्यू में बताई है। उन्होंने कहा कि ‘आज अच्छा लगा, जो सवाल उठाते थे उनको जवाब मिल गया है।’

आगे बढ़ने के लिए भाई ने किया प्रेरित

भावना बताती हैं कि उनके पिताजी के पास कुछ एकड़ जमीन है ।जिसमें उनके माता-पिता खेती करते हैं। दूसरी तरफ भाई भी दस हजार महीना कमाते थे। इसमें मेरे भाई पांच हजार खाने-पीने की और मेरी प्रैक्टिस के लिए खर्च कर देते थे। आज मैं जो भी कुछ हूं, अपने भैया का मुझ पर आत्मविश्वास और लगातार मुझे समाज की परवाह किए बिना आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते रहना।

स्पोर्ट्स में शुरू से ही अच्छा खेलने के कारण उन्हें रेलवे में टिकट एग्जामिनर की नौकरी भी जल्दी ही मिल गई थी। जिसमें उनकी पोस्टिंग हावड़ा में मिली थी। अपनी नौकरी का किस्सा बताते हुए कहती हैं कि, मैं पहली बार अकेले कोलकाता गई तो उनका पर्स और फोन भी चोरी हो गया था। इसके साथ-साथ उनका एटीएम भी जिसमें उन्हें बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। फिर उन्होंने कुछ अपने साथी खिलाड़ियों से मदद लेकर अपने सफर को तय किया।

भावना ने समाज से अपने सपनो की लड़ाई और परिवार वालों की जिम्मेदारी को बखूबी निभाया है। वे बताती हैं कि, मैंने रेलवे के जनरल डिब्बों से लेकर बसों तक का बहुत सफर किया है। भावना की भी खेलों में थोड़ा अच्छा करने पर रेलवे में नौकरी लग गई थी।

महेंद्र सिंह धोनी से की जाती है तुलना

भावना के जीवन के संघर्ष की तुलना भारतीय क्रिकेट के सफलतम कप्तानों में से एक महेंद्र सिंह धोनी से की जाती है। भावना कहती हैं कि धोनी ने नौकरी छोड़ दी थी, लेकिन मेरे लिए तो वह भी संभव नहीं था क्योंकि मेरी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी इसलिए जो भी करना और घर आकर अपने लिए खाना बनाना और प्रैक्टिस करना दोनों ही बहुत ही मुश्किल काम था।

25 साल की भावना की खेल कोटे में नौकरी लग गई थी। जिसके कारण पढ़ाई को बीच में ही छोड़ना पड़ा। क्योंकी हावड़ा से उदयपुर आना उनके लिए संभव नहीं था। अब दोबारा से भावना ने कपासन कॉलेज में b.a. में दाखिला ले लिया है।

प्रैक्टिस के लिए सात लाख का लिया था लोन

नेशनल लेवल पर अच्छा परफॉर्मेंस करने पर 303 दिन की छुट्टी मिलती है ।क्वालिफिकेशन के लिए सीनियर डीसीएम से छुट्टी मांग रही थी, मगर छुट्टी नहीं मिली सिर्फ 3 महीने बचे थे। ऐसे में विदाउट पेमेंट पर छोड़ कर आ गई। क्वालीफाई कर के ओलंपिक गई तो मुझे पेमेंट नहीं की गई।

अपनी तैयारी और खानपान के लिए भावना ने रेलवे से सात लाख का लोन ले रखा है। लोन अभी चल रहा है उनकी तनख्वाह से 16000 महीने की किस्त अब भी जाती है। भावना बताती है कि जबसे उन्होंने टोक्यो ओलंपिक में क्वालीफाई किया है। तब से उन्हें सभी जानने लगे हैं और सभी का एक सपना बन गया है कि ओलंपिक में जाना है।

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Nidhi Arya