अपनी भाषा को संरक्षित करके ही संस्कृति और परंपराओं की रक्षा की जा सकती है और भाषा को मजबूत बनाया जा सकता है और संस्कृति समाज को भी मजबूती प्रदान करती है। उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने बुधवार को क्रिया विश्वविद्यालय (केयू) में मानविकी और सामाजिक विज्ञान में उन्नत अध्ययन के लिए मोटूरी सत्यनारायण केंद्र का उद्घाटन करते हुए हिंदी भाषा संरक्षण पर जोर दिया।

हिंदी भाषा सीखने पर जोर देते हुए वेंकैया नायडू ने कहा कि हम बहुसंस्कृति और बहुभाषी दुनिया में रह रहे हैं। भारत विविध भाषाओं और संस्कृतियों की संगम स्थली है। इसलिए मातृभाषा को प्रोत्साहित करना बहुत ही अहम है। आज भारत में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा हिंदी ही है। किसी भी बच्चे के लिए अन्य भाषा की तुलना में अपनी मातृभाषा में बेहतर तरीके से सीखना और भी आसान हो जाता है। जिससे वह अपने विचार और भावनाओं को भी आसानी से व्यक्त कर सकता है।

देश में भाषाओं का हो आदान-प्रदान

हिंदी सीखना बहुत जरूरी है। नायडू ने कहा कि दक्षिण भारत के लोगों को उत्तर भारत की भाषाएं सीखनी चाहिए। साथ उत्तर भारत के लोगों को दक्षिण की भाषाएं भी सीखनी चाहिए। भाषा सीखने को लेकर आप किसी पर भी किसी तरह का दबाव नहीं बना सकते हैं। भाषा सीखना जीवन में अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए बहुत आवश्यक है।

हिंदी भाषा का महत्व दिल्ली पहुंचकर जाना-नायडू

नायडू ने अपने छात्र दिनों को याद करते हुए कहा जब उन्होंने हिंदी विरोधी आंदोलन में भाग लिया और हिंदी में एक नाम बोर्ड पर टार लगाया। नायडू ने कहा कि उन्हें जीवन में बाद में दिल्ली में पहुंचने के बाद एहसास हुआ कि वास्तव में उन्होंने अपने चेहरे पर लाक्षणिक रूप से टार लगाया था। इसके बाद नायडू ने हिंदी भाषा को सीखा क्योंकि उन्हें एहसास हो गया था कि अगर उन्हें बहुसंख्यक से अपने विचारों को प्रकट करना है तो उन्हें हिंदी भाषा का ज्ञान होना बहुत जरूरी है।

आगे उन्होंने कहा कि यह जरूरी नहीं है कि जिसे अंग्रेजी नहीं आती तो वह अपने जीवन में आगे नहीं बढ़ सकता है यह धारणा बिल्कुल गलत है। कई राजनीतिक दिग्गजों के उदाहरण देते हैं उन्होंने कहा कि बहुत से ऐसे व्यक्ति हैं जो आज राष्ट्रीय भाषा को सीख कर आगे बढ़े हैं और उच्च पद पर हैं। उन्होंने इसमें मुख्य रूप से खुद के साथ-साथ भारत के मुख्य न्यायाधीश, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति जिन्होंने अपनी मातृभाषा में साधारण स्कूलों से शिक्षा प्राप्त की है।

मातृभाषा व्यक्ति की आंखों के समान

ऐसा पहली बार नहीं है कि भारतीय राजनीति में हिंदी भाषा के महत्व को लेकर नायडू ने अपने विचार पहले भी व्यक्त किए थे। साल 2018 में 19 नवंबर मद्रास विश्वविद्यालय में आयोजित प्रेसीडेंसी कॉलेज के दीक्षांत समारोह में मातृभाषा के महत्व पर नायडू ने कहा था कि मातृभाषा आंख की तरह होती है और अन्य भाषाएं चश्मे की तरह यदि अच्छा दृष्टिकोण नहीं होगा तो चश्मा पहनने का भी कोई फायदा नहीं होगा। हमें अपनी मातृभाषा कभी नहीं भूलनी चाहिए।  प्रचार-प्रसार के साथ घर ही नहीं आम बोलचाल की भाषा में भी इसे शामिल किया जाना चाहिए।

नायडू का कहना है कि अंग्रेजी पढ़ने के दौरान उनकी मानसिकता भी बदल गई है। वह अब अंग्रेजी को बेहद जरूरी समझते हैं। ब्रिटिश राज के चलते शिक्षा के माध्यम के रूप में अंग्रेजी के चलन ने भी बहुत अधिक जोर पकड़ा है। राष्ट्रभाषा हिंदी के महत्ता के साथ साथ हमें गुजराती, मराठी , बंगाली, तेलुगू और भोजपुरी जैसी मातृभाषा में भी धारा प्रभाव होना चाहिए। यह भी मूल भाषाएं हैं।

अंग्रेजी को हिंदी से अधिक महत्व देना देश हित में नहीं 

वेंकैया नायडू जी का कहना है हिंदी की अपेक्षा भारतीय लोग अंग्रेजी को ज्यादा महत्व देने लगे हैं। जबकि यह देश हित में नहीं है और ना ही अच्छा है। भारतीयों को अपनी भाषा पर गर्व होना चाहिए इसका एक उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा की, मैं दुनिया भर के ऐसे दिग्गजों को जानता हूं जोकि अंग्रेजी में दक्ष होने के बावजूद भी अपनी मातृभाषा में संवाद को ही वरीयता देते हैं।

रूस ,फ्रांस, स्वीटजरलैंड, चीन ,जर्मनी और ईरान जैसे तमाम देशों के राष्ट्राध्यक्ष अपनी राष्ट्रीय भाषा में संवाद करते हैं ।ऐसा इसलिए है ,क्योंकि उन्हें अपनी मातृभाषा पर गर्व है और इससे उनकी भाषा का प्रचार प्रसार भी होता है।

केयू के कुलपति महेश रंगराजन ने कहा कि एक अप्रत्याशित दुनिया के लिए मानवता को तैयार करने के संस्थान के मिशन को ध्यान में रखते हुए केंद्र का निर्माण समय पर और दूरदर्शी था।

केयू की कार्यकारी समिति के अध्यक्ष कपिल विश्वनाथ ने कहा कि विश्वविद्यालय ने उपाध्यक्ष के साथ सामान्य मूल्यों को साझा किया। जिसमें निरंतर सीखने का जुनून, नए ज्ञान का निर्माण और सार्वजनिक सेवा और राष्ट्र निर्माण के लिए गहरी प्रतिबद्धता शामिल है।

 

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Nidhi Arya