विचार स्तम्भ

हमसे अभागी पीढ़ी कौन सी होगी ? जिसने बनते कुछ नहीं देखा, बिगड़ते सब देख रही है

हमसे अभागी पीढ़ी कौन सी होगी ? जिसने बनते कुछ नहीं देखा, बिगड़ते सब देख रही है

चौरासी हुआ तो बच्चा था। पापा को होरा अंकल के लिए बुरी तरह से परेशान देखा। गुरमीत को स्कूल छोड़कर अपने पिता के साथ ठेले पर स्टोव बनाते देखा। सामान लूट के ले आए लोगों में बेशर्म भी दिखे और कुछ बाद में शर्मिंदा हुए लोग भी। हत्या नहीं हुई थी मेरे शहर में कोई। रहा होगा कोई आँख का पर्दा। लिहाज़। मेरे शहर में उसे अब कोई नहीं याद करता लेकिन गुरमीत का स्कूल और बचपन तो वापस नहीं आ सकता था।
इक्यानवे में मस्जिद ढही तो कॉलेज में था। पागलपन देखा। मेरे शहर में दंगे नहीं हुए थे लेकिन देश जल रहा था। लौटकर कॉलेज आया तो शर्म सी आती थी मुस्लिम दोस्तों के सामने। लेकिन वे हँस के मिले। अब भी मिलते हैं। अभी गोरखपुर गया तो उनमें से ही दो एयरपोर्ट आए थे लेने।
दो हज़ार दो में गुजरात में था। सब देखा। क़रीब से देखा। जब मुस्लिम बार्बर ने कहा भाई दाढ़ी कटा लो ख़तरा हो सकता है तो टूटा भीतर से। अकेली रहने वाली मेड और उसकी माँ का घर फूँक दिया गया। बेसमेंट में आर्किटेक्ट का घर फूँक दिया गया। चुन चुन के जलाए गए घर और दुकानें देखीं।
आज दिल्ली में हूँ। हमसे अभागी पीढ़ी कौन सी होगी जिसने बनते कुछ नहीं देखा बिगड़ते सब देख रही है। एक हिस्सा उसमें ख़ुशी ख़ुशी शामिल है। सैंतालिस वालों ने तो जंग ए आज़ादी देखी थी कम से कम। क़लम उठाई। अब लगता है क्या फ़ायदा। जब कोई फ़र्क़ नहीं पड़ना तो क्या लिखना क्या पढ़ना। फिर लगता है लिख रहे हैं तो यह हाल है न होते हम जैसे लिखने वाले तो क्या होता!
सारी रात ख़ुद से सवाल करता रहा हूँ। लाइब्रेरी में भटकता रहा हूँ। एकबारगी मन हुआ किताबों में आग लगाकर ख़ुद को भी भस्म कर दूँ। मध्यवर्गीय कायरता मरने भी नहीं देगी।
ख़ैर…ज़िंदा हैं तो चुप नहीं रहेंगे। बाक़ी तो क्या है कहने सुनने के लिए। ख़याल रखिए अपना। हम कुछ नहीं कर सकते लेकिन जिन ग़रीबों का धंधा नष्ट कर दिया गया है उनकी मदद तो कर ही सकते हैं। सोचिए तैयार रहिए वह न्यूनतम है।
किसी पार्टी किसी नेता को कुछ नहीं कह रहा। जो मुख्यमंत्री खुद कभी धरने करता रहा हो वह दरवाज़े पर आए लोगों पर वाटर कैनन चलवाये तो कहने सुनने को क्या बचता है? हमीं करेंगे जो हो सकेगा। क्या हो सकेगा? क्या बचा सकेंगे?

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Ashok kumar Pandey

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