8 दिसंबर, को किसानों ने अपनी मांगों के समर्थन में भारत बंद का आह्वान किया था। बंद सफल रहा । सबसे उल्लेखनीय यह बात थी कि, इस बंद में देश मे कहीं से भी हिंसा के समाचार नहीं मिले। लंबे समय के बाद, देश मे जनहित के मुद्दे पर जनता जागरूक दिखी और उसने अपने हक़ के लिये आवाज़ उठाई। सभी विरोधी दल, कुछ को छोड़ कर किसानों के इस बंद के साथ थे। जो बंद के साथ नहीं थे, वे भी किसान आंदोलन के ही पक्ष में खड़े रहे। बंद की सफलता का सरकार पर प्रभाव, केवल इसी से लगाया जा सकता है कि बंद के ही दिन गृहमंत्री अमित शाह ने किसान संगठनों को बातचीत के लिये बुलाया। किसान संगठनों का एक प्रतिनिमंडल हन्नान मोल्लाह के नेतृत्व में अमित शाह से मिला भी। पर वहां भी बात नहीं बनी। किसानों ने एक और केवल एक ही मांग रख दी, कि पहले यह तीनों कृषि कानून सरकार वापस ले तब आगे की बात हो।

सरकार ने 9 दिसम्बर को होने वाली सरकार – किसान वार्ता टाल दी और किसानों को समस्या के समाधान हेतु एक प्रस्ताव दिया, जिंसमे यह भी अंकित था कि सरकार एमएसपी को सुनिश्चित करेगी। लेकिन इसका कोई उल्लेख नहीं था कि, वह आखिर इसे सुनिश्चित करेगी कैसे। सबसे आश्चर्यजनक कदम, सरकार द्वारा जमाखोरी को वैध बनाने के कानून से जुड़ा था, जिसपर एक शब्द भी नही कहा गया। यह बात किसी के भी समझ से परे है कि, आखिर, जमाखोरों को जमाखोरी की अनुमति कानूनी रूप से वैध बनाने से किस किसान का भला होगा। यह एक सामान्य सी बात है कि, जमाखोरी से बाजार में कृत्रिम कमी पैदा की जाती है और फिर दाम बढ़ने घटने के मूल आर्थिक सिद्धांत के अनुसार, चीजों की कीमतें बढ़ने लगती हैं। फिर जैसे ही बाजार में जमा की हुयी चीजें झोंक दी जाती हैं तो, फिर कीमत गिरने लगती है। यह एक प्रकार से बाजार को नियंत्रित करने का पूंजीवादी तरीका है। पहले ईसी एक्ट या आवश्यक वस्तु अधिनियम के अंतर्गत सरकार को यह शक्ति मिली थी कि वह कृत्रिम रूप से बाजार में बनाये जा रहे चीजों की कमी और अधिकता को नियंत्रित कर सके। और जैसे ही ईसी एक्ट में छापे पड़ने लगते थे, चीजों के दाम सामान्य होने लगते थे। अब न तो यह कानून रहा और न ही जमाखोरी कोई अपराध। अब पूरा बाजार, उपभोक्ता, किसान सभी इन्ही जमाखोरों के रहमो करम पर डाल दिये गए हैं। यह कानून खत्म कर के सरकार ने खुद को ही महंगाई के घटने बढ़ने से अलग कर लिया है।

किसानों का यह आंदोलन, केंद्र सरकार द्वारा तीन कृषि कानूनों के खिलाफ लम्बे समय से चल रहा है। पहले यह कानून एक अध्यादेश के रूप में जून 2020 में लाये गए, जिसे बाद में संसद से पारित करा कर क़ानून के रूप में लागू कर दिया। यह कानून, अनाज की मंडियों में निजी या कॉरपोरेट क्षेत्र के प्रवेश, जमाखोरी को अपराध मानने वाला कानून खत्म करने और कांट्रेक्ट फार्मिंग को वैधानिक स्वरूप देने के बारे में हैं। इसका सबसे अधिक विरोध पंजाब और हरियाणा में जहां उन्नत कृषि व्यवस्था और सरकारी मंडियों का एक सुनियोजित संजाल है, वहां से शुरू हुआ और फिर धीरे धीरे यह आंदोलन पूरे देश मे फैल गया। पंजाब में किसानों के धरने के बाद किसानों ने दिल्ली चलो का आह्वान किया और वे सरकार की तमाम बंदिशों के बाद भी दिल्ली पहुंचे पर जब उन्हें दिल्ली में प्रवेश नहीं करने दिया गया तो, उन्होंने सिंघु सीमा पर धरना दे दिया। यह धरना 11 दिनों से चल रहा है और उसी के क्रम में 8 दिसंबर को भारत बंद का आयोजन किसान संघर्ष समिति की तरफ से किया गया है। शुरुआत में यह आंदोलन, पंजाब और हरियाणा तक ही सीमित रहा, पर अब इसका प्रभाव, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान और मध्य प्रदेश तक पहुंच गया है। साथ ही वे राज्य जो दिल्ली से दूर हैं, उनके यहां भी किसान अपनी अपनी समस्याओं को लेकर आंदोलित हैं। 8 दिसंबर का बंद कितना व्यापक रहता है और इसका क्या असर सरकार पर पड़ता है इसका पता तो 9 दिसम्बर के बाद ही लग पायेगा।

कृषि कानूनों को लेकर सरकार और किसानों के बीच कई दौर की वार्ता हो चुकी है और इस वार्ता का अगला क्रम 9 दिसंबर को भी प्रस्तावित है। 3 दिसंबर को, केंद्र सरकार के साथ हुई बातचीत को लेकर 4 दिसंबर को एक बार फिर किसान संगठनों ने आपस में चर्चा की और संयुक्त किसान मोर्च की प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया गया कि  किसान, तीनों कानून को रद्द करे बिना, नहीं मानेंगे । हालांकि, सरकार इन कानूनों में, कुछ संशोधन करने के लिए तैयार है लेकिन किसानों ने सरकार से साफ कह दिया है कि सरकार तीनों कानून वापस ले। इन मांगों में प्रस्तावित बिजली अधिनियम 2020 को वापस लेने की भी मांग जुड़ गयी है।

तीनो कृषि कानूनो को लेकर यह आशंका उठ रही है कि यह तीनों कानून खेती किसानी की संस्कृति और परम्परागत खेती को नष्ट कर देंगे और लंबे समय से हुए भूमि सुधार के अनेक कदम प्रतिगामी हो जाएंगे। इस आंशका का आधार आखिर क्या है ? कैसे किसान विरोधी यह तीन कानून देश की कृषि व्यवस्था की कमर तोड़कर किसानों को, कॉरपोरेट और पूंजीपतियों के गुलाम बनाने के लिए और आम जनता के लिये खाने पीने की चीजों को महंगा कर कॉरपोरेट की जेबें भरने के लिए लाए गए हैं ?

संक्षेप में इसे देखें

  • कॉरपोरेट की पहली समस्या थी, कि, कृषि संविधान की समवर्ती सूची में है। अर्थात, इस विषय पर केंद्र और राज्य दोनों ही इससे संबंधित कानून बना सकते हैं। ऐसे में अलग अलग राज्यों में उनकी कृषि व्यवस्था के अनुसार, अलग अलग, कानून उन राज्यों ने बनाये हैं। उनके यहां फसल की खरीद, उन्ही नियम और कायदों से की जाती है। कॉरपोरेट को अलग अलग राज्यो में कृषि उत्पाद खरीदने के लिये अलग अलग नियम कायदों से रूबरू होना पड़ता है। अब कॉरपोरेट की इस समस्या का यही हल था कि, कोई एक कानून ऐसा बने जो सभी राज्यो पर समान रूप से लागू हो। कॉरपोरेट की इस समस्या के समाधान के लिये राज्यों के अधिकार का अतिक्रमण करते हुए, केंद्र सरकार ने, पूरे देश के लिए एक अलग एक्ट बना दिया। इस एक्ट में किसी को कहीं भी फसल बेचने का अधिकार दे दिया गया।
  • कॉरपोरेट की दूसरी समस्या थी कि, यदि कॉरपोरेट पूरे देश के किसानों से खाद्यान्न खरीदेंगे और उसका भंडारण करेंगे, तो इसमे सबसे बड़ी बाधा, विभिन्न राज्यों द्वारा बनाये गए जमाखोरी रोकने के लिये बने कानून हैं। इसमें सबसे बड़ी बाधा, आवश्यक वस्तु अधिनियम, ईसी एक्ट था। यह कानून, भंडारण की सीमा तय करने और जमाखोरी को रोकने के लिये तरह तरह की बंदिशें लगाता था। इन कानूनो के कारण, कॉरपोरेट कोई भी खाद्यान्न अधिक मात्रा में लंबे समय तक अपने गोदामो में स्टोर नहीं कर सकता था। कॉरपोरेट का इरादा ही है फसल या खाद्यान्न किसानों से मनमाने दाम पर खरीद कर उसे स्टोर करना और जब बाजार में बढ़े भाव हों तो उसे बेचने के लिये बाजार में निकालना। इस प्रकार कॉरपोरेट बाजार पर अपना नियंत्रण बनाये रखना चाहता है। पर ईसी एक्ट कॉरपोरेट के इस इरादे पर अंकुश की तरह था। कॉरपोरेट की इस समस्या का समाधान, केंद्र सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम को खत्म कर और जमाखोरी को वैध बना कर, कर दिया। अब खाद्यान्न की जमाखोरी कितनी भी मात्रा तक और कितने भी समय तक करना अपराध नहीं रह गया।
  • कॉरपोरेट के सामने तीसरी बड़ी समस्या थी कि, किसान तो फसल अपनी ज़रूरत मर्जी से उगाते हैं, और इस पर सरकार या किसी का कोई दबाव नहीं है। इस समस्या के समाधान के लिये केंद्र सरकार ने कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का कानून  बना दिया जिससे किसान को अब कॉन्ट्रेक्ट में बांध कर कॉरपोरेट ही निर्देशित करेगा की किस प्रकार की फसल किसान को उगानी है।

पंजाब ही नहीं भारत मे किसान आंदोलनों का एक समृद्ध इतिहास रहा है। पंजाब के किसान प्रतिरोध का इतिहास तो, 1906 – 07  से शुरू होता है, जब शहीद भगत सिंह के चाचा सरदार अजीत सिंह ने पगड़ी सम्भाल जट्टा नाम से एक किसान आंदोलन की शुरूआत की थी। आज के इस आंदोलन के समर्थन में, कनाडा, यूरोप, अमेरिका, इंग्लैंड, हर जगह लोग प्रदर्शन औऱ एकजुटता प्रदर्शित कर रहे है। हालांकि भारत सरकार ने कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडो के बयान पर अपने आंतरिक मामलों में दखल बताया है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी इस आंदोलन का समर्थन किया है। 9 दिसंबर की सरकार और किसानों की बातचीत में यह आशा की जानी चाहिए कि किसानों की मांग सरकार स्वीकार कर लेगी और अगर सरकार के पास कोई अन्य कृषि सुधार का एजेंडा है तो, सरकार उसे भी किसान संगठनों से बातचीत कर के आगे बढ़ेगी।

सरकार का यह स्टैंड है कि, कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडो का किसान आंदोलन को समर्थन हमारे आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप है। इसे कूटनीतिक परंपरा के विपरीत मानते हुए, विदेश मंत्रालय द्वारा, कनाडा के उच्चायुक्त को यह बात समझा भी दी गयी है।

लेकिन, यूरोपीय यूनियन के देशो के सांसदों द्वारा, भारतीय सांसदों को दरकिनार कर कश्मीर घाटी का दौरा कराना, और उनसे यह सर्टिफिकेट लेना कि कश्मीर में  सब ठीक है, क्या हमारे आंतरिक मामलों में जानबूझकर कर यूरोपीय यूनियन को दखल करने के लिये आमंत्रित करना नहीं था ?

हाउडी मोदी के दौरान, अब की बार ट्रम्प सरकार की बात सार्वजनिक रूप से एक जनसभा में प्रधानमंत्री जी द्वारा कहना, क्या अमेरिका की अंदरूनी राजनीति में वह भी तब, जबकि वहां चुनाव साल भर के अंदर होने वाले हों तो, एक हस्तक्षेप नहीं है ?

किसान आंदोलन के समर्थन में अमेरिका, यूरोप, इंग्लैंड आदि देशों में भी प्रदर्शन हो रहे हैं और संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रवक्ता ने भी इस आंदोलन के पक्ष में अपने बयान जारी किए हैं।

किसान बिल पर बीजेपी का कहना है कि उसने कांग्रेस का ही एजेंडा पूरा किया है। सरकार के अनुसार,  कांग्रेस का वायदा एपीएमसी क़ानून को समाप्त करने का था, ताकि कृषि व्यापार को सभी बंदिशों से मुक्त किया जा सके। यह बात अर्धसत्य है। कांग्रेस ने इसके साथ कुछ राइडर भी रखे थे। सुरक्षा कवच के रूप में रखे गए यह राइडर, भी कांग्रेस के घोषणा पत्र का अंग थीं।

पत्रकार आवेश तिवारी ने इन सुरक्षा कवच का उल्लेख अपनी फेसबुक वॉल पर किया है। उसे मैं यहां प्रस्तुत कर रहा हूँ।

  • पहला: अभी एक मंडी औसतन साढ़े चार सौ वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र को कवर करती है। काँग्रेस का वायदा इसे समाप्त कर हर प्रमुख गांव में ज़रूरी इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ किसान बाज़ार तैयार करने का था।
  • दूसरा: कांग्रेस ने वायदा किया था कि किसानों के हितों की रक्षा के लिए कृषि आयात और निर्यात की एक विशेष पॉलिसी तैयार की जाएगी।
  • तीसरा: कांग्रेस ने एमएसपी तय करने नया का सिस्टम सुझाया था। अभी एमएसपी का निर्धारण कमीशन फ़ॉर एग्रीकल्चर कॉस्ट एंड प्राइसेस ( सीएसीपी ) तय करता है। कांग्रेस का वायदा था कि इसे हटाकर एमएसपी तय करने की ज़िम्मेदारी एक नेशनल कमीशन ऑन एग्रीकल्चर डेवलपमेंट एंड प्लानिंग ( एंसीएडीपी ) की होनी चाहिए। इस नए कमीशन में किसान भी मेंबर होंगे और उनका परामर्श भी फसल की कीमत तय करते ध्यान में रखा जाएगा।ऐसा वायदा इसलिए किया गया था क्योंकि अभी किसानों की राय को मानना अनिवार्य नहीं है। उनकी राय को नकारा जा सकता है।
  • चौथा: सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच कांग्रेस की न्याय योजना थी, जिसमें हमने देश की 20% सबसे ग़रीब परिवारों को 72,000 रुपया सालाना देने का वायदा किया था। ये परिवार सीमांत किसानों और खेतिहर मज़दूरों के हैं।
  • पांचवां: सुरक्षा कवच के रूप में खाद्य सुरक्षा क़ानून को ठीक से लागू करना था। यह क़ानून यूपीए की सरकार ने बनाया था जिसके अंतर्गत देश के 70% लोग इसका फ़ायदा उठा सकते हैं।

यदि इस क़ानून को ठीक से लागू किया जाता है तो किसानों से सरकारी ख़रीद बहुत बढ़ जाएगी। लेकिन मोदी सरकार तो इसे उल्टा कमज़ोर करने की तैयारी में है। 2020 के इकोनॉमिक सर्वे में सरकार ने खाद्य सुरक्षा क़ानून के दायरे में आने वाली जनता की संख्या को 70% से कम करके 20 प्रतिशत तक सीमित करने का सुझाव दिया है।

किसान आंदोलन पर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस काटजू ने अपने ब्लॉग में सरकार को इसका हल सुझाते हुए कुछ विकल्प बताए हैं। उन्होंने इस आंदोलन को हाल का सबसे बड़ा आंदोलन बताया है। उनके अनुसार

  • बहुत लम्बे समय बाद देश में कोई आंदोलन हो रहा है जो जाति/धर्म की सीमाओं को तोड़ रहा है…
  • राम मंदिर का आंदोलन हिंदुओं का था।
  • जाट, गुज्जर, एससी/एसटी, मुसलमान वग़ैरह भी अलग अलग आंदोलन करते रहे हैं
  • लेकिन किसानों का यह आंदोलन ऐतिहासिक है, जिसमें सभी जातियों/ धर्मों का समावेश है..क्योंकि सभी धर्म और जातियाँ किसी न किसी रूप में खेती किसानी से जुड़ी हैं।

इसका समाधान सुझाते हुए, जस्टिस काटजू ने कहा है कि,

  • सरकार एक अध्यादेश जारी करके इन क़ानूनों को “कंडिशनल लेजिसलेशन” घोषित कर सकती है।
  • “कंडिशनल लेजिसलेशन” वे क़ानून होते हैं जो अस्तित्व में तो होते हैं लेकिन ज़रूरत पड़ने पर ही लागू किए जाते हैं।
  • ऐसा हुआ तो ये क़ानून वापस भी नही होगा और इस पर तत्काल अमल भी नही होगा। यह बीच का रास्ता है।
  • इस बीच एक आयोग बने जिसमें सरकार, किसानों के प्रतिनिधि और विशेषज्ञ हों और वो इन क़ानूनों की समीक्षा करे।

लेकिन यह तभी सम्भव है जब सरकार किसानों की समस्या के प्रति गम्भीर हो।

गृहमंत्री से वार्ता की विफलता और 9 दिसंबर को सरकार के प्रस्ताव को किसानों द्वारा खारिज कर दिए जाने के बाद, यह आंदोलन सरकार के साथ साथ कॉरपोरेट के भी खिलाफ हो गया है। कॉरपोरेट में भी यह आंदोलन मुख्यतः रिलायंस और अडानी ग्रुप के खिलाफ है। जनता में यह सामान्य धारणा बैठ गयी है कि आर्थिक सुधारों के नाम पर लाये जाने वाले तमाम कानून कहीं न कहीं इन्ही दो घरानों के हितसाधक हैं। किसानों ने रिलायंस और अडानी ग्रुप के उत्पादों के बहिष्कार की घोषणा की है।

( विजय शंकर सिंह )

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