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वाह रे मीडिया, अभिनंदन को भारत तो आ जाने देते ….. !

वाह रे मीडिया, अभिनंदन को भारत तो आ जाने देते ….. !

भारतीय मीडिया निहायत ही बदमिज़ाज और सत्ता का चाटुकार है. पाकिस्तान ने अभिनंदन को छोड़ने का फैसला लिया तो हेडलाइंस लग रही हैं: ‘झुक गया पाकिस्तान’, ‘डर गया पाकिस्तान’.
मीडिया को टीआरपी और सर्कुलेशन के लिए तनाव चाहिए. युद्ध जैसे हालात चाहिए. इसके दो फ़ायदे हैं. पहला, तथ्यों की परवाह नहीं रहती. कुछ भी बोलकर दूसरे देश को गरियाते रहिए, सवाल कोई नहीं करेगा. दूसरा, हिंसक तस्वीरें दिखाकर लोगों को अपने साथ बांधे रखिए.
आप पत्रकारों से पूछिए तो ज़्यादातर युद्ध रिपोर्टिंग करने की चाहत जताते मिलेंगे. अपवादों को छोड़कर रिपोर्टिंग के नाम पर कूड़ा परोसते रहेंगे. इन्हें तनावग्रस्त इलाक़ा चाहिए. राहुल कंवल बीच में माओवादियों पर रिपोर्टिंग करने पहुंच गए और जोकरई करके समझदार लोगों के बीच बदनाम हो गए.
आर्मी के हेलीकॉप्टर और बैरकों में बैठकर ये लोग रिपोर्टिंग करते हैं. मुंबई पर जब अटैक हुआ था तो एक से एक नमूने रिपोर्टरों को देश ने देखा कि कैसे लेट-लेटकर ड्रामा कर रहे थे. मूवमेंट की ख़बरें लाइव दिखा रहे थे. कोई ज़िम्मेदारी नहीं, कोई पत्रकारीय नैतिकता नहीं.
Whatsapp पर भुजाएं फड़काने वाली भारत की इस पीढ़ी ने क़ायदे से एक भी युद्ध नहीं देखा है, इसलिए उन्मादी बने फिरते हैं. करगिल युद्ध इतिहास की दृष्टि से पिद्दा सा युद्ध था. कैजुअलिटीज़ नहीं देखी हैं. लाखों लोगों को मरते नहीं देखा है. शहरों को खंडहर में तब्दील होते नहीं देखा है. इन्हें युद्ध और वीडियो गेम में कोई फर्क नहीं लगता.
टीवी नहीं ख़रीदने के फ़ैसले पर मैं इसलिए संतुष्ट रहता हूं. जो देखना होता है इंटरनेट पर अपनी मर्जी से देखता हूं. देश में आधे फ़साद की जड़ टीवी स्क्रीन के उस पार बैठे अधकचरी-ज़हरीली समझ वाले चेहरे हैं.
बेशर्मी से सरकार के प्रवक्ता बन गया है मीडिया. हर बात पर मोदी-मोदी चिल्लाता रहता है. कभी-कभी चिल्लाने की वजह ख़ुद ही ढूंढ लेता है. अजब दौर है कि सवाल सरकार से पूछने के बजाए विपक्ष से पूछे जा रहे हैं. पॉलिसी पर भी विपक्ष जवाब दे, सरकार पर उठाए गए सवालों पर भी विपक्ष जवाब दे और मीडिया सिर्फ़ समवेत स्वर में चौकीदार के नाम का मृदंग बजाए.

टीवी मीडिया हमें समझाने में लगा है कि भारत की ‘कूटनीतिक जीत’ हुई है. रियली?

  • पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि ‘उदार’ और ‘शांतिप्रिय मुल्क’ की बना ली. मोदी सरकार की तरह बौरा कर कुछ नहीं किया.
  • बालाकोट से पहले तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्या था प्राथमिक मुद्दा? पुलवामा हमला. अब क्या हैं हेडलाइंस? अभिनंदनकी वापसी.
  • भारत ने बालाकोट पर हमला किया. भारतीय मीडिया ने ‘आतंकवादियों की मौत’ के झूठे आंकड़े छापे. भारत ने जोश-जोश में ख़ुद को ताक़तवर मानते हुए आधिकारिक तौर पर ऐलान कर दिया कि उसने ‘पाकिस्तान में घुसकर’ मारा है.
  • टीवी वालों ने ‘पाकिस्तान में घुसकर’ पद को दिन भर लूप में चलाया. पाकिस्तान ने जवाब में चुपचाप भारत के दो विमान मार गिराए. एक पायलट पकड़ लिया. सबूत दिखा दिया. फिर शांति की बात कर ली और पायलट को रिहा करने का ऐलान कर दिया. जीत किसकी हुई?

मसूद अज़हर को लेकर भारत ने पुलवामा हमले के बाद व्यापक गोलबंदी की थी. अमेरिका-ब्रिटेन-फ्रांस UNSC में प्रस्ताव लाने को लेकर तैयार थे. तीनों ने कल मसूद अज़हर को ‘वैश्विक आतंकवाकी’ मानने से जुड़ा प्रस्ताव पेश भी कर दिया. फिर दिक़्क़त कहां है?
मसूद अज़हर को लेकर सुरक्षा परिषद में चार बार प्रस्ताव पेश हुए हैं. हर बार चीन ने विरोध किया. सुषमा स्वराज का चीन दौरा पहले से तय था. एक दिन पहले भारत ने बालाकोट में हमला कर दिया. सुषमा स्वराज ने चीन जाकर भारत के हमले को ‘जस्टिफाई’ करने की कोशिश बहुत की, लेकिन चीन ने सपाट स्टेटमेंट दिया.
चीन ने कहा कि ऐसे हमलों से पहले ‘अंतरराष्ट्रीय समुदाय’ को विश्वास में लेना चाहिए था. भारतीय मीडिया सुषमा स्वराज के दौरे को भी कूटनीतिक जीत बता रहा है. बालाकोट हमले को भी. अभिनंदन की रिहाई के ऐलान को भी. भारत की थोड़ी-बहुत कूटनीतिक जीत तभी मानी जाएगी अगर चीन मसूद अज़हर पर तैयार हो जाए. भारत के पास अब 9 वर्किंग डेज़ का वक़्त है. शी जिनपिंग के साथ मोदी जी बहुत झूला झूले हैं. देखते हैं कूटनीति में क्या गुल खिलाते हैं.
बाक़ी तो अब तक भारत की बुरी कूटनीतिक हार हुई है. सिर्फ़ भारतीय टीवी चैनलों और Whatsapp पर भारत की डिप्लोमेसी को शानदार बताया जा रहा है. मोदी जी अभिनंदन को पायलट ‘प्रोजेक्ट’ बताकर अपनी ही पीठ थपथपा रहे हैं.

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Dilip Khan