एक-दो दशक पहले हमारे घर-आंगन में फुदकने वाली गौरैया आज विलुप्ति के कगार पर है.छोटे आकार वाले इस खूबसूरत  परिंदे का कभी इंसान के घरों में बसेरा हुआ करता था और बच्चे बचपन से इसे देखते बड़े हुआ करते थे.उसकी चहक और फ़ंखों की फ़ड़फ़ड़ाहट हमारी जिन्दगी का अहम् हिस्सा हुआ करती थी.लेकिन आज न तो अल सुबह वह चह्क सुनाई देती है और न ही दोपहर में घर आंगन में बिखरे अनाज  के दानों को चोच में दबाकर अपने घोसले तक उड़ान की आवाज. गौरैया के अस्तित्व पर छाए संकट के बादलों ने इसकी संख्या काफी कम कर दी है और कहीं..कहीं तो अब यह बिल्कुल दिखाई नहीं देती.
पक्षी विज्ञानी हेमंत सिंह के मुताबिक गौरैया की आबादी में 60 से 80 फीसदी तक की कमी आई है.यदि इसके संरक्षण के उचित प्रयास नहीं किए गए तो हो सकता है कि गौरैया इतिहास की चीज बन जाए और भविष्य की पीढ़ियों को यह देखने को ही न मिले.ब्रिटेन की ‘रॉयल सोसायटी ऑफ प्रोटेक्शन ऑफ बर्डस’ ने भारत से लेकर विश्व के विभिन्न हिस्सों में अनुसंधानकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययनों के आधार पर गौरैया को ‘रेड लिस्ट’ में डाला है.आंध्र विश्वविद्यालय द्वारा किए गए अध्ययन के मुताबिक गौरैया की आबादी में करीब 60 फीसदी की कमी आई है.यह कमी ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों में हुई है.
कुछ वर्षों पहले आसानी से दिख जाने वाला यह पक्षी अब तेज़ी से विलुप्त हो रहा है. दिल्ली में तो गौरैया इस कदर दुर्लभ हो गई है कि ढूंढे से भी ये पक्षी नहीं मिलता है इसलिए वर्ष 2012 में दिल्ली सरकार ने इसे राज्य पक्षी घोषित कर दिया है.
इस नन्हें से परिंदे को बचाने के लिए हम 2010 से प्रत्येक  20 मार्च  को “विश्व गोरैया दिवस” के रूप में मनाते आ रहे हैं, ताकि लोग इस नन्हीं सी चिड़िया के संरक्षण के प्रति जागरूक हो सके.वैसे गौरैया के इस हालत के जिम्मेदार हम मानव ही है. हमने तरक्की तो बहुत की लेकिन इस नन्हें पक्षी की तरक्की की तरफ कभी ध्यान नहीं दिया.यही कारण है कि जो दिवस हमें ख़ुशी के रूप में मनाना चाहिए था वो हम आज इस दुःख में मनाते है कि इनका अस्तित्व बचा रहे.
विज्ञान के मुताबिक़ एक गौरैया अपने घोंसले और बच्चे को लेकर इतना आक्रामक होता है कि दुश्मन अगर उन्हें नुकसान पहुंचाने की सोचे, तो ये अपनी जान पर खेल जाता है.लेकिन हम इंसानों ने उन्हें लड़ने लायक तो क्या जीने लायक भी नहीं छोड़ा.न उनके घोंसले के लिए जगह रहने दी.न ऐसे हालत छोड़े कि गौरेया वंश वृद्धि कर पाए.
खेती में कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग रुकेगा नहीं, तो कीटों और लार्वा की शक्ल में गौरैये के बच्चों का मुख्य भोजन कहां से आएगा? मोबाइल टावर से निकलने वाली इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक तरंगों से गौरैये का वजूद कहां से वापिस आएगा? इंसानों ने डिब्बों की शक्ल में अपनी घरें बना लीं, जिनमें न मुख्य खिड़कियों के ऊपर रोशनदान के लिए जगह छोड़ी और न ही ऐसे कोई छज्जे का कोना, जिन पर गौरैये अपना घोंसला बना पाएं. पैकेटबंद फूड आइटम्स ने हमारी जिंदगी सरल कर दी, लेकिन गौरैयों का परिवार मुश्किल में आ गया. घरों के बाहर या छतों पर अनाज धोने, सुखाने या बीनने की परंपरा के बारे में आज की पीढ़ी को पता तक नहीं. इसीलिए उन्हें नहीं पता है गौरैयों का झुंड के झुंड आना और उन अनाजों में से अपना हिस्सा लेकर चुपके से चले जाना क्या होता है.
जंगल इन जैसी चिड़ियों की ही देन है, ये परिन्दे ही जंगल लगाते है, तमाम प्रजातियों के वृक्ष तो तभी उगते है, जब कोई परिन्दा इन वृक्षों के बीजों को खाता है और वह बीज उस पक्षी की आहारनाल से पाचन की प्रक्रिया से गुजर कर जब कही गिरते है तभी उनमें अंकुरण होता है, साथ ही फ़लों को खाकर धरती पर इधर -उधर बिखेरना और परागण की प्रक्रिया में सहयोग देना इन्ही परिन्दों का अप्रत्यक्ष योगदान है.
कीट-पंतगों की तादाद पर भी यही परिन्दे नियन्त्रण करते है, कुल मिलाकर पारिस्थितिक तंत्र में प्रत्येक प्रजाति का अपना महत्व है, हमें उनके महत्व को नजरन्दाज करके अपने पर्यावरण के लिए अपनी गैर-जिम्मेदाराना भूमिका अदा कर रहे हैं.
अपने घरों के अहाते और पिछवाड़े विदेशी नस्ल के पौधों के बजाए देशी फ़लदार पौधे लगाकर इन चिड़ियों को आहार और घरौदें बनाने का मौका दे सकते है.साथ ही जहरीले कीटनाशक के इस्तेमाल को रोककर, इन वनस्पतियों पर लगने वाले  परजीवी कीड़ो को पनपने का मौका देकर इन चिड़ियों के चूजों के आहार की भी उपलब्धता करवा सकते है.
अपने घरों में  सुरक्षित स्थानों पर  गोरैया के घोसले बनाने वाली जगहों या मानव-जनित लकड़ी या  मिट्टी के घोसले बनाकर लटकाये जा सकते है. इसके अलावा पानी और  अनाज के साथ पकाए हुए अनाज का बिखराव कर हम इस चिड़िया को दोबारा अपने घर-आंगन में बुला सकते हैं.
हमें इतना याद रखना चाहिए कि अकेले रहने से बेहतर है, कि हम उन सब प्रजातियों के साथ मिलकर रहे जो सदियों से हमारे साथ रहती आई है और यकीन मानिए तब आपको खुद-ब-खुद पता चल जायेगा कि साथ मिलकर रहने के क्या-क्या फ़ायदे है.

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Durgesh Dehriya

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