सुकरात को जब ज़हर का प्याला दिया गया तो उसके इर्द गिर्द बहुत से क़ाबिल लोग बैठे थे । एक से एक कलाकार सुकरात को ज़हर का प्याला होंठ से लगाते देख रहे थे । तमाम राजनीतिज्ञ और कूटनीतिज्ञ खामोशी से ज़हर को सुकरात में उतरते देख रहे थे । वह मानकर चल रहे थे कि सुकरात के प्याले में ज़हर है, जबकि वह ज़हर उनके खुद के दिल ओ दिमाग़ में था ।यह हो कैसे रहा था,दुनिया का सबसे महान दार्शनिक अपनी मौत की तरफ बढ़ रहा था और सब इस घटना को चुपचाप देख रहे थे,जानते हैं क्यों,क्योंकि सत्ता ने भरोसा दिला दिया था कि सुकरात अपराधी हैं । सुकरात ने अपराध किया है, इसलिए उसकी तमाम योग्यताएं इसी ज़हर के प्याले में भरकर उसे पिला दी जा रही ।

यह होता आज भी है, दुनिया का हर देश अपने यहाँ अपने से अलग आवाज़ को दबा दे जाना चाहता है । बस फ़र्क़ इतना है कि थोड़े सभ्य लोग अपने से विरुद्ध आवाज को अनसुना करके उसे जीने देते हैं और असभ्य लोग ऐसी आवाज़ को यातनाएँ देकर खत्म करना चाहते हैं । इनपर आरोप जड़ते हैं और इनके रेशे रेशे नोच लेना चाहते हैं ।

यह हैं अस्सी साल के कवि वरवर राव,जिन्हें तमाम आरोपों में जेल में डाल दिया गया । जिनकी आवाज़ सलाखों में घोंट दी जाती अगर वक़्त रहते सब मुखर न हो जाते । दो चार दिन पहले हालत गम्भीर होने पर अस्पताल में भर्ती किये गए,जहाँ वह कोरोना पॉज़िटिव पाए गए । पिछले दो सालों में हमने अपने साहित्यकारों को जो सत्ता के सामने झुके नही बल्कि खड़े हो गए,उन्हें सलाखों में जाते देखा है ।

एक अपराध हम सबसे हुआ । वरवर राव स्वस्थ्य हो जाएँगे मगर हमारा मस्तिष्क जो अस्वस्थ हुआ है, उसके ठीक होने की कोई उम्मीद नही । सुकरात के प्याले में ज़हर था,हमारे मस्तिष्क में ज़हर भर दिया गया है । हम यह भी नही देखते अस्सी साल में एक कवि इतना भी डरावना नही हो सकता कि सत्ता थर थर कांपे और बूढ़े के पांव में बेड़िया डाल दे ।

वरवर राव की आज़ादी और बेहतरीन इलाज की बात कीजिये । उनपर जो आरोप हैं, उन्हें साबित करने के कागज़ जुटाएं नाकि सलाखों में मार डालें । अगर कोई कवि और लेखक इतना ही खतरनाक है जो सत्ता को चुभ जाए,तो यह उसके कलम की ताकत है । ऐसी कलम कहाँ पैदा होती हैं जो लाखों टैंक,तोप और ट्रोल्स को चुनौती दे सकें । सुकरात ने कौन सी तोप चलाई थी,कलम उठाया था और पूरी सत्ता घुटनो के बल बैठी आजभी हँसी का पात्र बनी हुयी हैं ।

हमारा देश ज्ञान को पूजने वाला देश है । मर्यादा पुरुषोत्तम ने रावण वध के बाद उनको प्रणाम ही इसलिए किया था क्योंकि वह ज्ञान की अहमियत जानते थे । अगर आप ज्ञान का सम्मान नही कर सकते तो आपसे असभ्य यहाँ भला कौन हैं । वरवर राव को अगर कुछ होता है, तो तैयार रहिए माथे पर उस कलंक को लगाने के लिए जो सुकरात की धरती से आजतक नही मिटा ।

कोरोना हो गया है वरवर राव जी को,प्रार्थना की वह ठीक हो जाएं । प्रार्थना की हम भी ठीक हो जाएं और इतने निर्दयी,असभ्य और बर्बर न होने पाएं की बूढ़ों को बेड़ियों में कसने को बेचैन रहें । सुकरात भी अपराधी थे और वरवर समेत तमाम लेखक कवि भी अपराधी हैं, देखना यह है कि हम मानव हैं या तराज़ू । सत्ता की नज़र में जो अपराधी है, जनता की नज़र में वह उसकी आवाज़ होना चाहिए था मगर चूक तो हो चुकी ।