बनारस में आखिरी बार औरंगज़ेब के समय मे विश्वनाथ मंदिर टूटा था। उसे औरंगजेब के आदेश पर ध्वस्त कर दिया गया था। शिवलिंग अपवित्र कर दिया गया था और उस स्थान पर एक मस्ज़िद का निर्माण कर दिया गया । यह एक ऐतिहासिक तथ्य है और इसे बिना किसी किंतु परन्तु के स्वीकार करना चाहिये। यह वही धार्मिक कट्टरता का ज़हर था जिसके कारण महान मुगल साम्राज्य का पतन प्रारंभ हो गया था। धार्मिक कट्टरता सदैव विनाश ही लाती है। यह एक सार्वकालिक सत्य है।

अहिल्याबाई होलकर ने वर्तमान विश्वनाथ मंदिर का निर्माण 1780 ई कराया जो ज्ञानवापी मस्ज़िद के बगल में ही है। उसके शिखर पर पंजाब केसरी रणजीत सिंह ने 1853 ई में 1000 किलो का सोने का पत्तर लगवाया और विदेशी टूरिस्ट इसे सामान्य तौर पर गोल्डेन टेम्पल कहते हैं वैसे यह शास्त्रों में विश्वेश्वर और लोक में विश्वनाथ के नाम से प्रसिद्ध है। न सिर्फ अहिल्याबाई होल्कर ने ही नहीं बल्कि देश के लगभग सभी राजाओं ने गंगा के किनारे पक्के घाटों की एक लंबी श्रृंखला बनवायी जो दुनियाभर में किसी भी प्रवाहपूर्ण नदी के कूल में नहीं है।

अहिल्याबाई होलकर ने जब नए विश्वनाथ मंदिर की नींव डालने का विचार किया तो उन्होंने ज्ञानवापी मस्ज़िद को ही क्यों नहीं मंदिर बनाने के लिये चुना ? उस समय मराठों का दबदबा था। अंग्रेज दूर थे और मुग़ल दिल्ली के आसपास ही थे। हिन्दू पद पादशाही के संस्थापक मराठे समर्थ भी थे। विरोध कौन करता ? यह सवाल अक्सर मेरे मन मे उठता रहा है। बनारस का होने के नाते, मैं यह सवाल काशी के कुछ विद्वानों से पूछता भी रहा हूँ। कुछ ने कहा कि विवाद न हो और मस्जिद से जुड़े लोगों की भावनाओं को आहत करके विश्वनाथ खुद भी प्रसन्न नहीं होंगे और तब काशी के विद्वान पंडितों ने भी इस विचार का विरोध किया था कि देवस्थान, चाहे, किसी भी धर्म का हो उसे भग्न, ध्वस्त और विकृत नहीं करना चाहिये, अतः एक नए स्थान पर जो पड़ोस में ही है, बाबा प्रतिष्ठित हुए।

बनारस गलियों का शहर हैं। इन गलियों का व्याकरण जटिल भी है और अगर आप समझ जांय तो सरल भी है। गलियों से होते हुए आप राजघाट के पुल से निकल कर लंका तक पैदल जा सकते हैं। यह सफर अपने आप मे ही आनंददायक है। ट्रेवल कम्पनियां विदेशी टूरिस्टों को लेन वाचिंग, यानी गलियों में घुमाने का भी एक कार्यक्रम अपने इटिनियरी मे रखती हैं। ये गालियां, आदि केशव से लेकर असी तक के पक्के घाट, उत्तरवाहिनी गंगा, गंगा का चंद्राकर प्रवाह, प्रवाह पर डोलती विविध आकार की डोंगियां, मंदिरों की घण्टियाँ और उदयति मिहिरो की चमक काशी को तीन लोको से न्यारी बना देती है।

पर आज बनारस से एक ऐसी खबर आयी है जिसने उन सबको विचलित कर दिया है जो काशी और बाबा से प्यार करते हैं। वाराणसी के असी नदी के किनारे कूड़ो के बीच शिवलिंग बिखरे मिले हैं । शिव का यह प्रतीक, शिव के ही नगर में जगह जगह से खोद करके बोरों में भर कर कूड़े और गड्ढे में फेंक दिया जाय यह अकल्पनीय है। ऐसा अनर्थ औरंगजेब के भी काल मे नहीं हुआ होगा, जैसा अब यह हो रहा है।

सुनते हैं काशी को सुंदर बनाने की एक योजना पर काम चल रहा है जिसके अनुसार काशी विश्वनाथ से लेकर गंगा तक एक तीस फुट का कॉरिडोर बनाने की योजना है। प्रशस्त मार्ग और बहुमंज़िली अट्टालिका ही विकास का पैमाना नहीं होती है। बनारस के जिस सौंदर्य पर लोग फिदा हैं और काशी के जिस आकर्षण से लोग खिंचे चले आते हैं वह काशी का अवधूत स्वरूप है।, टेढ़ी मेढ़ी गलियां हैं। भांग ठंडाई की दूकाने हैं। गलियों चौराहों पर अलमस्त टहलते या बैठे पगुराते हुए नंदी हैं। हर घर के अंदर एक कोने में बिराजे छोटे बड़े आकार के शिवलिंग और कोउ मुखहीन विपुल मुख काहू जैसे लोग हैं।

पर इसी तथाकथित क्योटो बनाओ योजना के कारण विश्वनाथ मंदिर से लेकर घाट तक मकानों को सरकार ने खरीद या अधिग्रहित कर लिया । ये मकान निश्चित ही आधुनिक रूप की जीवनशैली को देखते हुए रहने योग्य सुविधाजनक नहीं हैं और न ही उन्हें कोइ खरीदने वाला होता। सरकार ने जो धन दिया वह लोगों को पर्याप्त से अधिक लगा तो लोगों ने उसे बेच दिया। यह अर्थतंत्र के परिवर्तन का परिणाम है। खरीद कर सरकार ने कॉरिडोर बनाना शुरू कर दिया। जब मकान तोड़े जाने लगे तो, घर, अतिक्रमण आदि भी टूटे और कई पुराने मंदिर भी उसी में से सामने आए। अब ये शिवलिंग उन्हीं तोड़फोड़ के मंदिरों के हैं या कहीं और भी कुछ क्योटो बनाओ योजना पर काम चल रहा है यह नहीं कहा जा सकता है।

मंदिर अगर इतने ज़रूरी हैं कि उनके बिना कोई आवश्यक जनहित की योजना पूरी नहीं हो रही है, तो उन्हें हटाया जा सकता है। मूर्तियां भी विस्थापित की जा सकती हैं। पर यह सब इस प्रकार भी किया जा सकता है कि काशी की परंपरा, विरासत, इतिहास या एक शब्द में कहें तो काशित्व और उन मंदिरों, शिवलिंगों से जुड़े आस्थावानों की आस्था को कोई ठेस न पहुंचे। उन्हें कूड़े और गड्ढे में न फेंक कर कहीं अन्य स्थान पर स्थापित किया जा सकता है।

यह भी विडम्बना है कि यह सब जिनके शासन काल मे हो रहा है वे हिंदू धर्म के स्वघोषित रक्षक हैं। पर सत्य तो यह है कि विदेशी आक्रांताओं ने जितना सनातन धर्म को हानि नहीं पहुंचायी होगी उससे अधिक इस हिंदुत्व ब्रिगेड ने हानि पहुंचायी है। आक्रांताओं ने सनातन धर्म की आत्मा को नहीं स्पर्श किया और अगर स्पर्श किया भी तो वे इसके दर्शन, विविधता, इतिहास और परम्परा से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। पर हिंदुत्व के इस अतार्किक और संघी स्वरूप ने तो सनातन धर्म की आत्मा पर ही आघात किया है।