एक स्वघोषित सच्चा हिन्दू खुलेआम, दिन दहाड़े, देश की राजधानी दिल्ली में बीच सड़क पर गोली चलाता है। पुलिस हाथ बांध कर देखती रहती है। याद रखिएगा, यह वही सच्चा हिन्दू है जिसे हिंदुत्व के नाम पर कट्टरता का पाठ सिखाया जाता है जैसे जिहाद के नाम पर एक मुसलमानों को आतंक का। एक मिलिटेंट और इस सच्चे हिन्दू में कोई फ़र्क़ नहीं।

यही इंसान अपने fb प्रोफाइल से पहले ही इस कारनामे की घोषणा कर चुका था। यह लाइव भी होता है। देश के निर्वाचित नेता दंगा भड़काने के नारे लगाते हैं, भाषण देते हैं इस तरह हमला करने के। उनके खिलाफ कुछ नहीं होता।

आतंकियों के साथ पकड़े गए पुलिस अफसर देविंदर सिंह के खिलाफ कुछ नहीं होता। JNU में हुए हमले के आरोपियों को गिरफ्तार नहीं किया जाता, क्यों? जबकि उनकी पहचान साफतौर पर ज़ाहिर है। वो एक विशेष धर्म से ताल्लुक नहीं रखते इसलिए? या एक खास विचारधारा के नहीं हैं इसलिए?

इस सच्चे हिन्दू को रोकने की कोई कोशिश नहीं होती। सावधानी तो छोड़िये जब वो बंदूक निकाल कर खुलेआम उसे लहरा रहा होता है तो पुलिस हाथ बाँध कर देखती है। CAA एक खास धर्म के खिलाफ नहीं है, नहीं है न? तो फिर इतना डर क्यों, कि आपको खुलेआम गोली चलवाने की ज़रूरत पड़ गयी?

दिल्ली पुलिस केंद्र सरकार के अंडर काम करती है। क्या गृहमंत्री जी ने इस ही दिन के लिए पूछा था कि, आप दिल्ली में दंगा भड़काने वाली सरकार चाहते हैं? क्या अब चोटिल व्यक्ति के प्रति प्रधानमंत्री जी की तरफ से कोई चिंता ज़ाहिर की जाएगी? या वो भी खास धर्म और जगह से ताल्लुक रखता है इसलिए कहा जाएगा कि वो तो घायल ही नहीं हुआ, जैसे सरकार ने कभी NRC का ज़िक्र नहीं किया।

मैं दिल्ली से बहुत दूर हूँ लेकिन कांप रही हूँ। दिमाग ने काम करना बन्द कर दिया है। मुझे नहीं पता वहाँ लोग कैसे ज़िन्दा हैं? कैसे उनके पास इस सरकार का विरोध करने की हिम्मत आ रही है? मुझे नहीं पता कश्मीर में लोग कैसे इतने सालों से इससे भी बदतर हालातों में रह रहे हैं, मुझे नहीं पता और सच बताऊँ तो अब मैं डर गयी हूँ इसलिए नहीं कि किसी विरोध को दबाया जा रहा है, इसलिए कि मैं अपने सामने चूहे को मारे जाते हुए भी नहीं देख सकती और आज तो एक जीते जागते इंसान पर खुलेआम कानून के सामने गोली चलाई गयी।

मेरे जैसे इंसान हिंसा से डरने से अधिक उसे स्वीकार नहीं कर पाते, वो बर्दाश्त ही नहीं कर सकते कि कोई ऐसा भी कर सकता है। ये सरकार आज मेरी नज़रों में मर चुकी है। आज से 72 साल पहले एक विचारधारा ने गांधी को गोली मारी थी, आज 72 साल बाद उस ही विचारधारा ने उनके सपनों के भारत को भी गोली मार दी है।