विचार स्तम्भ

भरोसे को मारने पर उतारू, ये बलात्कारी?

भरोसे को मारने पर उतारू, ये बलात्कारी?

दिल्ली मे डेढ़ साल की बच्ची के रेप की खबरों के बीच बार-बार मुझे फिर वही बातें याद आ रही हैं, जो हर रेप और गैंगरेप की खबरों के बीच याद आती हैं। क्या हो गया है हमारे समाज को? अगली सांस हम अपनी आजादी से ले पाएंगे कि नहीं, हमें यह नहीं पता। कुछ वहशियों के चलते किसी पुरुष पर भरोसा नहीं कर पा रहे हम, हमें टंकियों में डाला जा रहा है कि कहीं रेप न हो जाए…!
दिल्ली की 5 साल की गुड़िया की कहानी तो याद होगी आपको? निर्भया को तो नहीं भूले होंगे आप? लेकिन, रेपिस्ट्स भूल गए हैं शायद! छोटी-सी बच्ची के गुप्तांग में मोमबत्ती और शीशी घुसाने वाली घटना ने उस वक्त माओं के दिल को खौफ से भर डाला था। आगे जो लिखा है, शायद आपको छोटी-सी बात लगेगी, लेकिन एक मां के दर्द को समझिए, क्योंकि इसका सरोकार हम सबसे है, गर्त में जाते समाज से है। जिस रोज ये खबर आई उस दिन मैं ऑफिस से घर तक पहुंच गई थी, बस चंद सीढ़ियों का फासला था। रोज़ के मुकाबले थोड़ा लेट हो गई थी सो देखा ग्राउंड फ्लोर पर कुछ औरतें (सब जान पहचान कीं) कुछ बातें कर रही थीं। मुद् सुर्खियों में था…रेप, गैंगरेप, बलात्कार, सवा साल की बच्ची…। मैं पहुंची तो कानों में कुछ ऐसे शब्द पड़े, ‘अरे ये रेप नहीं रेप से ऊपर है, आखिर कैसा आदमी होगा वो? इतनी छोटी बच्ची के साथ ऐसी दरिंदगी…’। मुझसे रहा न गया और मैं सोचने लगी अच्छा हुआ मेरे पास बेटी नहीं है । गुड़ियों से खेलने वाली उम्र में मैं उसे कैसे समझा पाती कि बेटा अपने बाबा, नाना, चाचा, फूफा, और भाई के करीब भी संभलकर जाना? पलभर के लिए भी किसी के पास भी अपनी बिटिया को नहीं छोड़ पाती। भरोसा कैसे कर पाती? पार्क में तो दूर घर के आंगन में भी उसे अकेला छोड़ने की हिम्मत न कर पाती। कब पलभर के सुख के लिए कोई मुझसे मेरी बिटिया की हंसी छीन सकता है, इस चिंता से दूर कैसे रह पाती मैं? मैं साए की तरह चिपक कर उसकी आजादी, उसका बचपन कैसे छीन पाती?
ऐसी उम्र जब बच्चे कपड़ों से मम्मी और पापा में फर्क करते हैं। फ्रॉक को अपनी ड्रेस और पैंट को भईया की ड्रेस समझने वाली गुड़िया को कैसे समझा पाती कि फर्क सिर्फ ड्रेस का नहीं मेरी गुड़िया…। छोटी-छोटी बच्चियों को जब रंग-बिरंगे कपड़े पहने देखती थी तो लगता था मेरे घर में भी एक नन्ही गुड़िया होती दोनों बेटे आए तो खुशी मां बनने की तो हुई लेकिन बेटी की चाहत अब तक बनी हुई थी। अब नहीं…अब बिल्कुल नहीं, रूह कांपती है…अच्छा हुआ मैंने बेटी नही गोद ली । मैं भले ही कितनी अच्छी मां बन जाती लेकिन बचपन में अपनी गुड़िया को गुड़ियों से न खेलता देख नहीं पाती! मेरे साथ टीवी देखते हुए जब वो मुझसे सवाल करती कि ममी इस लड़की के साथ क्या हुआ तो मैं क्या कहती? गुड टच, बैड टच एक बार को किसी तरह से समझा भी देती लेकिन उसका बचपन, उसकी आजादी छीनने की हिम्मत न जुटा पाती। अंकल के घर मत जाना… न कह पाती, मामा से दूर रहना न कह पाती, भाई से न चिपकना, न कह पाती।
ख़ुद से कहा…ज्यादा मत सोचो, अब घर जाओ। घर के दरवाजे तक मैं सीढ़ियां चढ़ने लगी…सोचते हुए कि मेरा का डर कितना जायज है। किस दौर में जी रहे हैं हम, जहां ‘भरोसा’ शब्द बेमाने है। बलात्कारी जानता है कि उसने क्या किया है। लेकिन, उस क्षण उस पर क्या सवार होता है कि वह खुद को रोक नहीं पाता? आखिर क्यों आपसी भरोसे को मारने पर उतारू हैं ये बलात्कारी? क्यों बेटियों को सुरक्षित हवा न देकर माओं को सोचने पर मजबूर कर रहे हैं, अच्छा हुआ मैंने बेटी नहीं पैदा की। न जाने कितनी माएं आज यही सोच रही होंगी कि अच्छा हुआ मेरी बेटी नहीं… या हे भगवान! मुझे कभी बेटी न देना.

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