आप अमिताभ-शाहरूख की तरफ देखिए…जमीनी स्तर पर दीपिका-तापसी नजर आएंगी। अपनी आंखों पर विश्वास कीजिए, लगातार आ रही बुरी खबरों के बीच थोड़ा खुश हो जाइए। यह नया हिंदुस्तान है, जो लैंगिग भेद से परे….सच की आवाज के साथ है। मौन में भी मुखर है।

आज जेएनयू में काले कपड़ों में लिपटी दीपिका पादुकोण का पहुंचना युवा पीढ़ी के लिए बेहद खास है। वे दस मिनट तक जेएनयू कैंपस में विरोध की पुरजोर आवाज बुंलद कर रहे छात्रों के बीच रही। उन्होंने कुछ ना बोला लेकिन यह मौन ही मुखर आवाज है…जिसकी गूंज दूर तक जाएगी।

जेएनयू जैसे शिक्षा के मंदिर में रविवार की काली रात जो हुआ वह बेहयायी का नाच है। होस्टल में घुसे नकाबपोशों के नकाब खींच कर उनके चेहरे से जुदा करने चाहिए। जामिया में पुलिस के घुसने का विरोध था, जेएनयू में गुडों के घुसने पर आस-पास दस किलोमीटर के दायरे में रहने वाले हर सरकारी अधिकारी को उनके अधिकार से वंचित कर देना चाहिए। जो वक्त रहते बच्चों की मदद के लिए ना आ सके। दस किलोमीटर की दूरी किसी भी वाहन से बीस मिनिट से ज्यादा का समय तो ना लेती फिर जब स्थिति आपातकालीन हो।

किस विश्वास से हम अपने बच्चों को यूनिवर्सिटी के कैंपस में भेजे। यहां तो पुलिस क्या और गुंडे क्या ? जिसे मन हो डंडा या हॉकी उठा स्टूडेंट्स का सिर फोड़ने को तैयार है। लेकिन भूलिए मत जिनका सिर आप तोड़ रहे हैं, वह युवा है, जिनका खून लालम-लाल हैं। जब भी यह लाल रक्त बहेगा तो क्रांति आएगी…