यों तो सरकारों की ऊंचा सुनने की व्याधि हमें आम दिनों में भी कुछ कम नहीं सताती, लेकिन इन दिनों जब एक ओर कोरोनाजन्य महामारी मौतें बांटती फिर रही है, दूसरी ओर उससे बचाने के नाम पर लागू लॉकडाउन भी जानलेवा सिद्ध हो रहा है। कम से कम आबादी के निर्बल आय वर्ग के उस बड़े हिस्से के लिए, जिसे फिलहाल सरकारी अधिकारियों, स्वयंसेवी संगठनों और सम्पन्न तबकों की सदाशयता के भरोसे छोड़ दिया गया है। छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के मोदकपाल इलाके के आदेड गांव की बारह साल की जमलो मडकाम  नाम की उस बच्ची की मौत का शायद ही किसी स्तर पर कोई नोटिस लिया जाये, जो लॉकडाउन 2.0 की मुसीबतों से त्रस्त होकर तेलंगाना के पेरुल गांव से मां-बाप के साथ जंगल के रास्ते वापसी में एक सौ किलोमीटर पैदल चलने के बाद डिहाइड्रेशन की शिकार होकर जान गंवा बैठी। भले ही हर बच्चे की मौत को भविष्य के दम तोड़ने के रूप में लेने की जरूरत महसूस  की जाती हो।

2017 के सितम्बर महीने में झारखंड के सिमडेगा जिले की निवासिनी कोयली देवी की ग्यारह साल की बेटी संतोषी ने भात-भात कहते हुए जान गंवा दी थी, तो उसकी शर्म ही कहां महसूस की गई थी? जिस सरकार ने राशनकार्ड के आधार से लिंक न होने के कारण उसकी मां को राशन देना रोक दिया था और जिसके कारण मां-बेटी दोनों की भूख अनिवारणीय हो गई थी, उसने भी यह कहकर पल्ला झाड़ लिया था कि संतोषी की मौत भूख से नहीं मलेरिया से हुई। संतोषी की ही तरह इस बच्ची की मौत भी कई महानुभावों को बेहद आम और ‘चर्चा के लायक भी नहीं’ ही लगने वाली है। लेकिन सच पूछिये तो उसके साथ जो कुछ हुआ, वह लॉकडाऊन की भयावह और मार्मिक तस्वीरों में से तो एक है ही, हमारे सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ जबरदस्त टिप्पणी भी है।कोरोना के कहर के बावजूद जी-20 देशों में सबसे बेहतर अर्थव्यवस्था को लेकर आश्वस्त ‘न्यू इंडिया’ के उपेक्षित भारत के अंधेरे हिस्से में पैदा हुई, यह बच्ची संतोषी की ही तरह खेलने कूदने और पढ़ने-लिखने की नादान उम्र में ही पेट भरने की समस्या के सामने निःशस्त्र थी। जिससे लड़ने के लिए वह अपने मां-बाप व गांव के कुछ लोगों के साथ दो महीने पहले ही तेलंगाना गई थी। वहां वह पेरुल गांव में मिर्ची तोड़ने का काम करती थी और बदले में कुछ पैसे पाती थी। प्रधानमंत्री ने 25 मार्च को बिना किसी पूर्व तैयारी के अचानक इक्कीस दिनों का देशव्यापी लॉकडाउन लगा दिया तो न सिर्फ उसका बल्कि उसके माँ-बाप का काम भी ठप हो गया और जिस भूख को वे इस बूते छत्तीसगढ़ में छोड़ गये थे, कि परदेस जाकर हाथ-पैर चलायेंगे तो खाने भर को तो पायेंगे ही, उसने वहां भी सताना शुरू कर दिया।

मदद के बड़े-बड़े सरकारी दावों के बीच लावारिस-से उन्होंने जैसे-तैसे इक्कीस दिन इस उम्मीद में काट दिये कि शायद उसके बाद चीजें फिर पहले जैसी हो जायें। लेकिन 14 अप्रैल को लाकडाउन-2 के बाद दुश्वारियां बर्दाश्त के बाहर हो गईं, तो उन्हें अपने देस लौटने में ही गनीमत दिखी। लेकिन वे न चीन के वुहान में फंसे भारतीयों में थे, न राजस्थान के कोटा में फंसे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों में कि उनकी शुभचिन्तक सरकारें उनकी यात्रा के लिए विमानों, बसों या विशेष परमिटों की व्यवस्था कर देतीं। उन सुविधासम्पन्न घरों से तो खैर उनका दूर-दूर का भी वास्ता नहीं था।  बढ़ती गर्मी के बीच जिनके बड़े और बच्चे एसी में बैठकर लॉकडाउन का टाइम पास करने के तरीके ढूंढ रहे हैं या ऑनलाईन कक्षाओं में पढ़ रहे हैं।

अन्य प्रवासी मजदूरों के अनुभवों से उन्हें पता था, कि वे राजमार्गों पर पैदल चलते भी दिख गये तो पुलिस की बदसलूकियां भी झेलनी पडेगी क्योंकि इस कोरोनाकाल में भी वह वीवीआईपी संस्कृति सर्वथा निरंकुश होकर कुलांचें मार रही है। छः साल पहले सत्ता में आये प्रधानमंत्री ने खुद को प्रधानसेवक बताकर जिसके हर हाल में खात्मे का एलान किया था। इसलिए ‘मरता क्या न करता’ की तर्ज पर यह बच्ची और उसके माता-पिता पैदल-यात्रा पर निकले, तो उन्होंने जंगल का ऐसा रास्ता चुना, जिस पर पुलिस वालों से भेंट न हो। इस रास्ते पर तीन दिन लगातार चलते हुए करीब सौ किलोमीटर की दूरी तय करके वे अपनी मंजिल से कुछ ही किलोमीटर दूर रह गये थे, कि बच्ची को डिहाइडेªशन हुआ और उसकी सांसें चूक गईं। अब इसे संयोग कहें या कुछ और कि इसी दिन सरकार ने अपने गोदामों में भरा अतिरिक्ति चावल भूखे गरीबों में वितरण के बजाय अमीरों के लिए सेनेटाइजरों हेतु इथेनॉल बनाने हेतु देने का फैसला कियां।

बच्ची की मौत के बाद जैसा कि आमतौर पर होता है और महाकवि नागार्जुन ने अपनी एक प्रसिद्ध कविता में ‘मरो भूख से फौरन आ पहुंचेगा थानेदार’ लिखकर जिसका जिक्र किया है। सत्ता प्रतिष्ठान सक्रिय हुआ और मौत के बाद ही सही, बच्ची को अस्पताल नसीब हुआ। वहां की गई जांच में उसका कोराना टेस्ट निगेटिव आया। इस तरह वह भी उन दो सौ से ज्यादा लोगों में शामिल हो गई, जो कोरोना से नहीं कोरोना से बचने के लिए किये गये अविवेकपूर्ण लॉकडाउन की भेंट हो गये और खबर नहीं बने। अलबत्ता, महाराष्ट्र के पालघर में आतताई भीड़ के नृशंस हमले  में जान गंवाने वाले दो साधु और ड्राइवर इसका अपवाद हैं। जो लॉकडाउन के कारण सूरत जाने के लिए ‘निरापद’ रास्ता चुनने के फेर में न पड़ते तो उस क्षेत्र में जाते ही नहीं और बच जाते।

सत्ता-प्रतिष्ठान में जरा-सी भी शर्म बाकी होती, तो वह समझता कि इस बच्ची का यों जान गंवाना उस सरकारी व्यवस्था का भी दम तोड़ना है, जो न सिर्फ मजदूरों की हितैषी होने का दावा करती बल्कि बाल अधिकारों और मानवाधिकारों को भी सुनिश्चित करने का दम भरती है। कायदे से इस बच्ची का हक था कि वह शिक्षा और भोजन के अधिकार तो पाती ही, साथ ही वे अधिकार भी पाती, जो संयुक्तराष्ट्र संघ और भारत सरकार ने बच्चों के लिए निर्धारित कर रखे हैं। अफसोस कि उसे जीते जी इनमें से एक भी अधिकार नहीं मिला, जान गई, तो भी आधी-अधूरी खबर ही बन पाई और सत्ता प्रतिष्ठान का बेशर्म गरीब विरोधी और संवेदनहीन रवैया अभी भी बदस्तूर है। क्या आश्चर्य कि इसके चलते गरीबों पर दोहरी मार पड़ रही है। वे घर में रहें तो भूख चैन से नहीं रहने दे रही और बाहर निकलें तो पुलिस की बेरहमी। उत्तर प्रदेश के अम्बेडकरनगर जिले के टांडा में पुलिस ने भूख से परेशान रिजवान नामक एक युवक को तब बेरहमी से पीट डाला, जब वह बिस्कुट लेने जा रहा था। इसके दो दिन बाद उसकी मौत हो गई। मध्य प्रदेश से भी खबर है कि बंशी कुशवाह नाम के एक किसान को पुलिस ने तब पीटा जब वह अपने खेत में बंधी गाय को पानी देकर लौट रहा था।

यह असंवेदनशीलता तब है, जब कोराना और लॉकडाउन दोनों देश को मुश्किल में डाले हुए हैं। यूनाइटेड नेशन यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च के अनुसार कोरोना की महामारी और लॉकडाउन से उत्पन्न हुई परिस्थितियों में देश में गरीबों की संख्या बढ़कर 91.5 करोड हो जाने का अंदेशा है, जो कुल आबादी का 68 फीसदी हिस्सा होगा। अभी कुल आबादी के 60 फीसदी, करीब 81.2 करोड़ देशवासी गरीबी की रेखा से नीचे हैं। हालांकि प्रायः सारे काम गरीबों के ही नाम पर करने वाली सरकारों ने उनकी इस संख्या को भी विवादास्पद बना डाला है। काश, वे समझतीं कि केवल दो प्रतिशत अमीरों की सम्पत्ति में बेहिसाब बढ़ोत्तरी से देश में खुशहाली नहीं आने वाली। वह तब आयेगी, जब गम्भीरता से विचार कर उन सारी विडम्बनाओं का समाधान किया जायेगा, जिन्हें गरीबी खुद को झेलने वालों के लिए अपने साथ लाती है।

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Krishnapratap Singh