आज सरकारी कर्मचारियों के महंगाई भत्तों तथा अन्य भत्तो पर जो कटौती की गयीं है उसका कारण आर्थिक संकट है। पर इस आर्थिक संकट का तात्कालिक कारण कोविड 19 अवश्य है, पर इस संकट की पृष्ठभूमि में 2016 से ही लिए जा रहे कुछ ऐसे आर्थिक निर्णय हैं जिनसे न केवल देश की आर्थिक स्थिति गिरती चली गयी और अब जब यह महामारी आ गयी तो हम इस संकट में बुरी तरह से फंस गए।

2014 के बाद, मेक इन इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया, स्टैंड अप इंडिया आदि मोहक नामों वाली कितनी ही योजनाएं, भव्यता के साथ प्रारंभ हुयी पर आज तक न तो सरकार यह बता पाई कि इन महान और कर्णप्रिय नामधारी योजनाओं के अंतर्गत देश मे कौन सी औद्योगिक प्रगति हुई और किस क्षेत्र में हम आत्मनिर्भर हुये और न ही सरकार समर्थक मित्रों को यह साहस हो चुका कि वे अपनी ही सरकार से यह असहज सवाल कर सकें।हम जैसे लोग जिन्हें सरकारी की नीति, नीयत और नियति पर प्रारंभ से ही अविश्वास रहा है, यह सवाल ज़रूर उठाते रहे हैं और सरकार ने कभी भी उन सवालों का उत्तर नहीं दिया है। इसके अतिरिक्त यह सवाल उठाने वाले लोग, देश विरोधी, धर्म द्रोही तक माने जाने लगें। पर आज जब देश के समस्त केंद्रीय सरकार के कर्मचारियों के महंगाई भत्ते और अन्य भत्तों को निर्ममता पूर्वक काट लेने की घोषणा कर दी गयी है तो एक असन्तोष पनप गया है। यह कटौती केवल केंद्र सरकार तक ही नहीं रहेगी, बल्कि यह राज्य सरकार तक भी आएगी।

यह सरकार, अब तक की सबसे वित्तीय कुप्रबंधन की सरकार है। 2016 की नोटबन्दी के बाद से जो आर्थिक सूचकांक, चाहे वह आयात निर्यात से सम्बंधित हों, या मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के, या डॉलर रुपये के विनिमय दर के, या जीडीपी के प्रतिशत के, या सरकार को मिलने वाले राजस्व के, हर क्षेत्र में गिरावट लगातार गिरावट दर्ज होती गयी और यह सिलसिला अभी भी थमा नहीं है। कोरोना न भी आता तो भी हमारी आर्थिक स्थिति दयनीय ही रहती और अब तो कोढ़ में खाज की तरह की स्थिति हो गई है।

प्रधानमंत्री जी कह रहे हैं कि कोरोना के बाद एक नया वर्ल्ड आर्डर बनेगा। यह कोई नयी बात नहीं है। हर बड़ी घटना चाहे वह क्रांति हो या त्रासदी के गर्भ में एक नए वर्ल्ड आर्डर का बीज अंकुरित हो ही जाता है। फ्रेंच क्रांति, औद्योगिक क्रांति, प्रथम विश्व युद्ध, द्वितीय विश्वयुध्द के बाद नए वर्ल्ड आर्डर बने हैं। कोरोना के बाद भी एक वैश्विक परिवर्तन अवश्यम्भावी है। यह काल चक्र है जो समय समय पर अपनी गति और घूर्णन बदलता रहता है। पर इस नए वर्ल्ड आर्डर में 130 करोड़ की विशाल जनशक्ति, विविध प्राकृतिक और बहुलतावाद से भरे संसाधनों के साथ भारत की क्या स्थिति होगी क्या इस आसन्न भूमिका पर कभी सरकार ने सोचा है ? हो सकता है सरकार ने सोचा भी हो और कुछ कर भी रही हो। पर जनता को यह जानने का अधिकार है कि वह बदलते वर्ल्ड आर्डर में क्या करेगी और कहां रहेगी।

कोरोना ने चीन की आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों पर आघात पहुंचाया है। अमेरिका और जापान जैसे महत्वपूर्ण आर्थिक ताकतों का यह मानना है कि यह आपदा प्रकृति जन्य नहीं बल्कि मानव जन्य है। हालांकि इस आरोप के संबंध में कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिले हैं अब तक पर यह आशंका निर्मूल है यह भी अभी तक प्रमाणित नहीं हुआ है। जापान ने चीन से अपने कुछ महत्वपूर्ण उद्योगों को समेटने के निर्णय कर लिए हैं और यह प्रक्रिया शुरू भी हो चुकी है।

चीन से अन्य देशों के औद्योगिक इकाइयों के पलायन के समय यह उम्मीद बंधी थी कि वहां से निकल कर वे उद्योग भारत मे आएंगे औऱ भारत की औद्योगिक दशा सुधरेगी। लेकिन भाजपा के ही समर्थक शेषाद्रि चारी के एक ट्वीट से यह ज्ञात होता है कि चीन से पलायित होने वाली कम्पनियों ने भारत के प्रति उदासीनता दिखाई है। शेषाद्रि अंग्रेज़ी टीवी चैनलों पर बीजेपी के पक्षकार हैं संघ का बौद्धिक चेहरा हैं । अपने ट्वीट में वे कहते हैं,

“नोमुरा ग्रुप के एक अध्ययन से पता चला कि पिछले कुछ महीनों में चीन से क़रीब 56 विदेशी फ़ैक्टरियों ने ठिकाना बदला ।26 वियतनाम चली गईं , 11 ताईवान गईं और 8 ने थाईलैण्ड का रुख़ किया । भारत के हिस्से में सिर्फ तीन आईं । इनका “मेक इन इंडिया”और प्रधानमंत्री कार्यालय से सवाल है कि ऐसा क्यों हुआ ?नौकरशाही,राजनीति,काहिलियत या उत्साहविहीनता ?”

क्या अब भी यह सवाल सरकार से नहीं पूछा जाएगा कि भारत के हिस्से में केवल तीन ही क्यों आई ? क्या हम नए वर्ल्ड आर्डर के लिये केवल जुमलों में ही तैयार हैं और वास्तविकता में हमें अंदाज़ा ही नहीं कि हम सोच क्या रहे हैं और हमें करना क्या है। यह न केवल एक वैचारिक दारिद्र्य है बल्कि हद दर्जे की नीति विहिनिता। क्या सरकार को यह नहीं बताना चाहिए कि मेक इन इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया और स्टैंड अप इंडिया में कितने उद्योग लगे और देश की आर्थिकी में उनका क्या योगदान रहा ?

सरकार न केवल नीति और नीयत के ही संकट से ग्रस्त है बल्कि प्रशासनिक रूप से इसका प्रदर्शन निराशाजनक रहा है। 2016 की 8 नवम्बर को रात 8 बजे नोटबन्दी की घोषणा के क्रियान्वयन का प्रश्न हो या जीएसटी को लागू करने का सवाल हो या अब लॉक डाउन प्रतिबन्धों के पालन कराने का, इन तीनों निर्णयों में सरकार की प्रशासनिक अक्षमता स्पष्तः दिखी है। नोटबन्दी के संबंध में दो महीने में जितने एक दूसरे को ओवरलैप करते हुए आदेश वित्त मंत्रालय और रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के जारी हुए उनकी संख्या और निर्गति ही यह बताने के लिये पर्याप्त है कि सरकार को खुद ही पता नहीं था कि वह नोटबन्दी करने क्यों जा रही है और इससे देश को लाभ क्या होगा। यही हाल जीएसटी के क्रियान्वयन का रहा। इसकी प्रक्रियागत जटिलताओं को लेकर एक मज़ाक़ चल गया कि इसकी जटिलता को सभवतः वित्त मंत्रालय भी हल न कर पाए।

कोरोना के बाद नया वर्ल्ड ऑर्डर क्या होगा, यह अभी अस्पष्ट है पर 2014 के बाद भारत मे सरकार के समक्ष जी जहाँपनाह मोड में जाने और सरकार से एक भी सवाल न पूछने की जो नयी संस्कृति जन्मी है वह संकीर्ण यूरोपीय राष्ट्रवाद की उपज है जो शनैःशनैः फासिज़्म के दरवाजे पर ले जाकर खड़ी कर देती है। चाहे मामला नोटबन्दी का हो, सरकार द्वारा किये गए वादों का हो, राजनीतिक दलों को मिलने वाले आर्थिक चन्दो का हो, या इलेक्टोरल बांड से जुड़ा हो या किसी भी सरकारी नीति का हो, या सरकार की लोकलुभावन घोषणाओं का हो या 100 स्मार्ट सिटी या बुलेट ट्रेन का हो, हर मुद्दे पर सरकार से सवाल न पूछने और सरकार की जवाबदेही तय न करने का ही यह घातक परिणाम है कि आज सरकार अपने कर्मचारियों के महंगाई भत्तो सहित अन्य भत्तो में कटौती करने जा रही है । सरकार यह कटौती आदेश रद्द करे और सेंट्रल विस्टा सहित अन्य अनुपयोगी प्रोजेक्ट्स को जून 2021 तक स्थगित करे और उसके धन से इस संकट का सामना करें।