December 7, 2021
आरजेडी

तेजस्वी यादव के राजनीतिक सलाहकार के नाम एक ख़त

तेजस्वी यादव के राजनीतिक सलाहकार के नाम एक ख़त

प्रिय संजय यादव
राजनीतिक सलाहकार, नेता प्रतिपक्ष
बिहार विधानसभा, पटना
आपका फेसबुक पोस्ट पढ़ा। पढ़ने के बाद बहुत अच्छा लगा कि लंबे समय के बाद विपक्ष को राजनीति का एक डॉक्टर मिला है जो राजनीति की बुनियादी समझ रखता है। आपकी पोस्ट से निम्नलिखित बातें निकलकर आती है जिसपर बिंदुवार चर्चा करना उचित है।

  1. “लगातार 20-25 वर्ष से चुनाव लड़कर हार रहे उम्मीदवारों को राज्यसभा या विधानपरिषद भेजने से निःस्वार्थ भाव से समर्पित कार्यकर्ताओं में निरुत्साह का भाव पैदा होता है”।

संजय जी, यह बात सही है कि कुछ लोग 20-25 वर्षों से चुनाव लड़कर हार रहे है। लेकिन, यह चुनाव कब लड़कर हारते है उस समय का भी मूल्यांकन होना चाहिये। यह वह समय था जब लालू यादव की राजद अपने ढ़लान की तरफ़ थी। राजनीतिक रूप से राजद एवं लालू यादव एक गाली बन चुके थे। नीतीश और भाजपा के विकास के स्वरूप में बिहार की जनता ने लालू यादव को “चारा चोर” के उपाधि से सुशोभित कर दिया था। लालू यादव के टिकट पर विधायक एवं सांसद बनने वाले लोग ही लालू जी को छोड़कर जदयू या भाजपा के टिकट पर सांसद या विधायक बन चुके थे।
यदि उस समय भी राजद के साथ कुछ लोग खड़े थे उसमें अली अशरफ फ़ातमी, रघुवंश प्रसाद सिंह, शहाबुद्दीन, जगदानन्द सिंह इत्यादि। आज यही लोग आपको समर्पित कार्यकर्ताओं के लिए निरुत्साही फ़ैक्टर मालूम पड़ रहे है। आपने हीना शहाब को जरूर दो बार उम्मीदवार बनाया और वह चुनाव हार गयी। मगर आज भी बिहार में मुसलमानों को राजद के साथ बाँधे रखने में फेविकोल का काम करती है।
पार्टी आलाकमान बखूबी जानते है कि सिवान के राजनीतिक समीकरण में हीना शहाब का चुनाव जीत पाना मुश्किल है इसलिए राज्यसभा भेजकर सिवान सीट राजद के लिए सुरक्षित कर लिया जाये। आप अपने उपरोक्त कथन से रघुवंश प्रसाद सिंह, जगदानंद सिंह, रामचन्द्र पूर्वे, प्रभुनाथ सिंह, हीना शहाब, सीताराम यादव इत्यादि के मनोबल को तोड़ने का काम कर रहे है। जब्कि राजद के अनुशंसा पर लगातार चुनाव हार रहे अखिलेश प्रसाद सिंह को राज्यसभा भेज दिया गया है।

  1. “कोई अवसरवादी पार्टी में शामिल हो जाये और ऐन चुनाव के वक़्त टिकट माँगने लगे, ऐसे को चाहिए कि पहले कई वर्ष पार्टी में खपाइये फिर कुछ मांगिये।”

बात सही है कि अवसरवादी को टिकट नहीं मिलना चाहिए। उन्हें चाहिए कि कई सालों तक पार्टी की सेवा करे तब कुछ माँगे। लेकिन, क्या आप इस बात पर खड़े उतर रहे है। लालू यादव जी को जेल की हवा खिलाने वाले शिवानन्द तिवारी जी के पुत्र को रातों-रात विधायक बना दिया जाता है। पूर्व राज्यसभा सांसद स्वर्गीय मोतिउर्रह्मान साहब के पुत्र और जदयू के वरिष्ठ नेता फैसल रहमान को रातों-रात पार्टी में शामिल करके टिकट दिया जाता है। उस समय यह विचार मन में क्यों नहीं आते? ख़ैर, यह पुरानी बात है। लेकिन, आपने जिस सन्दर्भ में अपनी पोस्ट लिखे है उसी सन्दर्भ में बात करते है। अशफ़ाक़ करीम साहब तो लोजपा में थे। राजद में कब शामिल हुए? आप अपनी बात को अपनी ही पोस्ट में गलत साबित कर रहे है।

  1. “जो आपके टिकट पर चुनाव लड़ते है उन्हें साधन एवं संसाधन की चिंता नहीं होती है बल्कि आलाकमान पर छोड़ देते है।”

संजय जी, आप पार्टी के आंतरिक मामलों को देखते है इसलिए आपकी जानकारी अधिक होगी। आपको बहुत सारी चिंताएँ होगी जिसमें संसाधन की चिंता भी होगी। मैं भी कई विधायकों एवं सांसदों के साथ काम कर चुका हूँ एवं कर रहा हूँ। इसलिए, पूरी यक़ीन के साथ बोल सकते है कि संसाधन की जितनी चिंता आलाकमान को नहीं होती है उससे अधिक उम्मीदवारों को होती है। इस मुद्दें पर अधिक गहराई तक जाना उचित नहीं है। वरना बहुत सारी सच्चाई सामने आजायेगी।
प्रिय संजय जी, यह बिहार की राजनीति है। बिहार की राजनीति को हरियाणा के संदर्भ में समझने का प्रयास नहीं कीजिये। हरियाणा में दस लोकसभा क्षेत्र है जबकि बिहार में चालीस लोकसभा क्षेत्र है। दक्षिण बिहार की पूरी राजनीति उत्तर बिहार के विरुद्ध चलती है जबकि उत्तर बिहार की राजनीति कोसी क्षेत्र और गैर कोसी क्षेत्र पर आधारित होती है। आप तो इस बुनियादी राजनीति को समझने में भी चूक गए कि दोनों राज्यसभा सदस्य कोसी क्षेत्र में ही भेज दिये। मनोज झा तो सहरसा के रहने वाले है जबकि अशफ़ाक़ करीम कटिहार के रहने वाले है। संजय जी, बिहार की राजनीति प्रत्येक घर के बाद बदलती रहती है। इसलिए, मैं आशा करता हूँ कि बिहार की राजनीति को समझने और विचार विकसित करने में जल्दबाज़ी नहीं करे।

तारिक़ अनवर चम्पारणी
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Tarique Anwar Champarani

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