मैं अक्सर कार्टून ढूंढता हूँ और उसे सोशल मीडिया पर मित्रों के लिये  साझा करता रहता हूँ। कार्टून सबसे मारक सम्प्रेषण हैं। नावक के तीर से भी अधिक मारक। एक अच्छा और संवेदनशील कार्टूनिस्ट बिना किसी टेक्स्ट के ही सब कुछ कह देता है और ग़ालिब का कालजयी शेर याद आ जाता है, वही तीरे नीमकश वाला। अब उसे भी यहाँ पढ़ ही लीजिए।

कोई मेरे दिल से पूछे तिरे तीर-ए-नीम-कश को
ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता ।

आज कोई कार्टून नहीं मिला पर पूरे देश को व्हाट्सअप यूनिवर्सिटी से एंटायर इतिहास पढा कर कार्टून बनने वाले पात्र मिलने लगे हैं तो मैंने सोचा आज का ब्लॉग उन्हीं पर हो जाय।

नीचे का ट्वीट देखे । यह ट्वीट Indianhistorypics का है जो उन्होंने आधुनिक भारतीय पुनर्जागरण के अग्रदूत राजा राममोहन राय के एक चित्र को उनके समाज सुधार में किये गए योगदान को लेकर एक टेक्स्ट के साथ छापा है। टेक्स्ट के अनुसार, राजा राममोहन राय एक समाज सुधारक और ब्रह्मो समाज के संस्थापक थे जिन्होंने सती प्रथा के उन्मूलन के लिये अपना योगदान दिया।

राजा राममोहन राय ( 22 मई 1772 – 27 सितंबर 1833 ) का भारतीय सामाजिक और धार्मिक पुनर्जागरण के क्षेत्र में एक विशिष्ट स्थान है। वे ब्रह्म समाज के संस्थापक, भारतीय भाषायी प्रेस के प्रवर्तक, जनजागरण और सामाजिक सुधार आंदोलन के प्रणेता तथा बंगाल में नव-जागरण युग के पितामह माने जाते हैं। उनके समाज सुधार के आन्दोलनों ने जहाँ समाज को प्रगति मार्ग पर चलने को प्रेरित किया, वहीं उनकी पत्रकारिता ने आन्दोलनों को सही दिशा दिखाने का कार्य किया। राजा राममोहन राय की दूर‍दर्शिता और वैचारिकता के अनेक उदाहरण इतिहास में दर्ज हैं। वे रू‍ढ़िवाद और कुरीतियों के विरोधी थे लेकिन संस्कार, परंपरा और राष्ट्र गौरव उनके दिल के करीब थे। यह उनका एक संक्षिप्त परिचय है जो हम सबने इतिहास की किताबों में पढ़ा ही होगा।

 

अब आप पायल रोहतगी का यह ट्वीट देखें। ट्वीटर पर इन्होंने अपना परिचय एक एक्टर और गुजरात बोर्ड की टॉपर के रूप में दिया है। वे अपने को भक्त टीम की भी बताती हैं। राजा राममोहन राय से सम्बंधित ट्वीट पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुये कहती हैं कि,

” नहीं, वे ब्रिटिश के चमचे थे, ब्रिटिशर्स ने उन्हें सती प्रथा को बदनाम करने के लिये आगे किया। सती प्रथा अनिवार्य नहीं थी, बल्कि उसे मुग़ल आक्रांताओं से बचने के लिये लागू किया गया था, और यह महिलाओं की अपनी इच्छा पर था कि वे सती हो जाँय। सती प्रथा प्रतिगामी नहीं थी।”

पायल रोहतगी को शायद एंटायर इतिहास में यह न पढ़ाया गया हो कि, सती प्रथा के रोक के  साथ साथ बंगाल में विधवा विवाह की भी परम्परा शुरू की गयी थी। फिर जब ब्रिटिशर्स आ गए थे तो बंगाल में मुग़ल राज का खात्मा तो 1757 के प्लासी के युद्ध के बाद ही हो गया था। तत्कालीन बांग्ला समाज मे सती प्रथा पर रोक के लिये राजा राममोहन राय के प्रयासों के कारण गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बेटिंग ने 4 दिसम्बर 1829 को सती प्रथा को गैर कानूनी घोषित कर दिया।

इस प्रथा का यह नाम देवी सती के नाम से मिला है जिन्हें दक्षायनी के नाम से भी जाना जाता है। हिन्दू धार्मिक ग्रंथों के अनुसार देवी सती ने अपने पिता दक्ष द्वारा अपने पति महादेव शिव के तिरस्कार से व्यथित हो यज्ञ की अग्नि में कूदकर आत्मदाह कर लिया था। सावित्री और सत्यवान की वैदिक कथा में सतीत्व का भी भाव मिलता है। प्राचीन काल मे भी, यह कोई प्रथा नहीं थी, पर अपवादस्वरूप कुछ उदाहरण ज़रूर मिलते हैं।

पति की मृत्यु के बाद, सती हो जाने का एक कारण यह भी था बाहरी आक्रमणकारियों द्वारा जब पुरुषों की हत्या कर दी जाती थी, उसके बाद उनकी पत्नियाँ अपनी अस्मिता व आत्मसम्मान को महत्वपूर्ण समझकर, उसकी रक्षा के लिये अपने पति की चिता पर अग्निप्रवेश  करने पर विवश हो जाती या बाध्य कर दी जाती थी। मध्यकाल में जिसमे मुस्लिम आक्रमण बहुत हुये तो अपने सतीत्व को बचाने के लिये स्वेच्छा या अक्सर बलात सती होने के भी कई उदाहरण लोक इतिहास में मिलते  है। कालांतर में महिलाओं की इस स्वैच्छिक विवशता का लोप होते-होते एक सामाजिक रीति जैसी बन गयी, जिसे सती प्रथा के नाम से जाना जाने लगा।

बलात सती होने और जबरन पति की चिता के साथ अग्निप्रवेश के लिये बाध्य करने के अनेक उदाहरण मिलेंगे। इसी के साथ इसका महिमामंडन भी शुरू हुआ। यह प्रथा कोई प्रथा नहीं बल्कि एक प्रकार की हत्या थी या आत्महत्या के लिये उकसाना था। 1829 के सती निषेध अधिनियम के बाद राजस्थान सरकार द्वारा, सती (रोकथाम) अधिनियम, 1987 पारित किया गया। 1988 में भारत सरकार ने इसे संघीय कानून में शामिल किया। यह कानून सती प्रथा की रोकथाम के लिए बनाया गया है जिसमें जीवित विधवाओं को जिन्दा जला दिया जाता था। सती के महिमामंडन को भी अपराध घोषित किया गया है।

पायल रोहतगी द्वारा राजा राममोहन राय को अंग्रेजों का चमचा मानना उनकी बुद्धि और ज्ञान पर तरस उपजाता है। वे इस प्रथा को प्रतिगामी नहीं मानती हैं। जब कि यह प्रथा, बर्बर, अमानवीय और एक क्रूर हत्या थी और किसी भी सभ्य समाज के लिये कलंक समान थी। यह प्रतिगामी प्रथा है। मैं ऐसे ट्वीट की निंदा करता हूँ। ट्वीट का लिंक प्रस्तुत है।