वित्तमंत्री अरुण जेटली ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को ‘ मसखरा शहजादा ‘ बोला है। यह हतासा और पराजित मन की भाषा है। अतीत में जाएँ तो यह कांग्रेस के लिए कोई नई बात नही है। आजादी की लड़ाई में, महात्मा गांधी को भी मसखरा बोला गया था। बोलनेवाला चर्चिल था।

उस समय चर्चिल के इशारे पर फुदकनेवाला साम्प्रदायिक गिरोह आज फिर उसी नक़्शे कदम पर है। तुर्रा यह कि परिस्थितियां वही हैं। चर्चिल ने महात्मा गांधी को मसखरा तब बोला था जब महात्मा गांधी ने अंग्रेजी हुकूमत के छक्के छुड़ा दिए थे। बांस के एक डंडे के सहारे गांव गांव जन जन घूमता वह फकीर सिविलनाफ़रमानी का एक दिव्यमंत्र बांट रहा था ,वह था ‘ न ‘। न बोलना सीख लो। न मारेंगे , न मानेंगे। तुम्हे जो जुल्म करना हो करो हम सहेंगे। आज वही मंजर सामने है।

छत्तीसगढ़ में पुलिस कांग्रेस दफ्तर में घुस कर हमला कर रही है, मध्यप्रदेश में व्यापम है, देश नोटबंदी झेल कर हांफ रहा है। चारो तरफ अराजकता। जुबान खुली नही कि जेल। ये सब जब राहुल गांधी उठाते हैं तो मसखरा हो जाते हैं?

जेटली साहब ! जिस अंग्रेजी निजामम में सूरज नही डूबता था, उस निजाम को एक ‘ मसखरे ‘ ने ग्लोब से बाहर फेंक दिया था। आज तुम्हारे निजाम में जब एकाधिकारवाद चरम पर है, बोलने तक की आजादी अवरोध पर खड़ी कर दी गई है, अवाम खुल कर सांस तक नही ले पा रही है, उसवक्त एक नौजवान खादी के लिबास में घूम घूम कर सिविलनाफ़रमानी का सबक दे रहा है तो आप उसे मसखरा बता रहे हैं।