व्यक्तित्व

राजसी जीवन को त्यागकर कर बनीं थी,पहली महिला मंत्री

राजसी जीवन को त्यागकर कर बनीं थी,पहली महिला मंत्री

राजकुमारी अमृत कौर भारत की एक प्रख्यात गांधीवादी, स्वतंत्रता सेनानी और एक सामाजिक कार्यकर्ता थीं. वह देश की स्वतंत्रता के बाद भारतीय मंत्रिमण्डल में दस साल तक स्वास्थ्य मंत्री रहीं. देश की पहली महिला कैबिनेट मंत्री होने का सम्मान उन्हें प्राप्त है.
वो महात्मा गांधी के बेहद करीबी मानी जाती थीं. विदेश में पढ़ाई करने के बाद वो वापस भारत लौटीं और स्वतंत्रता संग्राम में जुट गईं. राजकुमारी रहने के बाद भी वो बिलकुल साधारण रहना पसंद करती थीं. वो आम लोगों से मिला करती थीं. आइए उनके जन्मदिन पर जानिए उनके जीवन को करीब से.

जीवन

राजकुमारी अमृत कौर का जन्म 2 फरवरी 1889 में नवाबों के शहर लखनऊ में हुआ था. उनका ताल्लुक कपूरथला, पंजाब, के राजघराने से था.देश की सेवा के लिए उन्होंने अपना राजसी जीवन छोड़ दिया था. उनके पिता राजा हरनाम सिंह की आठ संतानों में अमृत कौर उनकी एकलौती बेटी थीं. उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा इंग्लैंड के स्कूल शेरबॉन से पूरी की थी. अमृतकौर ने स्नातक की डिग्री ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवसिर्टी से प्राप्त की थी. वे टेनिस की बेहतरीन खिलाड़ी थीं और इस खेल के लिए उनको बहुत सारे पुरस्कार भी मिले थे. वह एक रईस घराने से ताल्लुक रखती थीं और चाहतीं तो शान से राजसी जीवन निर्वाह कर सकती थीं परंतु उन्होंने सारे राजसी सुख छोड़कर देश के लिए काम करना शुरू किया. भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के दौरान उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी.उन्होंने एक समाज सुधारक के तौर पर भी महत्वपूर्ण कार्य किया. राजा हरनाम सिंह बहुत धार्मिक और नेक दिल इंसान थे, वे अक्सर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के महत्वपूर्ण नेताओं जैसे गोपाल कृष्ण गोखले आदि से मिलते रहते थे. शिक्षा पूरी करने के बाद अमृतकौर ने भी स्वाधीनता संग्राम के प्रति रुचि लेना शुरू किया और स्वतंत्रता सेनानियों के कार्य शैली के बारे में जानकारी हासिल की थी. वे महात्मा गांधी के विचारों से बहुत प्रभावित थीं. जलियावाला बाग कांड ने उनको बहुत आहत किया था और वहीं से उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के लिए काम करने का निर्णय लिया था. भौतिक सुख सुविधाओं से दूर उन्होंने महात्मा गांधी के साथ देशहित के लिए काम किया.

गांधीवादी राजकुमारी

विदेश से पढ़ाई करके जब वह वापस भारत लौटीं तब उनकी मुलाकात 1934 में मुम्बई में महात्मा गांधी से हुई. वह उनके विचार से बहुत प्रभावित हुईं थीं.उसी दौरान वह  ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का हिस्सा बन गयी. उसके बाद गांधी द्वारा जो भी आंदोलन किए गए, अमृत कौर उसका महत्वपूर्ण हिस्सा थीं. वे महात्मा गांधी के आर्दशों की अनुनायक थीं.वो महात्मा गांधी के साथ नमक सत्याग्रह और 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जेल भी गईं. महात्मा गांधी अकसर अपने पत्रों में अमृत कौर को ‘मेरी प्यारी बेवकूफ’ और ‘बागी’  बुलाते थे और आखिर में खुद को तानाशाह भी बुलाते थे.

महात्मा गांधी के साथ ” राजकुमारी अमृत कौर”

अमृत कौर ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ की प्रतिनिधि के तौर पर सन 1937 में पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत के बन्नू गई. ब्रिटिश सरकार को यह बात नागवार गुजरी और उसने राजद्रोह का आरोप लगाकर उन्हें जेल में बंद कर दिया. उन्होंने सभी को मताधिकार दिए जाने की भी वकालत की और भारतीय मताधिकार और संवैधानिक सुधार के लिए गठित ‘लोथियन समिति’ तथा ब्रिटिश पार्लियामेंट की संवैधानिक सुधारों के लिए बनी संयुक्त चयन समिति के सामने भी अपना पक्ष रखा.
राजकुमारी अमृत कौर ने महिलाओं और हरिजनों के उद्धार के लिए भी कई कल्याणकारी कार्य किए. वह बाल विवाह और पर्दा प्रथा के सख्त ख़िलाफ़ थीं और इन्हें लड़कियों की शिक्षा में बडी बाधा मानती थीं. उनका कहना था कि शिक्षा को नि:शुल्क और अनिवार्य बनाया जाना चाहिए.
राजकुमारी अमृत कौर ने महिलाओं की दयनीय स्थिति को देखकर ही 1927 में ‘अखिल भारतीय महिला सम्मेलन’ की स्थापना की. वह 1930 में इसकी सचिव और 1933 में अध्यक्ष बनीं. उन्होंने ‘ऑल इंडिया वूमेन्स एजुकेशन फंड एसोसिएशन’ के अध्यक्ष के रूप में भी काम किया और नई दिल्ली के ‘लेडी इर्विन कॉलेज’ की कार्यकारी समिति की सदस्य रहीं. ब्रिटिश सरकार ने उन्हें ‘शिक्षा सलाहकार बोर्ड’ का सदस्य भी बनाया, जिससे उन्होंने ‘भारत छोडो आंदोलन’ के दौरान इस्तीफा दे दिया था. उन्हें 1945 में लंदन और 1946 में पेरिस के यूनेस्को सम्मेलन में भारतीय सदस्य के रूप में भेजा गया था. वह ‘अखिल भारतीय बुनकर संघ’ के न्यासी बोर्ड की सदस्य भी रहीं.

आजादी के बाद

अपने राजनीतिक कैरियर के दौरान राजकुमारी अमृता कौर ने कई बड़े पदों को सुशोभित किया. स्वास्थ्य के क्षेत्र में उनकी उपलब्धियाँ उल्लेखनीय रहीं.भारत की आजादी के बाद अमृतकौर जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में केंद्र सरकार में शामिल हुईं.अमृत कौर पहली महिला थीं जो केंद्र में पद संभाल रही थीं. अमृत कौर ने  ̔स्वास्थ विभाग’ का कार्यभार संभाला. केंद्र सरकार में अमृत कौर एकमात्र ईसाई थीं.
1950 में उन्हें ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ का अध्यक्ष बनाया गया. यह सम्मान हासिल करने वाली वह पहली महिला और एशियाई थीं. डब्ल्यूएचओ के पहले पच्चीस वर्षों में सिर्फ दो महिलाएँ इस पद पर नियुक्त की गई थीं.
नई दिल्ली में ‘अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान’ की स्थापना में भी उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही. वह इसकी पहली अध्यक्ष भी बनायी गयीं. इस संस्थान की स्थापना के लिए उन्होंने न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, पश्चिम जर्मनी, स्वीडन और अमरीका से मदद हासिल की थी. उन्होंने और उनके एक भाई ने शिमला में अपनी पैतृक सम्पत्ति और मकान को संस्थान के कर्मचारियों और नर्सों के लिए “होलिडे होम” के रूप में दान कर दिया था.
करीब 14 साल के लिए वे ‘भारतीय रेडक्रास सोसाइटी’ की अध्यक्ष भी रहीं. वर्ष 1957 तक अमृतकौर भारत की  ̔स्वास्थ्य मंत्री थीं. उसके बाद वह मंत्रीपद त्यागकर सेवानिवृत्त हो गयीं परंतु कौर जब तक जीवित रहीं वह राज्यसभा की सदस्य थीं. वह एम्स के ‘क्षयरोग समिति’ और  ̔सेंट जान्स अंबुलेंस कार्प’ की अध्यक्ष भी थीं.
देशहित में अपना राजसी जीवन त्यागने वालीं इस महान शख़्सियत का 2 अक्टूबर 1954 को निधन हो गया.भारत के विकास में उनका योगदान सराहनीय था.

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Durgesh Dehriya

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