कल (8 फ़रवरी ) से राफेल मामले में बवाल मचा हुआ है। रक्षा मंत्रालय की राफेल सौदे से जुड़ी फाइल जिसे बेहद गोपनीय कहा जाता है और यह कागज़ पर गोपनीय है भी उसके कुछ पन्ने की फ़ोटो जिसे देखो वही अपने मोबाइल फोन की गैलरी में ले कर टहल रहा है। अमूमन यह नोटशीट कही जाती है जो फाइल या पत्रावली के बायीं तरफ हिंदी में इसे कहें तो टीपें और आदेश के रूप से एक मोटे और हाशियेदार कागज़ पर लिखी जाती है। दायीं तरफ तो कागज़ों का पुलिंदा होता है। लंबे और उबाऊ कागज़ जिसे सचिवालय के बाबू पढ़ते हैं और उन कागज़ों के सार को नोट ओर आर्डर शीट में लिखता है। ऐसी ही एक नोट और आर्डर शीट सार्वजनिक हो गयी है जो आज बहस का मुद्दा बनी हुयी है।

Image Credit – द हिंदू ( The Hindu )

अंग्रेजी का एक अखबार है द हिन्दू। यह बहुत ही पुराना और प्रतिष्ठित अखबार है। यह अखबार और इसकी पाक्षिक पत्रकारिता फ्रंटलाइन का मैं अपने विश्वविद्यालय के ही दिनों से पाठक हूँ। एन राम इसी अखबार के संपादक हैं। उन्होंने राफेल पर एक विशेष स्टोरी की जिसमे रक्षा मंत्रालय के इस नोट और ऑर्डरशीट का उल्लेख है। यह एक गोपनीय दस्तावेज होता है और यह एन राम को कहां से मिला यह तो राम ही बता पाएंगे।

द हिंदू अखबार ने रक्षा मंत्रालय की यह नोटशीट जो एक सरकारी दस्तावेज है जिसे अधिकारीगण अपने विचार सुझाव आदि, आपसी सलाह मशविरा के लिए एक-दूसरे के पास  भेजते हैं, छापी है। ये नोट 24 नवंबर, 2015 को तैयार किया गया।  इसके अनुसार राफेल सौदे में प्रधानमंत्री कार्यालय फ्रांसीसी पक्ष के साथ ‘समानांतर बातचीत’ चला रहा था। पीएमओ के इस समानांतर वार्ता के कारण, भारतीय समझौता दल INT की स्थिति कमजोर हुई । रक्षा सचिव ने नोट में तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर को भी इन तथ्यों से अवगत कराया था।

रक्षा सचिव जी मोहन कुमार ने अपने नोट में लिखा था

“RM may pl see. It is desirable that such discussions be avoided by the PMO as it undermines our negotiating position seriously.”

( रक्षा मंत्री जी कृपया देखें। यह अपेक्षित है कि प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा ऐसी बातचीत से बचा जाना चाहिये इससे समझौता करने की हमारी स्थिति पर गंभीर प्रभाव पड़ता है । )

रक्षा सचिव ने पत्रावली पर डिप्टी सेक्रेटरी ( एयर – 2 ) एसके शर्मा के लिखे नोट को बढ़ाया था। एसके शर्मा ने अपनी नोटिंग में लिखा था

“We may advise PMO that any Officers who are not part of Indian Negotiating Team may refrain from having parallel parlays (parleys) with the officers of French Government. In case the PMO is not confident about the outcome of negotiations being carried out by the MoD, a revised modality of negotiations to be led by PMO at appropriate level may be adopted in the case.”

( हम पीएमओ को यह सलाह देते हैं कि ऐसा कोई अधिकारी जो भारतीय समझौता दल का अधिकृत सदस्य नहीं है को फ्रेंच सरकार के अधिकारियों से समानांतर बातचीत से दूर रहना चाहिये। यदि फिर भी पीएमओ को यदि भरोसा नहीं है, कि रक्षा मंत्रालय की टीम द्वारा की जा रही समझौता वार्ता से कोई परिणाम नहीं निकलेगा तो वह  उचित स्तर पर समझौते के दूसरे विकल्प पर विचार कर सकते हैं । )

रक्षा मंत्री को जो नोट भेजा गया था, रक्षा मंत्री ने फाइल पर  यह लिखा

“It appears that PMO and French president’s office are monitoring the progress of the issue which was an outcome of the summit meeting. Para 5 appears to be an overreaction. Def Sec may resolve issue/matter in consultations with Pr. Sec to P.M.”

( ऐसा प्रतीत होता है कि पीएमओ और फ्रेंच राष्ट्रपति का कार्यालय, इस मामले की मॉनिटरिंग कर रहा है, जो दोनों  ( प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति ) के बीच हुई समिट मीटिंग में तय हुआ था। पैरा 5 एक अतिप्रतिक्रिया ओवर रिएक्शन है। रक्षा सचिव प्रधानमंत्री के निजी सचिव के साथ बात करके इस मामले को हल कर सकते हैं । )

वार्ता प्रमुख एयर मार्शल एसबीपी सिन्हा को यह पता नहीं है कि पीएमओ कोई समानांतर बात कर रहा है, रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों को भी यह बात पता नहीं है, और रक्षा सचिव भी इस तथ्य से अनजान हैं कि कोई और अधिकारियों का समूह राफेलसौदा पर फ्रेंच सरकार से बात कर रहा है। उन्होंने यह तथ्य रक्षा मंत्री के संज्ञान में ला दिया। यह एक रूल्स ऑफ बिजनेस की एक स्थापित प्रक्रिया है। रक्षामंत्री को भी यह पता नहीं है कि पीएमओ कर क्या रहा है। क्योंकि उन्होंने भी यही लिखा है कि  इट अप्पीयर्स यानी ऐसा प्रतीत होता है कि …।

ऐसी कौन सी गोपनीयता है कि रक्षा मंत्री तक को किसी समानांतर वार्ता की जानकारी नहीं है और वे इसे यह कह रहे हैं कि यह मोनिटरिंग लगती है। शराफत के शब्दों में रक्षा मंत्री ने अंग्रेजी में यह कहा कि अप्पीयर्स टू बी एन ओवर रिएक्शन, इसे मैं ज़रा और सरल करूँ तो यह कहूंगा कि ज्यादा उत्तेजित न हों, आप खुद इस मामले को प्रधानमंत्री के निजी सचिव से बात कर हल कर लीजिये। मतलब मैं इस बवाल में नहीं पडूंगा और आप अपने स्तर पर अफसर अफसर बात करके हल करें।

द हिन्दू ने रक्षामंत्री के इस नोट को हटा दिया है जिससे उस पर यह आरोप लगा कि उसने जानबूझकर गलत खबर प्लांट की है। यह अंश वर्तमान रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण ने जारी कर दिया और यह कहा कि पीएमओ इस बातचीत की मॉनिटरिंग कर रहा था। यह पीएम के अधिकार में आता है। प्रथम दृष्टया रक्षामंत्री से इस बात पर सहमत हूँ कि पीएम को मॉनिटरिंग करने का अधिकार है। वे कर सकते हैं।

अब सामानांतर वार्ता और मॉनीटरिंग में मौलिक अंतर क्या है ? समानांतर वार्ता वह होती है जो ट्रैक प्रथम जो आधिकारिक चैनल है से हो रही बातचीत के समानांतर अनौपचारिक बात कोई और उससे महत्वपूर्ण व्यक्ति कर रहा हूँ। यहां ट्रैक प्रथम पर एयर मार्शल एसबीपी सिन्हा सहित 7 सदस्यीय भारतीय समझौता दल है जो सरकार द्वारा समझौता करने के लिये अधिकृत है। और ट्रैक द्वीतीय पीएमओ के वे अधिकारी हैं जो फ्रेंच ग्रुप के साथ बात कर रहे हैं। समानांतर वार्ताएं चल सकती हैं। कोई वैधानिक बाधा नहीं है। कूटनीतिक वार्ताएं अक्सर ट्रैक प्रथम और ट्रैक द्वितीय दोनों ही स्तर पर चलती हैं। पर दोनों ही ट्रैक एक दूसरे से वे बातें साझा करते हैं जो वे कर रहे हैं जिससे वार्ता की भावी रणनीति बनाने में सफलता और सहजता हो। पर यहां तो दोनों ही ट्रैक यह बात कर रहें हैं, रहस्य है और यह रहस्य खुलता भी है तो फ्रेंच वार्ताकार स्टीफेन रेब के एक पत्र से।

द हिंदू की खबर के अनुसार रक्षा मंत्रालय को 23 अक्टूबर, 2015 तक ये ही नहीं पता था कि प्रधानमंत्री कार्यालय फ्रांस सरकार के साथ कोई सीधी बातचीत कर रहा है। इसका खुलासा 23 अक्टूबर, 2015 को तब हुआ, जब रक्षा मंत्रालय को फ्रांस के एक अफसर स्टीफन रेब की चिट्ठी मिली। स्टीफन रेब फ्रांस सरकार की ओर से राफेल  पर बातचीत करने वाले फ्रांसीसी दल के प्रमुख थे। उक्त पत्र के अनुसार, प्रधानमंत्री कार्यालय में संयुक्त सचिव जावेद अशरफ और फ्रांसीसी रक्षा मंत्री के कूटनीतिक सलाहकार लुइस वैसी के बीच इस सौदे पर फोन पर 10 अक्टूबर, 2015 को बातचीत हुई थी।

जब यह रहस्य खुला कि पीएमओ से स्टीफेन रेब के साथ एक और वार्ता जिसे हम ट्रैक द्वितीय वार्ता कह सकते हैं हो रही है तो रक्षा मंत्रालय ने वस्तुस्थिति से अपने मंत्री को अवगत कराया। नौकरशाही के स्तर पर तो रक्षा मंत्रालय को भी यह पता नहीं था कि कोई समानांतर बात चल रही है, पर हैरानी की बात यही है कि रक्षा मंत्री को भी राजनीतिक स्तर पर यह सूचना नहीं थी। अगर होती तो वे ऐसा प्रतीत होता है के बजाय यह लिखते कि आप लोग बात करते रहिये। पीएमओ इस समझौते की मॉनिटरिंग कर रहा है। और यह बात यहीं समाप्त हो जाती।

द हिन्दू के इस अंश से यह स्थिति और स्पष्ट हो जाएगी। दोनों ( रक्षा मंत्रालय और भारतीय समझौता दल के प्रमुख) के पत्रों में पीएमओ से इस मामले में जानकारी मांगी गई कि  क्या कोई समानांतर वार्ता चल रही  है ? 11 नवंबर, 2015 को प्रधानमंत्री कार्यालय के संयुक्त सचिव जावेद अशरफ ने सिन्हा को बताया कि लुइस वैसी और उनके बीच बातचीत हुई थी  और लुइस वैसी फ्रांस के राष्ट्रपति कार्यालय की सलाह पर यह वार्ता कर रहे हैं। द हिंदू के मुताबिक समानांतर बातचीत का ये अकेला मामला नहीं है। जनवरी, 2016 में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने भी पैरिस में फ्रांसीसी पक्ष के साथ राफेल पर बातचीत की थी।

अब अगर यह मॉनिटरिंग होती तो यह भ्रम फैलता भी नहीं। पीएमओ की तरफ से रक्षा मंत्रालय को स्पष्ट यह लिख कर भेजा जाता कि आप बातचीत करते रहिए और एक तयशुदा समय मे बातचीत के हर विंदु से पीएमओ को अवगत कराते रहिये। पीएमओ मॉनिटरिंग के दौरान बातचीत की समीक्षा भी करता और आवश्यक निर्देश भी देता। यह लिखित हो सकता था मौखिक भी। अगर लिखित होता तो पत्र के रूप में यह निर्देश जाता अगर लिखित नहीं यह मौखिक मीटिंग में होता तो इसके मिनिट्स में उसका उल्लेख होता। फिर उन निर्देशो की भी समीक्षा होती। पर ऐसा नहीं हुआ। इसलिए यह मॉनीटरिंग नहीं है। यह समानांतर समझौता वार्ता है। पर यह क्यों की जा रही थी,  यह तो पीएमओ ही बता पायेगा।

न्यूज़सेंट्रल24×7 वेबसाइट पर दुष्यंत के 9 फरवरी 19 के एक लेख के अनुसार, पूर्व रक्षामंत्री मनोहर पर्रीकर सरकारी काम कभी लंबित नहीं रखते हैं। यह उनकी आदत है। वे अधिक से अधिक एक दिन में ही पत्रावली पर जो भी निर्णय लेना होता है वे ले लेते हैं। पर इस मसले में उन्होंने अप्रत्याशित रूप से बहुत विलंब से अपनी बात कही। यह प्रकरण कि पीएमओ द्वारा समानांतर बातचीत से मुख्य वार्ता के हित प्रभावित हो सकते हैं पर लिखा पढ़ी 24 नवम्बर 2015 को शुरू हुई। दिसंबर 1, 2015 को रक्षा सचिव ने फाइल पर अपनी बात लिख कर रक्षा मंत्री को पत्रावली बढ़ा दी। पर यह ज़रूरी फाइल रक्षा मंत्री के पास 42 दिन पड़ी रही और रक्षा मंत्री का नोट जनवरी 11, 2016 को उस पर लिखा गया। यह 42 दिन क्यों लगे यह केवल रक्षा मंत्री ही बता सकते हैं। मुझे लगता है एन राम इसी पर यह कह रहे हैं कि रक्षा मंत्री बीमार हैं और ऐसी परिस्थिति में उनसे अधिक पूछताछ करना उचित नहीं है।

यह भी कहा जा रहा है कि, रक्षा मंत्रालय के इस नोट के अनुसार, पीएमओ के इस समानांतर वार्ता के कारण राफेल बनाने वाली कंपनी, दसॉ से सॉवरेन गारंटी या बैंक गारंटी भी नहीं ली जा सकी। लेटर ऑफ कम्फर्ट पर ही संतोष कर लिया गया। आमतौर पर रक्षा सौदों में माल सप्लाई करने वाली कंपनी को बैंक गारंटी या सरकारी गारंटी देनी पड़ती है. इसका फायदा यह होता है कि अगर माल सप्लाई करने वाली कंपनी अपनी शर्तों का पालन नहीं कर पाती है तो उसकी भरपाई बैंक सिक्योरिटी से कर ली जाती है।

अब सवाल उठता है कि क्या मोदी सरकार ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में गलतबयानी की है ? सरकार ने अक्टूबर, 2018 को सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दिया था। यह सीलबंद लिफाफे में दिया गया था। इसमें सरकार ने कहा था कि रफाएल सौदे पर भारतीय दल की अगुवाई वायु सेना उप प्रमुख एसबीपी सिन्हा की अगुवाई में 7 सदस्यों का एक दल कर रहा था।सरकार की यह बात सही है कि वायुसेना के उप प्रमुख सिन्हा जी की अध्यक्षता में सात सदस्यीय दल समझौता वार्ता में शामिल था। पर यह बात कि पीएमओ खुद ही मॉनीटरिंग भी कर रहा था का कोई उल्लेख उक्त हलफनामे में नहीं है। यह क्यों छुपाया गया है ? पीएमओ को हलफनामे में यह उल्लेख करना चाहिये था। पीएमओ ने भी इस समझौता वार्ता की मॉनिटरिंग की है। अगर यह मॉनीटरिंग थी तो। द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में इस तथ्य को छिपा लिया । राफेल सौदे के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 3 याचिकाएं दाखिल की गई थीं। इन याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने मोदी सरकार से जवाब मांगा था। जब जवाब ही मिथ्या दाखिल हुआ तो सुप्रीम कोर्ट का निर्णय उसी हलफनामे पर ही तो आएगा। तभी अदालत ने कहा था कि इस सौदे में प्रधानमंत्री कार्यालय का कोई रोल नहीं है।

© विजय शंकर सिंह