December 7, 2021
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पुरुषसत्तातमक समाज में महिलाओं के हक़ लिए लड़ना चाहती हूँ – डॉ मनीषा बांगर

पुरुषसत्तातमक समाज में महिलाओं के हक़ लिए लड़ना चाहती हूँ – डॉ मनीषा बांगर

डॉ. मनीषा बांगर पुरुषवादी वर्चस्व की मानसिकता की चुनौतियों से जूझ कर अपनी स्वतंत्र पहचान गढ़ने वाली देश की चुनिंदा बहुजन नेत्री हैं. उन्हें नागपुर से पीपुल्स पार्टी ऑफ इंडिया (पीपीआई) ने लोकसभा प्रत्याशी घोषित किया है.
बहुजन नायक कांशी राम ने बामसेफ जैसे सामाजिक संगठन के द्वारा महिलाओं के प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए मायावती की योग्यता को पहचाना था. कालांतर में मायावती ने खुद को साबित करके दिखाया. तब से लेकर आज तक बहुजन आंदोलन से जुड़े संगठनों में नयी पीढ़ी की नेत्रियों में ऐसी क्षमता मनीषा बांगर में दिखती है. पीपुल्स पार्टी आफ इंडिया ने मनीषा की इस क्षमता को न सिर्फ पहचाना बल्कि उन्हें नागपुर लोकसभा सीट से भाजपा के कद्दावर नेता नितिन गड़करी के मद्देमुकाबिल खड़ा कर दिया है.
पेशे से डॉक्टर मनीषा, संभ्रात कल्चर और सुख-स्विधाओं का त्याग कर, जमीनी संघर्ष में कोई 20 वर्ष पहले कूद पड़ी थीं. अपनी फर्राटेदार अंग्रेजी की बदौलत वह न सिर्फ युनाइटेड नेसंश जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बहुजनों की आवाज बनती रही हैं बल्कि हिंदी, उर्दू, मराठी और तेलुगु के अलावा अन्य आंचलिक भाषाओं पर मजबूत पकड़ के कारण देशव्यापी स्तर पर आमजन की समस्याओं क सफलतापूर्वक उठा रही हैं. वह अनुसूचित जाति, जनजाति, ओबीसी और अल्पसंख्यकों के शोषण के खिलाफ सशक्त भूमिका निभा रही हैं.
यूं तो शोषित जातियों की सबसे बड़ी चुनौती ब्रह्मणी सामंतवाद है पर एक महिला होने के नाते मनीषा की चुनौती कई गुणा ज्यादा हैं. पुरुषवादी सत्ता की शिकार महिलाओं को जब डा. राम मनोहर लोहिया ने विशेष रूप से शोषित वर्ग की संज्ञा दी थी तो उनका दायरा सवर्ण महिलाओं तक ही सीमित था. बहुजन समाज की महिलाओं की स्थिति तो और दयनीय तब भी थी और अब भी है.ऐसे में बहुजन समाज से आने वाली मनीषा की चुनौतियां कैसी रही हैं यह आसानी से समझा जा सकता है.
एक खास बातचीत में मनीषा बताती हैं “पुरुष सत्तात्मक समाज में सामान्य तौर पर महिलाओं की चुनौतियां दोगुनी हैं लेकिन अगर आप बहुजन समाज की महिला हैं तो यह चुनौती और भी गंभीर हो जाती है. पुरुषवादी विचारों के लोग महिलाओं की योग्यता को आसानी से पचा नहीं पाते. फिर भी हम इस बात की ज्यादा चिंता नहीं करतीं और अपने संघर्ष को और भी ऊर्जा के साथ जारी रखती हैं”.
मनीषा ने अपने दो दशक लम्बे सार्वजनिक करियर में खुद को साबित करने के लिए हर बाधा को पार किया है. वह अपनी साधना के बूते बामसेफ जैसे राष्ट्रीय संगठन की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद तक पहुंचीं. बामसेफ के रिसर्च ऐंड डेवलपमेंट विंग की कार्यकारिणी सदस्य बनीं. मूल निवासी संघ की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहीं. फिलवकत मनीषा बामसेफ की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के अलावा पीपुल्स पार्टी ऑफ इंडिया की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी हैं. उनके करिश्माई संवाद और भाषण कला से प्रभावित हो कर बामसेफ ने उन्हें अपने विशेषज्ञ प्रशिक्षकों का ‘प्रशिक्षक’ की जिम्मेदारी भी सौंप रखी है. वह तमाम राज्यों में घूम-घूम कर इस महत्वपूर्ण दायित्व को अंजाम देती हैं. उनकी इन उपलब्धियों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार किया गया. उन्हें हाल ही में ‘स्त्रीकाल’ पत्रिका ने प्रखर बहुजन लीडर का सम्मान दिया.
इन दिनों मनीषा नागपुर लोकसभा क्षेत्र में बतौर प्रत्याशी चुनाव अभियान में जुटी हैं. उनके साथ पीपुल्स पार्टी आफ इंडिया के दर्जनों रणनीतिकारों की टीम के अलावा सैंकड़ों महिला व पुरुष कार्यकर्ता दिन रात चुनाव अभियान में जुटे हैं. मनीषा बखूबी जानती हैं कि उनकी चुनावी जंग भाजपा के एक राष्ट्रीय स्तर के नेता से है. लेकिन मनीषा के चेहरे पर जैसा आत्मविश्वास और उत्साह दिख रहा है उससे साफ जाहिर होता है कि वह चुनावी जंग को बहुपक्षीय बनाने में सफल हो रही हैं.

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Ahtesham Qureshi