इतिहास साक्षी है के प्रथम विश्व युद्ध के बाद यूरोप में अराजकता का चरम था. युद्ध के बाद अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो चुकी थी. युवा वर्ग बेरोज़गारी के कारण बदहवास था और वर्तमान सत्ता से निराश आम जनों का विश्वास लोकतंत्र पर कमज़ोर हो रहा था. विरोध के स्वर उठ रहे थे. प्रदर्शन हड़तालों की सिलसिला जारी था. जनता ये बात समझ चुकी थी के प्रथम विश्वयुद्ध में मित्र राष्ट्रों की तरफ से युद्ध में हिस्सा लेने के बावजूद इटली को कुछ ख़ास फ़ायदा नहीं मिला, उल्टे युद्ध में उसे काफ़ी क्षति उठानी पड़ी है. इटली की जनता में एक रोष का माहौल पैदा हो चुका था. समूचे देश में एक प्रतिक्रिया का माहौल था. ख़ासकर सैनिक वर्गों में ज़्यादा रोष था. मौजूदा सरकार कमज़ोर होने के साथ-साथ बिलकुल अप्रभावी भी हो गयी थी.

ऐसे समय में जनता के व्यापक हिस्से में असन्तोष व्याप्त था और ठीक उसी वक़्त इटली में फ़ासीवादी आन्दोलन की शुरुआत हुई, जो बेनितो मुसोलिनी द्वारा संगठित फासिओ डि कंबैटिमेंटो का राजनैतिक आंदोलन था और बुनियादी तौर पर ये आंदोलन समाजवाद, या साम्यवाद के विरोध में नहीं बल्कि उदारतावाद के विरुद्ध था.

ऐसी विध्वंसकारी परिस्तिथि में मुसलोनी ने राष्ट्रवाद का नारा दिया था और दुश्मनों से अपमान का बदला लेने के नाम पर हिंसक उन्मादी भावनायें भड़काई गईं और एक आदमख़ोर भीड़ को प्रशिक्षण दे कर उसे प्रोत्साहन दे कर तैयार किया गया. राष्ट्र को आस्था का विषय बना कर प्रचारित किया गया और धीरे धीरे मुसोलोनी की लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि उसके मानने वाले हथियार ले कर चलने लगे. मारने मरने वालों की फ़ौज उसके पीछे खड़ी हो गयी और एक हिंसक भीड़ तैयार हो गयी. जो किसी की भी हत्या कर सकती थी, कहीं भी अराजकता फ़ैला सकती थी. और उस हिंसक भीड़ की इतनी दहशत पैदा की गई के एक दिन सत्ता पर क़ब्ज़ा कर लिया गया.

सत्ता मिलते ही मुसोलिनी ने विरोधी और लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले संगठनों को बेरहमी से कुचल डाला, प्रेस की स्वतंत्रता समाप्त की गई. लोकतांत्रिक सँगठनों की स्वायत्ता समाप्त की गई और अपने विरोधियों को राष्ट्र द्रोही की संज्ञा दी गयी. फिर जब समय ने करवट ली तो इतिहास ने उसे भी अपने अंदर दर्ज कर लिया और वो दुनिया भर के तानाशाहों के लिए एक सबक़ बन गया.

जब भीड़ को अनियंत्रित हो कर किसी की हत्या की आज़ादी दी गयी, उसको प्रोत्साहित किया गया. उसे सम्मानित करने की परंपरा शुरू हुई तो इसके परिणाम बहुत घातक हुए, यूरोप पहले भी उसका दंश झेल चुका था और फ्रांस कई दशकों के बाद अपने पैरों पर खड़ा हो पाया था. जब राष्ट्रवाद के नाम पर हिंसक भीड़ के काँधे पर बैठ कर सत्ता सुख भोग रहे सियासी बाज़ीगरों का तिलिस्म टूटा तो बहुत देर हो चुकी थी.

लगातार अपने मसीहाओं से बढ़ती जा रही अपेक्षाओं ने जब तब्दीली और परिवर्तन के नाम पर शून्य की उपलब्धियों को दर्शाना शुरू किया तो वही हिंसक भीड़ और उनके आतंक का चेहरा अपने तथाकथित मसीहाओं के घरों की तरफ़ हो गया, और अंततः जिन लोगों ने हिसंक राष्ट्रवाद का ख़ून पिला कर उस भीड़ का शोषण किया था वो भी हत्थे चढ़े और दुनिया ने देखा की मुसोलोनी सड़कों पर उसी भीड़ के हाथों घसीट घसीट कर मारा गया, जिस भीड़ के काँधे पर बैठ कर उसने सत्ता हथियाई थी.

फ़िलहाल यही नज़ारा अपने मुल्क में भी दिख रहा है. अंध हिसंक राष्ट्रवाद और आस्था के नाम पर ख़ूनी भीड़ निर्दोषों की हत्या कर रही है. सत्ता में बैठे लोग उस भीड़ को माला पहना कर सम्मानित कर रहे हैं. उनके पक्ष में बयान दे कर उन्हें क्रांतिकारी बताया जा रहा है. इस भीड़ को ये विश्वास दिलाया जा रहा है, कि वो आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाली भीड़ है. उससे बहादुर कोई नहीं है. विगत साढ़े 4 सालों में उस भीड़ को सरकारी स्तर पर खाद पानी उपलब्ध कराया गया है. और आज वो भीड़ दीमापुर के फ़रीद, पुणे के मोहसिन शेख़ दादरी के अखलाक़, अलवर के पहलू ख़ान, मालदा के अफ़राज़ुल की लाश नोचती उत्तर प्रदेश के बुलन्दशहर के स्याना क़स्बे मे तैनात एक फ़र्ज़ शनास पुलिस अफ़सर सुबोध सिंह से होती हुई हरियाणा के गुड़गांव तक पहुंच चुकी है. इंतेज़ार कीजिये……. ये हिंसक भीड़ कब आप के दरवाज़े पर दस्तक देती है.