लखनऊ, 26 नवम्बर 2019। देश के सत्तरवें संविधान दिवस के अवसर पर रिहाई मंच ने देशवासियों को बधाई देते हुए सत्ता द्वारा संवैधानिक मूल्यों पर किए जा रहे हमलों प्रति सजग रहने का आह्वान किया।
रिहाई मंच महासचिव राजीव यादव ने कहा कि विगत कुछ सालों से एक खास विचारधारा थोपने के उद्देश्य से संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्ता को खत्म करने का अभियान सा चल रहा है। संसद से लेकर रिजर्व बैंक, चुनाव आयोग और यहां तक कि संविधान के संरक्षक उच्चतम न्यायालय पर सत्ता के दबाव में काम करने के जो आरोप लग रहे हैं वे पहले कभी नहीं लगे। उन्होंने कहा कि कानून व्यवस्था और सुरक्षा के नाम पर ऐसे कई कानून बनाए गए जो न केवल संविधान प्रदत्त अधिकारों से नागरिकों को वंचित करते हैं बल्कि प्रत्यक्ष रूप से लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध भी हैं। देश में संविधान लागू होने के बाद भी कई राज्यों में अफसपा जैसे कानून लागू हैं जिसके कारण संविधान प्रदत्त कई अधिकारों को दशकों से निलंबित रखा गया है।
उन्होंने कहा कि अपेक्षा की जाती थी कि संविधान के लागू होने के बाद अंग्रेज़ों के जमाने के दमनकारी पुलिस एक्ट के स्थान पर ऐसा पुलिस एक्ट अस्तित्व में आएगा जिससे कानून लागू करने वाली संस्था और आम नागरिकों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित होगा और कानून व्यवस्था में गुणात्मक सुधार होगा। लेकिन सत्ताधारियों ने जनता पर अपनी हनक बनाए रखने के लिए उसे न केवल जारी रखा बल्कि और क्रूर बनाते गए। अफसपा, एनएसए, मीसा, टाडा, पोटा, यूएपीए जैसे कानून उसकी मिसाल हैं और संवैधानिक मर्यादाओं का गला घोंटते हुए सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए इस्तेमाल करते रहे। इस दिशा में काफी तेज़ी आई है। यूएपीए एक्ट में संशोधन कर उसे अत्याधिक क्रूर और दमनकारी बना दिया है और नागरिकता अधिनियम में संविधान विरोधी संशोधन प्रस्तावित है।
अभिव्यक्ति की आज़ादी पर सीधे हमले हो रहे हैं। हालत यह है कि ऐसे दमन के खिलाफ आवाज़ उठाने वालों पर देशद्रोह तक के फर्जी मुकदमें में फंसा कर जेल में बंद कर दिया जाता है। अपने राजनीतिक हित और गोलबंदी के लिए संविधान की मूल भावना के खिलाफ अधिनियमों में संशोधन फैशन बनता जा रहा है और संविधान की संरक्षक सुप्रीम कोर्ट असहाय सी लगने लगी है। सरकार की आलोचना करना मात्र देशद्रोह हो जाता है। जल, जंगल, ज़मीन पर अपने अधिकार के लिए संघर्ष करने वाले करीब दस हज़ार आदिवासियों पर एक साथ देशद्रोह का मुकदमा कायम किए जाना इसके दुरुपयोग की क्रूरतम मिसाल है।
रिहाई मंच नेता रॉबिन वर्मा ने कहा कि आर्थिक असमानता, जातीय भेदभाव, साम्प्रदायिक वैमनस्यता के अभिषाप से देश पहले से कहीं अधिक झेल रहा है। कारापोरेट परस्ती बढ़ी है, आर्थिक असमानता में पहले की तुलना में इज़ाफा हुआ है। शिक्षा और स्वास्थ के मैदान में जो नाम मात्र प्रगति हुई थी उसे बाज़ार के हवाले करके खत्म करने का प्रयास किया जा रहा है। सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों, रेलवे, हवाई अड्डे जनता की मर्जी के खिलाफ बेचने के काम किया जा रहा है। राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ सीबीआई, ईडी, आईटी, एनआईए व अन्य संस्थाओं का गलत इस्तेमाल कर राजनीतिक हित साधने के चलन में कई गुना बृद्धि हुई है।
उन्होंने कहा कि संविधान दिवस मनाने का यह तात्पर्य कत्तई नहीं है कि कुछ लोग इकट्ठा होकर संविधान और लोकतंत्र का गुण गाएं और मिठाई खाकर अपने घर चले जाएं। यह कोई औपचारिकता नहीं है बल्कि यह समीक्षा का भी अवसर है कि संवैधानिक अधिकार सभी नागरिकों को प्राप्त हैं या नहीं और कर्तव्यों के निर्वाह में कहीं कोताही तो नहीं हो रही है?
संविधान दिवस अगर हमें संवैधानिक अधिकारों की रक्षा और संविधान की मंशा के मुताबिक आगे बढ़ने को प्रेरित नहीं करता तो संविधान दिवस मनाना मात्र औपचारिकता होगा। इसलिए संविधान दिवस समीक्षात्मक दृष्टि से देखना और देश व समाज को सही दिशा की तरफ ले जाने के प्रति प्रतिबद्धता को दोहराने अवसर भी होना चाहिए।

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