हैदराबाद में पशु चिकित्सक डॉ रेड्डी की बलात्कार के बाद जला कर हत्या कर देने वाले चारों अभियुक्त पुलिस मुठभेड़ में मार दिये गए। कहा जा रहा है कि, मौके से भागने की कोशिश में चारों अभियुक्त मारे गए। निहत्थे थे। उन्हें हथकड़ी लगाई गई थी या नहीं, यह पता नहीं। सीन रिक्रिएट कराने के लिये ले जाये गये थे। वहीं से भाग रहे थे। पुलिस ने पकड़ने की कोशिश की होगी। नहीं पकड़ पायी तो टपका दिया। लेकिन निहत्थे लोगों ने पुलिस पर हमला कैसे किया होगा यह तो हैदराबाद पुलिस ही बता पाएगी।
लेकिन एक नए सिद्धांत की ओर हम बढ़ रहे हैं, और वह है, जनता की मांग पर अपराध के फैसले का निस्तारण। यह घटना, इसकी स्वीकार्यता की बात करना, इसे बिना किसी जांच के ही सच मान लेना, देश के आपराधिक न्याय प्रणाली की विफलता का सूचक है।
हैदराबाद मुठभेड़ के बारे में, सुबह सुबह यह खबर मिली कि, चारो अभियुक्त मुठभेड़ में मारे गए। थोड़ा हैरानी हुयी कि वे तो जेल में थे। बहरहाल, नौकरी के दिन याद आ गए। नौकरी के दिन याद भी तो बहुत आते हैं। याद आया,  जब कंट्रोल रूम सुबह ही सुबह संदेश पठाता था कि, बदमाशो ने पुलिस पर गोली चलाई और पुलिस ने आत्मरक्षा में उनका जवाब दिया। उनकी गोली नहीं लगी, हमारी लग गयी और वह मौके पर मारा गया। कुछ खोखा कारतूस और देशी कट्टा या पौना मिला है।
हैदराबाद में अब डॉ प्रियंका रेड्डी के केस में तो तफ्तीश के लिये कुछ बचा नहीं। मुल्ज़िम तो चारों ही मारे गये। इनके लिये हम सब फांसी चाहते भी थे। अब इस मुठभेड़ की जांच हो तो सच पता लगे कि हुआ क्या है। हर मुठभेड़ की जांच होती है। यह एनएचआरसी की गाइडलाइंस में है। इसकी भी होगी। पहले मैजिस्ट्रेट जांच करेगा। मुठभेड़ का मुकदमा भी दर्ज होता है। उसकीं तफतीश होती है।
अब तक पुलिस पर उन आरोपियों को जेल भेजने, सुबूत इकट्ठा करने और सज़ा दिलाने का दबाव था। इन सब झंझट से मुक्त हुयी हैदराबाद पुलिस। अदालत में जुर्म साबित करना बड़ा कठिन होता है। यही तो पुलिस का असल काम है। पर इतनी व्यस्तताओं के बीच इतना समय कहाँ कि ढंग से तफ्तीश और अदालत में पैरवी हम कर सकें। अब यही तरीका ठीक है। जनता भी खुश, और नक्शा नज़री, केस डायरी लिखने से जहमत से भी पिंड छूटा। लेकिन, सारे गम अब भी खत्म नहीं है। मौत से पहले आदमी गम से निजात पाए क्यों! अब इस इनकाउंटर को असली है या नक़ली, इसे  साबित करने का दबाव पुलिस पर आएगा। यह एक बड़ा गेम होगा। पूरा घटनाक्रम, हैदराबाद पुलिस खुद ही विस्तार से बताएगी। सब डिटेल सामने आये तो पता चले।
अभी तो हम सबको भी यही पता है। लेकिन बड़े और रसूखदार रेपिस्ट अच्छे होते हैं वे मौके से भागने की कोशिश नहीं करते हैं। अपने फन के मंजे खिलाड़ी होते हैं। उनमें से कुछ को, अस्पताल से लेकर सदन तक मे पनाह भी मिल जाती है। वे न तो भागने की कोशिश करते हैं और न पुलिस पर हमला। इसलिए पुलिस उनका इनकाउंटर नहीं कर पाती है। मन मसोसकर। रह जाती है। वे इतने विश्वसनीय होते हैं कि उन्हें लेकर तफ्तीश के लिए मौके पर सीन रिक्रिएट कर के सच जानने की ज़रूरत भी नहीं होती है। अब और कुछ खबर हैदराबाद से आये तो कुछ प्रतिक्रिया दी जाय। फिलहाल तो इतना ही।
© विजय शंकर सिंह

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Vijay Shanker Singh

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