लीजिए…. अब सरकार खुद हाईकोर्ट में हलफनामा देकर कह रही है, कि रिलायंस इंडस्ट्रीज भारी कर्ज के बोझ में है। मुकेश अम्बानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड पर 2.88 लाख करोड़ रुपये का भारी-भरकम कर्ज है। कंपनी अपने कर्जों को खत्म करने के लिए अपनी चल-अचल संपत्तियों की बिक्री कर रही है।’ इसलिए कोर्ट द्वारा रिलायंस द्वारा अरामको को हिस्सेदारी बेचने पर रोक लगाई जाए।

सरकार ने कहा कि भविष्य में भी रिलायंस ओर बीपी अपनी संपत्तियों की बिक्री कर सकती है और तब तक आर्बिट्रल अवॉर्ड के भुगतान के लिए कंपनी के पास कुछ नहीं बचेगा।

कुछ दिनों पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने रिलायंस और ब्रिटिश गैस से संपत्तियों की जानकारी देने को कहा है, लेकिन अम्बानी जी ने अभी तक कोई जानकारी नहीं दी है। केंद्र सरकार ने सितंबर में कोर्ट में अर्जी दायर कर दोनों कंपनियों को एसेट्स बेचने से रोकने की मांग की थी।

दरअसल सरकार पन्ना-मुक्ता और ताप्ती (पीएमटी) फील्ड में रिलायंस और ब्रिटिश गैस से उत्पादन साझेदारी विवाद में इन कंपनियों से 4.5 अरब डॉलर (30 हजार करोड़ रुपए) के आर्बिट्रेशन अवॉर्ड की रकम पाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रही है। 1994 में हुआ यह कॉन्ट्रैक्ट अब खत्म हो चुका है। यह कोई नया मामला नही है सरकार 2010 से आर्बिट्रेशन अवॉर्ड के लिए लड़ रही है।

सरकार के मुताबिक रिलायंस और ब्रिटिश गैस ने प्रोडक्शन शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट का उल्लंघन कर काफी रकम अपने पास रख ली। 2016 में ट्रिब्यूनल ने सरकार के पक्ष में फैसला दिया। सरकार ने दोनों पर 3.8 अरब डॉलर बकाया होने का आकलन किया था। ब्याज समेत यह रकम 4.5 अरब डॉलर हो चुकी है।

लेकिन रिलायंस ने शपथपत्र में कहा कि यह कहना सही नहीं है, कि मध्यस्थता अदालत ने उसे और उसकी भागीदार कंपनी को सरकार को 3.5 अरब डॉलर के बकाया का भुगतान करने को कहा है। अब मामला कोर्ट में है और कोई देश होता तो उद्योगपति के हलक में हाथ डालकर पैसा वसूल लेता। लेकिन मुकेश अम्बानी तो मोदी जी के परम मित्र ठहरे, आखिर 30 हजार करोड़ उनसे कैसे वसूल ले?