October 29, 2020

पत्रकार गौरी लंकेश से सम्बन्धित एक सोशल मीडिया में फ़ैलाया जा रहा है, कि वो इसाई थीं और मिशनरी के निर्देश पर हिंदू धर्म की कुरीतियों पर कटाक्ष करती थीं. पर अफ़वाहवाज़ो के इस झूठ की वरिष्ठ पत्रकार रविश कुमार ने हवा निकाल दी है.दरअसल गौरी लंकेश एक पत्रिका निकालती थीं, जिसका नाम था “गौरी लंकेश पत्रिके”. उनकी इस पत्रिका के नाम के आखिरी शब्द “पत्रिके” को भाजपा और संघ समर्थक व अन्य दक्षिणपंथी विचारधारा के समर्थक पैट्रिक बताकर प्रचारित कर रहे हैं.
आईये जानते हैं, क्या कहा है रविश कुमार ने- “गौरी लंकेश को दफ़नाए जाने को लेकर तरह-तरह की अफ़वाहें फैलाई जा रही हैं। लिंगायत परंपरा में निधन के बाद शव को दफ़नाया जाता है। दो तरह से दफ़नाने की परंपरा है। एक बिठा कर और दूसरा लिटा कर। किस तरह से दफ़नाना है, ये परिवार तय करता है। निधन के बाद शव को नहलाया जाता है और तभी बिठा दिया जाता है। कपड़े या लकड़ी के सहारे बांध जाता है। जब किसी बुज़ुर्ग लिंगायत का निधन होता है तो उसे सजा धजाकर कुर्सी पर बिठाया जाता है और फिर कंधे पर उठाया जाता है। इसे विमान बांधना कहते हैं।
गांवों में परिवार के अपने क़ब्रिस्तान होते हैं और सामुदायिक भी होते हैं। कई गांवों में लिंगायतों के अलग क़ब्रिस्तान होते हैं, मुसलमानों के तो होते ही हैं। गौरी लंकेश को लिटा कर ले जाया गया है। मगर उन्हें दफ़नाते समय लिंगायतों की बाकी विधियों का पालन नहीं किया गया। जैसे जंगम या स्वामी आकर मंत्रजाप करते हैं, वो सब नहीं हुआ होगा। गौरी लंकेश नास्तिक थी।
लिंगायत लोग शिवलिंग के लघु आकार की पूजा करते हैं। इन्हें ईष्टलिंग कहते हैं। लिंग की ऊंचाई एक सेंटीमीटर की होती है और परिधि भी एक सेंटीमीटर की होती है। ईष्टलिंग का रंग काला होता है। इनकी पूजा बायें हाथ में रखकर की जाती है। दायें हाथ से फूल वगैरह चढ़ाया जाता है। मंत्र जाप होता है और फिर लोग या तो तय स्थान पर रख देते हैं या लाकेट में रखकर गले में डाल लेते हैं। स्त्री पुरुष दोनों ही लाकेट की तरह अपने ईष्ट को डालते हैं। पांच मिनट की पूजा होती है। बसवन्ना कर्नाटक के बड़े संत हुए हैं। बसवा नाम है और इसमें अन्ना लगता है। अन्ना मतलब बड़ा भाई।
अगर आप तक गौरी लंकेश के दफ़नाने को लेकर अफ़वाह पहुंची है तो समझ लीजिए कि वो कौन सी ताकत है जो आपको इस देश की परंपराओं के बारे में भी नहीं जानने देना चाहती है। आपको मूर्ख समझती है कि कुछ भी व्हाट्स अप यूनिवर्सिटी के ज़रिये फैला देंगे और लोग नौकरी, अस्पताल और शिक्षा भूलकर कुएं में कूद जाएंगे। इस तरह की अफ़वाह फ़ैलाने की ज़रूरत क्यों थीं, क्योंकि कोई ताकत है जो मान चुकी है कि आप मूर्ख हैं और अगर इस तरह झूठ और नफ़रत के ख़ुराक की सप्लाई होती रही तो आप उनके हिसाब की हिंसा को अंजाम दे सकते हैं।
माता पिता को विशेष रूप से सावधान रहने की ज़रूरत है। आपके बच्चे झूठ की चपेट में आ सकते हैं। नेताओं का तो काम निकल जाएगा, आपके बच्चे अफ़वाह फैलाते फैलाते बेरोज़गार हो चुके होंगे और दंगाई मानसिकता से बीमार।
लंबे समय से लिंगायत समुदाय मांग करता रहा है कि उसे अलग धर्म की मान्यता दी जाए। उसे हिन्दू नहीं कहा जाए। हाल ही में कर्नाटक में लिंगायतों की एक सभा हुई थी। इंडियन एक्सप्रेस ने इस घटनाक्रम को रिपोर्ट किया है। हम लोग दक्षिण के बारे में बहुत कम जानते हैं। जानना चाहिए। इसमें कोई और जानकारी जोड़ना चाहे तो स्वागत है। कमेंट बाक्स में आप कुछ भी पोस्ट कीजिए, तीन चार तरह के मेसेज हैं जो अलग अलग नामों से लोग पोस्ट करते हैं। इसका मतलब है कि ट्रोल फैक्ट्री से तैयार किया हुआ मेसेज है। इस मेसेज को दूर दूर तर फैला दीजिए।”
यह लेख रविश ने अपने फ़ेसबुक पेज पर लिखा है, जिससे यह जानकारी मिलती है, कि गौरी लंकेश लिंगायत समुदाय से थीं. नास्तिकता का प्रभाव था, साथ ही लिंगायत समुदाय की परंपराएं क्या हैं?
ज़रा सोचियेगा –  यदि गौरी लंकेश लिंगायत न होकर इसाई होती, तो क्या उनकी हत्या को जायज़ ठहराया जा सकता था. क्या किसी के इसाई या मुस्लिम होने से वो हत्या का भागीदार हो जाता है. क्योंकि जिस तरह से गौरी के ईसाई होने का झूठ सोशल मीडिया में फ़ैलाया जा रहा है.  उससे तो यही लगता है कि वो ये साबित करना चाहते हैं, कि इसाई थी इसलिए मारा गया और हत्या जायज़ है.

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Team TH

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