व्यक्तित्व

वकालत के दौरान लिंकन अपने कई मुवक्किलों को कुछ पैसा लौटा देते थे

वकालत के दौरान लिंकन अपने कई मुवक्किलों को कुछ पैसा लौटा देते थे

अब्राहम लिंकन का नाम जहन में आते ही एक ऐसे व्यक्ति की छवि मन मस्तिष्क में उभरती है जो गरीबी से उठकर अनेक कठिनाईयों को दरकिनार कर अमेरिका का 16 वाँ राष्ट्रपति बना.अब्राहिम लिंकन दयालुता की प्रतिमूर्ति थे, दुनिया जिन्हें अमेरिका को दास प्रथा से मुक्ति दिलाने वाले नायक के रूप में जानती है.
अब्राहम लिंकन का जन्म 12 फरवरी, 1809 को हार्डिन काउंटी, केंटकी में एक गरीब अश्वेत परिवार में हुआ.लिंकन का जीवन शुरुआत से ही संघर्ष में बीता.वे कड़ाके की सर्दी में लकड़ी के फट्टों से बने एक झोपड़े में पैदा हुए थे, मीलों चलकर पढ़ने के लिए किताबें उधार लेकर आते थे और रात में अंगीठी की या लुहार की दुकान में जल रही भट्टी की रोशनी में बैठकर पढ़ते थे. उन्होंने सुअर काटने से लेकर लकड़हारे तक का काम किया, खेतों में मजदूरी की, अपने शहर के सबसे ईमानदार वकील कहलाए.जज डगलस से यादगार बहस की और उसके बाद अमेरिका के राष्ट्रपति बने.उनकी गरीबी और शुरूआती राजनीतिक विफलताओं (जिनकी वजह से उन्होंने एक बार राजनीति से संन्यास भी ले लिया था) को उनके जीवन की सबसे दुखदाई और त्रासद घटनाओं के रूप में जाना जाता है.
लिंकन वकालत के दौरान अपने उन  मुवक्किलों से अधिक फीस नहीं लेते थे जो ‘उनकी ही तरह गरीब’ थे. एक बार उनके एक मुवक्किल ने उन्हें पच्चीस डॉलर भेजे तो लिंकन ने उसमें से दस डॉलर यह कहकर लौटा दिए कि पंद्रह डॉलर पर्याप्त थे.आमतौर पर वे अपने मुवक्किलों को अदालत के बाहर ही राजीनामा करके मामला निपटा लेने की सलाह देते थे ताकि दोनों पक्षों का धन मुकदमेबाजी में बर्बाद न हो जाये. इसके बदलें में उन्हें न के बराबर ही फीस मिलती था. एक शहीद सैनिक की विधवा को उसकी पेंशन के 400 डॉलर दिलाने के लिए एक पेंशन एजेंट 200 डॉलर फीस में मांग रहा था. लिंकन ने उस महिला के लिए न केवल मुफ्त में वकालत की बल्कि उसके होटल में रहने का खर्चा और घर वापसी की टिकट का इंतजाम भी किया.
लिंकन कभी भी धर्म के बारे में चर्चा नहीं करते थे और किसी चर्च से सम्बद्ध नहीं थे। एक बार उनके किसी मित्र ने उनसे उनके धार्मिक विचार के बारे में पूछा. लिंकन ने कहा – “बहुत पहले मैं इंडियाना में एक बूढ़े आदमी से मिला जो यह कहता था ‘जब मैं कुछ अच्छा करता हूँ तो अच्छा अनुभव करता हूँ और जब बुरा करता हूँ तो बुरा अनुभव करता हूँ’. यही मेरा धर्म है’
6 नवम्बर 1860 को अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति निर्वाचित होने के बाद लिंकन ने ऐसे महत्त्वपूर्ण कार्य किए जिनका राष्ट्रीय ही नहीं अन्तर्राष्ट्रीय महत्व भी है. लिंकन की सबसे बड़ी उपलब्धि अमेरिका को ग्रह-युद्ध से उबारना था.इस कार्य हेतु 1865 ई. में अमेरिका के संविधान में 13वें संशोधन द्वारा दास-प्रथा के अन्त का श्रेय भी लिंकन को ही जाता है. लिंकन एक अच्छे राजनेता ही नहीं, बल्कि एक प्रखर वक्ता भी थे.प्रजातंत्र की परिभाषा देते हुए उन्होंने कहा था,

प्रजातंत्र जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए शासन है’

वे राष्ट्रपति पद पर रहते हुए भी सदा न केवल विनम्र रहे, बल्कि यथासंभव गरीबों की भलाई के लिए भी प्रयत्न करते रहे. दास-प्रथा के उन्मूलन के दौरान अत्यधिक विरोध का सामना करना पड़ा, किन्तु अपने कर्तव्य को समझते हुए वे अंततः इस कार्य को अंजाम देने में सफल रहें.अमेरिका में दास-प्रथा के अंत का अन्तर्राष्ट्रीय महत्त्व इसलिए भी है कि इसके बाद ही विश्व में दास-प्रथा के उन्मूलन का मार्ग प्रशस्त हुआ.अपने देश में इस कुप्रथा की समाप्ति के बाद विश्व के अन्य देशों में भी इसकी समाप्ति में उनकी की भूमिका उल्लेखनीय रही.

लिंकन का व्यक्तित्व मानव के लिए प्रेरणा का दुर्लभ स्त्रोत था.वे पूरी मानवता से प्रेम रखते थे. शत्र-मित्र की संकीर्ण भावना से वे कोसों दूर थे.इससे संबंधित एक रोचक प्रसंग यहां प्रस्तुत है.गृह-युद्ध के दौरान एक दिन सायंकाल वे अपने सैनिकों के शिविर में गए. वहाँ सभी का हालचाल पूछा और काफी समय सैनिकों के साथ बिताते हुए घायल सैनिकों से बातचीत कर उनका उत्साहवर्द्धन किया.जब वे शिविर से बहार आए तो अपने साथ के लोगों से कुछ बातचीत करने के बाद शत्रु सेना के शिविर में जा पहुंचे.वहां के सभी सैनिक व अफसर लिंकन को अपने बीच पाकर हैरान रह गए. लिंकन ने उन सभी से अत्यंत स्नेहपूर्वक बातचीत की. उन सभी को हालाँकि यह बड़ा अजीब लगा, फिर भी वे लिंकन के प्रति आत्मीय श्रद्धा से भर गए.जब लिंकन शिविर से बाहर निकले तो सभी उनके सम्मान में उठकर खड़े हो गए.लिंकन ने उन सभी का अभिवादन किया और अपनी कार में बैठने लगे.तभी वहां खड़ी एक वृद्धा ने कहा, ‘तुम तो अपने शत्रुओं से भी इतने प्रेम से मिलते हो, जबकि तुम में तो उन्हें समाप्त कर देने की भावना होनी चाहिए’ तब लिंकन ने मुस्कुराकर जवाब दिया, ‘यह कार्य मैं उन्हें अपना मित्र बनाकर भी कर सकता हूं ’ इस प्रेरक प्रसंग से पता चलता है कि लिंकन इस बात में विश्वास करते थे कि मित्रता बड़ी-से-बड़ी शत्रुता का अन्त भी कर सकती है.वे अपने शत्रुओं के प्रति भी उदारवादी रवैया अपनाने में विश्वास करते थे.
14 अप्रैल 1865 को फोर्ड थियेटर में ‘अवर अमेरिकन कजिन’ नामक नाटक देखते समय जॉन विल्किस बूथ नाम के एक अभिनेता ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी. उनकी हत्या के बाद अमेरिका में विद्वानों की एक सभा में कहा गया, ‘लिंकन की भले ही हत्या कर दी गई हो, किन्तु मानवता की भलाई के लिए दास-प्रथा उन्मूलन का जो महत्वपूर्ण कार्य किया है, उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता.लिंकन अपने विचारों एवं कर्मों के साथ हमारे साथ सदैव रहेंगे’.

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Durgesh Dehriya

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