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क्या आपको स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें पता हैं ?

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भारत मे कई सालों से अच्छे और प्रासंगिक आंदोलनों का अभाव से हो गया था, लोग अपनी मांगों को मनवाने के लिए या विरोध दर्ज कराने के लिए हिंसक प्रदर्शन या नारेबाज़ी तक ही सिमट कर रह गए थे, ऐसा शायद इसलिए कि एक शांतिपूर्ण और जायज़ मांगो वाला आंदोलन हर आंदोलनकारी से सयंम, विश्वास, शक्ति की मांग करता है जिसका आज के लोगो मे अभाव पाया जाता है।
एक वर्ग है जिसने भटकी हुई भारतीय जनता को आंदोलन की गरिमा और आंदोलनकारी के संघर्ष से परिचित कराया। सरकार शहरों से निकलकर इन तक पहुँचने में समर्थ नहीं थी तो हमारे किसान 180 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर सरकार को अपनी पीड़ा सुनने उनके शहर पहुंच गए।

आल इंडिया किसान सभा के बैनर तले महाराष्ट्र के नासिक से 180 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर मुंबई पहुंचे किसानों की हिम्मत इतनी दूर तक यात्रा करने में नही टूटी होगी लेकिन जब उन पर राजनीतिक संगठन से जुड़े होने के, आतंकवादी होने के और न जाने क्या क्या आरोप लगाए गए तब वो जरूर खुद को ठगा हुआ और बेज़्ज़त महसूस कर रहे होंगे।
5 मार्च को 30 हज़ार से ज़्यादा किसानों ने इस यात्रा की शुरुआत की जिनका मकसद 12 मार्च को महाराष्ट्र विधानसभा का घेराव करने था। सरकार का अपनी मांगों पर ध्यान देने और अपने वादों को पूरा करने के लिए दबाव बनाने का महाराष्ट्र के किसानों को यही रास्ता उचित लगा।
 

आंकड़ों में दयनीय स्थिति

30 दिसंबर 2016 को जारी एनसीआरबी के रिपोर्ट “एक्सीडेंटल डेथ एंड सुसाइड इन इंडिया 2015” के मुताबिक 2015 में 12,602 किसानों और खेती से जुड़े मजदूरों ने आत्महत्या की है। 2014 की तुलना में 2015 में किसानों और मजदूरों की कुल आत्महत्या में दो फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। 2014 में 12,360 किसानों और मजदूरों ने आत्महत्या की है।

2015 में 12,602 में से 8,007 किसान थे, 2014 में यह संख्या 5,650 थी इन आँकड़ों की अनुसार किसानों की आत्महत्या के मामलों में एक साल में 42 फीसदी की बढ़ोतरी हुई  है।
किसानों की आत्महत्या के मामले में सबसे खराब हालत महाराष्ट्र की है यहां 2015 में 4291 ने आत्महत्या की। महाराष्ट्र के बाद कर्नाटक में  1569,  तेलंगाना 1400, मध्यप्रदेश 1290, छत्तीसगढ़ 954,  आंध्र प्रदेश 916, तमिलनाडु 616 किसानों की आत्महत्या के मामले सामने आए।
आंकड़ो के अनुसार देश मे 9 करोड़ किसान परिवार है जिसमे से 6.3 करोड़ कर्ज में डूबे हुए है जिसके कारण 1995 से अब तक 4 लाख किसान आत्महत्या हत्या कर चुके हैं इनमे से 76 हजार किसान महाराष्ट्र के है।  महाराष्ट्र में बीजेपी सरकार के  34,000 करोड़ की कर्ज माफी का ऐलान करने के बाद यह 1,753 किसान खुदकुशी के चुकें है।पानी की कमी के कारण कृषि से  जुड़ी सबसे ज़्यादा समस्याएं भी महाराष्ट्र में ही है।

क्या है किसानों की मांगे

  • बिना किसी शर्त के सभी किसानों का कर्ज माफ किया जाए।
  • ओलावर्ष्टि प्रभावित किसानों को प्रति एकड़ 40 हजार रुपए का मुआवजा दिया जाए।
  • महाराष्ट्र के किसानों को सिंचाई हेतु पानी उपलब्ध कराया जाए।
  • सरकार कृषि उत्पाद का डेढ़ गुना दाम देने का वादा करे।
  • किसानों के बिजली के बिल माफ किये जाए।
  • स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों और वनाधिकार कानून को लागू किया जाए।

 

किसानों की समस्या

किसानों ने आरोप लगाया है कि सरकार द्वारा पेश किये गए आंकड़ो को बढ़ा चढ़ा कर दिखाया गया है। इसके अलावा किसान जिन जिला स्तर के बैंकों पर के लिए निर्भर रहते है, उनकी हालत भी बेहद खराब है इसलिए किसानों को लोन देने का काम 10 प्रतिशत भी पूरा नही हो पाया।
लोन देने का काम भी डिजिटल तरीके से हो रहा है  और किसानो को डिजिटल की  जानकारी नही है ऐसे में लाभ से ज़्यादा परेशानी उठानी पड़ रही है, कई किसानों का पंजीकरण केंद्रों में लाभार्थी सूची में नाम भी नही आता।
सरकार ने किसानों को उनकी फसल का उचित समर्थन मूल्य देने की बात कही लेकिन उनकी सारी समस्याओं का केवल ये एकमात्र समाधान नही है बदलते मिउसम के साथ साथ किसानों की फसलों पर भी मार पड़ती है , और  किसान इसके अधिकतर लाभ से वंचित रह जाता है उन्होंने स्वामीनाथन कमीशन के मुताबिक अपनी समस्याओं का समाधान करने की मांग की है।

क्या है स्वामीनाथन आयोग

नवंबर 2004 में प्रोफेसर स्वामीनाथन की अध्यक्षता में  नेशनल कमीशन फ़ॉर फारमर्स बनाया गया जिसने दो सालों में छह रिपोर्ट पेश की।
प्रोफेसर स्वामीनाथन को भारत मे हरित क्रांति का जनक माना जाता है,वह पौधों के जेनेटिक वैज्ञानिक है भारत सरकार द्वारा उन्हें 1967 में पद्मश्री , 1972 में  पद्म भूषण व  1989 में पद्म विभूषण से सम्मनित किया जा चुका है।

क्यों बनाया गया स्वमीनाथन आयोग

अन्न की आपूर्ति को बढ़ाने और किसानों की आर्थिक हालात सुधारने के लिए इस कमेटी का गठन किया गया इस आयोग ने अपनी आखरी रिपोर्ट 4 अक्टूबर 2006 को सौंपी,  रिपोर्ट ज़्यादा “तेज़ और समग्र आर्थिक विकास” के 11वीं पंचवर्षीय योजना के लक्ष्यों को लेकर बनी।
आयोग ने किसानों की आत्महत्या की समस्या को सुलझाने पर ध्यान दिया,  राज्य स्तरीय किसान कमीशन बनाने, स्वास्थ्य सेवाएं बढ़ाने और वित्तिय स्थिति को मजबूत बनाने पर भी करने पर ही ज़ोर दिया। आयोग ने एमएसपी औसत लागत से 50 फीसदी ज़्यादा रखने की सिफारिश की ताकि छोटे किसानों को भी इसका लाभ मिले। इसके अलावा किसानों के लिए  सस्ती दरों पर ब्याज उपलब्ध करने को कहा।

डॉ स्वामीनाथन

आयोग की सिफारिशें

  • किसानों को अच्छी क्वालिटी के बीज सस्ते दामो पर दिए जाएं।
  • गांवों में किसानों के लिए विलेज नॉलेज सेंटर या ज्ञान चौपाल बनाई जाए।
  • महिला किसानों के लिए भी किसान क्रेडिट कार्ड जारी हो।
  • सरप्लस और इस्तेमाल नही हो रही ज़मीन का बंटवारा किया जाए।
  • खेतिहर ज़मीन को गैर कृषि उद्देश्यों के लिए कॉरपोरेट को न दिया जाए।
  • कर्ज की व्यवस्था हर गरीब से गरीब किसान को को दी जाए।
  • फसल बीमा की सुविधा हर फ़सल के लिए दी जाए।
  • किसानों के लिए कृषि जोखिम फंड बनाया जाए
  • किसानों को  जाने वाला कर्ज़ चार फीसदी ब्याज दर पर दिया जाए।
  • एग्रीकल्चर रिस्क फंड का गठन किया जाए।
  • कर्ज़ की उगाही में नरमी यानी जब तक किसान कर्ज़ चुकाने की स्थिति में न आ जाए तब तक उससे कर्ज़ न वसूल जाए।

स्वमीनाथन आयोग ने 2006 में रिपोर्ट प्रस्तुत की थी तब से आज तक 11 साल हो चुके है पर लेकिन इस विषय पर कोई गंभीर कदम नही बढ़ाया गया है किसानों की समस्याओं के संदर्भ में समाधान निकालने में सरकार विफल रही है पूरे देश का पेट भरने वाल्व किसान आज खुद भुख से तड़प रहा है भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए इससे अधिक विडंबना और क्या होगी,  जिस प्रकार किसान आने अधिकार के लिए सरकार की चौखट तक आ चुके है दिखाई पड़ता है कि अब सरकार का नज़रे बचा पाना मुश्किल होगा, उम्मीद है इस बार इतनी आगे आकर किसानो के खाली हाथ न जाना पड़े।