लालू यादव को सज़ा का ऐलान हो गया, साढ़े तीन साल की कैद उन्हें काटनी होगी, वो अलग बात है कि मामला उच्च न्यायालय के समक्ष जाएं और उन्हें जमानत मिल जाएं,लेकिन फिलहाल जो स्थिति है उसमें लालू यादव की सियासी विरासत,और उनके दल राजद के भविष्य को लेकर भी कई सवाल उठने शुरू हो जाएंगे और ये उठना लाज़मी भी है की बिहार के “जादूगर” का भविष्य क्या होगा?
लालू यादव ज़मीनी नेता है उनकी राजनीतिक विरासत लोहियावादी और समाजवादी नीतियों के समक्ष घूमती है और उसी के इतर घूमकर उन्होनें अपनी राजनीतिक पहचान भी बनाई है। लालू यादव हर एक मौके पर पिछड़ों और मुस्लिमों के नेता सिद्ध रहें है और बिहार के परिदृश्य में तो ऐसा बहुत हद तक है भी और यही वजह है की लालू यादव ने भाजपा विरोधी रणनीतिक कार्यक्रम में भरपूर हिस्सा लिया है।
2014 के चुनावों में मिली करारी हार के बाद लालू के ऊपर सवालिया निशान खड़े हुए तो उन्होंने “महागठबंधन” बना कर ऐक नया राजनीतिक दांवपेंच चला और ये दांव पूरी तरह कामयाब हुए और इस गठबंधन ने बिहार में सत्ता हासिल करी। हालांकी नीतीश कुमार के पाला बदलने के बाद सत्ता उनके हाथ से चली गई लेकिन वो “किंगमेकर” बन गए।
इसी के मद्देनजर उन्होंने बिहार में सरकार के वक़्त अपने सुपुत्र तेजस्वी को उपमुख्यमंत्री बनवा दिया और यही से लालू ने भविष्य में होने वाली राजनीतिक उठापठक के लिए तैयारी कर ली थी और अपने सुपुत्र को बागडोर सौंप दी थी। क्योंकि तेजस्वी उपमुख्यमंत्री बने थे तो सत्ता जाने के बाद मुख्य विपक्षी नेता भी बने लेकिन इससे भी बड़ा सवाल ये की क्या तेजस्वी इतनी बड़ी जिम्मेदारी संभाल पाएंगे?
तेजस्वी यादव लालू के सुपुत्र है,और अपनी परिपक्वता को सरकार के गठन के बाद विधानसभा में बोल कर सिद्ध कर दिया था। लेकिन तेजस्वी यादव के सामने पिता के जेल जाने के बाद होंने वाला बड़ा और अहम लोकसभा चुनाव है जिसे सम्भाल पाना बड़ी बात होगी और लालू जितनी समझ,परिवक्वता और राजनीतिक काबिलियत का इस्तेमाल कर आने वाला ये चुनाव लड़ा जाना इतना आसान तो नही होगा।
लेकिन ये बात तो है कि लालू यादव के जेल जाने के बाद अब विपक्ष के लिए भी मुश्किलें खड़ी होंगी ही क्योंकि लालू जैसी रणनीति बनाने में वक़्त लगेगा और लालू के जेल जातें ही दिक़्क़तों का बढ़ना तय होगा।

असद शेख
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Asad Shaikh

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