कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का दिल्ली की मुख्य सड़क राजपथ पर उतर कर ज्योति-जुलूस निकालने का आइडिया नायाब कहा जाएगा। देश अंधेरे की चपेट में है, इस संदेश के संचार के लिए आधी रात और इंडिया गेट से बेहतर प्रतीक क्या हो सकते थे? हालाँकि सुरक्षा के लिहाज़ से यह निश्चय ही ख़तरनाक क़दम था।
भारी संख्या में लोग इंडिया गेट पहुँचे दिखाई दिए। ज़ाहिर है, सब कांग्रेस के न रहे होंगे। मुख्य चैनल लाइव डटे हुए थे। अशोक गहलोत साये की तरह राहुल के साथ थे। लम्बी नर्मदा यात्रा से लौटे दिग्विजय सिंह भी। अन्य नेता और प्रियंका-वाड्रा भी भीड़ में चहलक़दमी कर रहे थे। राहुल पत्रकारों के साथ नुक्कड़ सभा की तरह मुख़ातिब थे। मैंने एक बजे तक देखा, उनका जुलूस जमा हुआ था।
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राजनीति का यह गांधीवादी अन्दाज़ है। भाजपा शासित राज्यों में नाबालिग़ लड़कियों से बलात्कार, उनके अपने ही नेताओं के काले कारनामे पार्टी को आँख नीची करने को मजबूर कर रहे हैं। आज मोदी और उनकी सरकार ने उपवास किया। सुना कि राहुल ने ट्वीट किया कि काश कठुआ की बच्ची के लिए भी एक उपवास कर लेते।
भाजपा ने कहा है – बलात्कार के मामलों पर राजनीति न करे विपक्ष। क्यों न करे? राजनेता को राजनीति छोड़कर फिर क्या करना चाहिए? हाँ, गंदी राजनीति न हो – लोगों को लड़ाने, भिड़ाने और बेमौत मरवाने वाली। कहना न होगा, इस मामले में भाजपा इस वक़्त ख़ुद ग़लत पाले में क़दम धँसाए हुए है।

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