सोमवार को पुणे जिले में भीमा-कोरेगांव की लड़ाई की २०० वी सालगिरह पर आयोजित एक कार्यक्रम में दो गुटों के बीच हिंसा भड़क गयी. खबर है कि हिंदुत्ववादी संगठन (समस्त हिंदू आघाडी, ऑल हिंदू फ्रंट) ने हिंसा फैलाने की शुरुआत की, जिसमें एक शख्स की मौत हो गयी जबकि बड़ी संख्या में वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया. इस हिंसा ने काफी उग्र रूप धारण कर लिया तो वहीँ दूसरी ओर इस मुद्दे पर सियासत भी तेज़ हो गयी है.
दलित नेता जिग्नेश मेवाणी ने पेशवा शासन के मुख्यालय शनिवार वाडा (पुणे) में आयोजित एक रैली में भाजपा और संघ को आधुनिक पेशवा बताते हुए उनके ख़िलाफ़ लड़ने का आह्वाण किया.इस पूरी हिंसा और इसके मायने समझने हों तो हमे इतिहास की गठरी को टटोलना होगा और 200  साल पीछे जाना होगा.
महाराष्ट्र के कोरेगांव में एक दलित जाति है- महार. कहा जाता है कि पेशवाओं यानी ब्राह्मणों ने उस वक्त, महारों के खिलाफ, एक मार्शल लॉ लागू किया हुआ था. इस अत्याचारी कानून के मुताबिक, महारों को कमर में झाड़ू और गले में मटका बांधने का आदेश दिया गया. झाड़ू इसलिए ताकि उनके कदमों के निशान खुद-ब-खुद मिटते चले जाएं और मटका या कोई दूसरा बर्तन इसलिए ताकि उनका थूक जमीन पर न गिरे. यह दलितों पर कठोर अत्याचार के सबसे चरम बिंदु की ओर इशारा करता है.
उन दिनों अंग्रेजी हुकूमत, हिंदुस्तान के तमाम हिस्सों में पैर पसार रही थी. अंग्रेज़ अपने साम्राज्य को बढ़ाना चाहते थे.उनका निशाना पेशवा बाजीराव द्वितीय को काबू करना था. तो उन्होंने बड़ी संख्या में दलितों को अपनी सेना में भर्ती किया था. इनमें महार, परायास और नमशुद्र कुछ नाम थे. इन वर्गों को उनकी वफादारी और आसान उपलब्धता के लिए भर्ती किया गया था.
पेशवाओं से लोहा लेने को पूरी तरह तैयार थे.युद्ध का वो दिन भी आ गया. अंग्रेजी सेनापति कैप्टन फ्रांसिस स्टॉन्टन के नेतृत्व में कोरेगांव एक भीषण युद्ध का गवाह बना ये एक ऐसा युद्ध था जिसमें कम सैनिकों वाली सेना ने अपने साहस से पेशवाओं के छक्के छुड़ा दिए. जहां संख्या बल महज संख्या भर रह गया. करीब 12 घंटे तक चले युद्ध के बाद पेशवा सेना को कदम पीछे खींचने पड़े. इस युद्ध को महार सैनिकों की जांबाजी और युद्ध कौशल के लिए भी याद रखा जाता है.
भीमा कोरेगांव की लड़ाई आज प्रचलित कई मिथकों को तोड़ती हैं. अंग्रेज़ अपने साम्राज्य का विस्तार करने के लिए इस लड़ाई में थे तो वहीं पेशवा अपने राज्य की रक्षा के प्रयास के लिए.पिछले कुछ सालों में वर्तमान सरकार की नीतियों के कारण दलितों में असंतोष बढ़ रहा है. कोरेगांव में दलितों का बड़ी संख्या में जुटना अतीत से अपने आइकन की तलाश की इच्छा को दर्शाता है, और उन पर किया गया हमला उनकी महत्वकांक्षाओं को दबाने के उद्देश्य से किया गया है.

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Durgesh Dehriya

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