“साथ में अपने टेलर का बिल भी भेज देना, ये तुम्हारा कपड़ा पहनने का स्टाइल हमको बहुत अच्छा लगता है।”
अग्निपथ का यह संवाद सिनेमा के दर्शकों के मन पर छाप छोड़ गया था। फिल्मी संवाद ज़रूरी नहीं कि जिस सेट अप में बोले जाते हैं, उसी सेट अप में प्रभावित करते हैं। सुनने वाला इसे अपने हिसाब से अपनी ज़िंदगी में लागू कर लेता है। अग्निपथ का यह सीन उस ग्रंथी को दर्शाता है जिसे कोई बचपन से ढो रहा होता है। समंदर किनारे कांचा सेठ के अड्डे पर पहुंच कर विजय अपने बचपन की यातना भी याद रखता है और कांचा सेठ का तामझाम भी। तमाम प्रतिशोधों से गुज़रते हुए विजय कांचा सेठ के जैसा ही होना चाहता है। उसके जैसा कपड़ा पहनना चाहता है, उसके जैसा दिखना चाहता है। उसके जैसा धंधा करना चाहता है।
मैं ऐसे ही किसी शख्स को देख रहा हूं। बचपन की उसकी हीन ग्रंथि समय समय पर ऐसे वैभव के प्रदर्शन से ज़ाहिर होती है। बहुत पहले रै बैन का एविएटर चश्मा पहनने वाला, स्टाइल से शॉल ओढ़ने वाला और समंदर के किनारे छुट्टियां मनाने वाला कोई आया था, उसकी छाप कई लोगों के बाल्य ग्रंथी के साथ जुड़ गई थी। अब उस ग्रंथि को बड़ा होते देख रहा हूं। फिर से किसी ने कांचा सेठ और बांह के नीचे से दोशाला ओढ़ने वाले उस शख़्स की छवि को मिलाजुला कर ख़ुद को पेश कर रहा है। अग्निपथ में खलनायक और प्रति खलनायक दोनों अपने कपड़ों, हेलिकाप्टर और समंदर का प्रदर्शन करते रहे। बीच बीच में पेट्रोल पंप फूंकते रहे और हत्याएं करते रहे। प्रतिशोध की नादान समझ के बीच कपड़ों के और हेलिकाप्टर के प्रति शौक की ग्रंथि आज भी बची हुई है। सार्वजनिक जीवन में दिख जाती है। कोई है जिसकी हरकत में इस ग्रंथि को दिन रात देखता हूं।
इस फिल्म के बाद अपने मोहल्ले के कई छुटभैये नेताओं को सफेद कपड़े में घूमते देखा था। लगता था कि सबके पास अपना एक मांडवा है। हकीकत में उनके पास बजाज का स्कूटर होता था। बिना हेल्मेट के बजाज स्कूटर चलाने वाले ये अनगिनत हीरो ज़िंदाबाद मुर्दाबाद करते करते बिला गए। तब के टेलरों पर बहुत दबाव था कि वह इन नेताओं के कपड़े कांचा सेठ के कपड़े की तरह सील दें। विजय के कपड़े की तरह बना दें। ऐसा न पाने के कारण बहुत से टेलरों को पैसा तक नहीं देते थे। कपड़ा पटक कर चले आते थे। ऐसे बहुत से असफल प्रयोगों के बहुत दिनों बाद किसी ने सफल प्रयोग किया है तो सोचा आपके सामने सार्वजनिक जीवन में मौजूद अग्निपथ ग्रंथि को समझने के लिए उसका लिंक साझा करूं। अच्छा लगेगा और ठीक इसी के जैसा कोई और भी दिखेगा। पर आपको लिंक देखना पड़ेगा।
https://www.youtube.com/watch?v=nghQCfoCZVc

यह लेख वरिष्ठ पत्रकार रविश कुमार की फ़ेसबुक वाल से लिया गया है
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