शरजील का इकलौता भाई होने के नाते, मैं आपको यकीन दिला सकता हूं कि दुनिया में अगर किसी ने उसे सबसे नजदीक से देखा है तो वो मैं हूं।

कौन है शरजील इमाम?

मैं यह लेख लिख रहा हूं ताकि आप उसके लेखन और भाषणों को नहीं बल्कि खुद इस शख़्स समझ सकें।

जीवन भर मैंने उससे जलन सी महसूस की है। मेरी इस जलन को वो लोग समझ सकते हैं जिनके भाई-बहन पढ़ाई में बहुत अच्छे हों और वे खुद मेरी तरह औसत दर्जे के छात्र हों। इस शख़्स ने स्कूल में , और फिर कॉलेज में, हमेशा बेहतरीन प्रदर्शन किया, और मेरे लिये तो पास होना ही बड़ी बात थी। कोई आश्चर्य नहीं कि मैं हमेशा अपने माता-पिता की नज़र में एक नाकाम (fail) युवा  था।

उनके आईआईटी-बॉम्बे और जेएनयू क्रेडेंशियल्स के उलट, मैंने एक निजी विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई की, यही अम्मी-अब्बू से अक्सर डांट सुनते रहने के लिये काफ़ी था।

वापस शरजील इमाम पर लौटते हैं। वह कौन है? मैंने लोगों को यह कहते हुए सुना है कि वह राजनीतिक रूप से महत्वाकांक्षी शख़्स है या पैसा कमाने की चाह में है। इससे बेहतर चुटकुला क्या होगा? मैं शर्त लगाता हूं, कि जो लोग उसे जानते हैं वे इस पर हंसेंगे।

हालांकि कहने को बहुत कुछ है, मैं एक ख़ास घटना को याद करना चाहूंगा। शरजील और मैं जब स्कूल में थे, अम्मी हमें एक-एक रुपया देती थीं, लंच में समोसा खाने के लिये। शरजील 6 वीं कक्षा में था, तो सुबह एक बूढ़ा भिखारी हमें मिला, खाना माँग रहा था, शरजील ने उसे अपना एक रुपया दे दिया। जब हम स्कूल से घर लौटे, तो उसने अम्मी से कहा कि वे जल्दी से खाना परोस दीजिये बहुत भूख़ लगी है। अम्मी ने पूछा समोसा नहीं खाया क्या और उसने सहजता से जवाब दिया कि सुबह एक भूखे बुज़ुर्ग मिले थे तो मैंने उनको रुपया दे दिया।

मुझे हमेशा लगता रहा है कि वह पागल है, जो खुद से पहले हमेशा दूसरों के बारे में सोचता है। जब भी अम्मी उसे सब्जियां वगैरह खरीदने भेजतीं, वह हमेशा बाज़ार दर से बहुत अधिक दाम पर खरीद लाता। कारण पूछने पर, वह मासूमियत से कहता, “अम्मी जाने दो ना, वो धूप में खड़ा बेच रहा था, मैंने उसे 30 के बजाय 50 रुपये दे दिये। वह रिक्शा-चालकों के साथ भी ऐसा ही करता और कहता कि कोई इंसान की मेहनत के पसीने का दाम नहीं लगा सकता।

मैं लोगों को कभी नहीं बताता कि वो कैसा ‘अव्यावहारिक’ और ‘पगला’ व्यक्ति है। क्या आप विश्वास कर सकते हैं, कि एक व्यक्ति जो कभी अच्छी-ख़ासी तनख़्वाह कमाता था, और जिसे अभी भी एक फैलोशिप मिलती है, उसने जीवन में कभी भी अपने लिये एक भी कपड़ा नहीं खरीदा है? पहले हमेशा अब्बू उसके लिए कपड़े खरीदते, और अब्बू के गुज़रने के बाद मैं, उसका छोटा भाई, उसके लिए कपड़े खरीदता हूं।

सच तो ये है कि लोगों ने उसे हमेशा भाई क‌े या दोस्तों के कपड़ों में ही देखा होगा। एकमात्र कमोडिटी जो वह खुद खरीदता है, (कमोडिटी कहने के लिए खेद है, क्योंकि शरजील समेत कई लोग उन्हें कमोडिटी कहना पसंद नहीं करेंगे) वो है किताबें। वो हजारों किताबें खरीद सकता है। भोजन, कपड़े वगैरह के लिए वह दूसरों के भरोसे है।

जैसा कि मैंने पहले ही बताया है, वह एक स्कूल से ही बहुत प्रतिभाशाली था। शरजील ने 8 वीं कक्षा में ही C++ और जावा (कंप्यूटर भाषा) में महारत हासिल कर ली थी। जब 10 वीं में कंप्यूटर ‌विषय में उसके 98 नंबर आये, तो हर कोई हैरान रह गया। लोगों को यक़ीन नहीं हो रहा था कि उसके 100 में से 100 नंबर नहीं आये। कॉपियों को दोबारा जांच के लिए भेजा गया।

आज हर कोई जानता है वो आईआईटी-बॉम्बे से स्नातकोत्तर (post-graduate) है, लेकिन कम ही लोग जानते हैं, कि उसने यूरोप के एम्स्टर्डम शहर में एक शोधकर्ता के रूप में काम किया, और भारतीय समाज की सेवा करने के लिए ‌वापस भारत लौटने का फैसला किया। उसका मानना था कि भारत को उसके जैसे लोगों की ज़रूरत है, और अगर उसने देश छोड़ने का फैसला किया, तो इससे समाज का नुकसान होगा।

जब एक अमरीकी बैंक से उसे 40 लाख रुपये की नौकरी की पेशकश मिली तो उसने ठुकरा दी। हमारे जैसे सामान्य व्यावहारिक लोगों की समझ में यह एक पागलपन का फ़ैसला था। उसने अपेक्षाकृत बहुत कम वेतन (12 लाख रुपये के पैकेज) पर बैंगलोर में नौकरी करने का फै़सला किया।

बहुत कम लोगों को विश्वास होगा कि अगर मैं कहूं, कि बैंगलोर में 12 लाख सालाना की आमदनी पर काम करते हुए भी शरजील इमाम हमेशा साइकिल से चलता, और दफ़तर भी चप्पल और कुर्ता पहन कर जाया करता। जिन लोगों ने उसे हाल में मोटरसाइकिल पर देखा होगा, वे शायद यह नहीं जानते होंगे कि वो मोटरसाइकिल मेरी है, शरजील की नहीं।

हालाँकि शरजील बढ़िया सैलरी पा रहा था, लेकिन उसने नौकरी छोड़ कर जेएनयू में दाख़िला लेने का फ़ैसला लिया। वो भारतीय समाज को बेहतर तरीके से समझना चाहता था। उन्होंने प्राथमिक स्रोतों को पढ़ने के लिए कई भाषाएँ सीखीं। अंग्रेजी, हिंदी, उर्दू, फारसी, अरबी, बंगाली, जर्मन ऐसी कुछ भाषाएँ हैं जो उसे पढ़नी आती हैं।

शरजील इमाम पर केवल यह आरोप लगाया जा सकता है कि वह एक दीवाना है। दुनिया में कौन अपना खाना किसी भिखारी को देता है? यूरोप के देश में बसने का अवसर कौन छोड़ता है? 40 लाख का पैकेज कौन अस्वीकार करता है? इतिहास का अध्ययन करने के लिए अच्छी नौकरी कौन छोड़ता है? अच्छे भोजन और कपड़े की जगह किताबें कौन खरीदता है? दरअसल उसपर मुकदमा चलाया जाना चाहिये दीवानेपन, अव्यावहारिकता और मस्तमौला होने का। मेरा भाई बिलकुल अव्यावहारिक है, जो ख़ुद से पहले समाज के, सभी इंसानों के और वतन के बारे में सोचता है।

नोट: यह लेख लेखक के भाई मुज़म्मिल इमाम द्वारा लिखा गया है