ज्यादा दिन नहीं बीते हैं,जब साहित्यकार दामोदर माऊजो ने कहा था कि सनातन संस्था कैंसर की तरह है,इसे बैन कर देना चाहिए। कलबुर्गी ,दाभोलकर से लेकर गौरी लंकेश तक की कड़ियों को अगर जोड़ा जाए,तो सनातन संस्था की कहानी एक थर्ड ग्रेड वाली सीरियल मर्डर मिस्ट्री से कम नहीं। बस फर्क इतना है कि यहां मरने वाले असल ज़िंदगी में जीते जागते किरदार थे।

बात ज्यादा पुरानी नहीं है और पिछले महीने की अठारह तारीख को बॉम्बे हाईकोर्ट ने पनसारे और दाभोलकर केस में काम की सुस्त रफ्तार को देख कर सीबीआई और सीआईडी दोनों को जबरदस्त डांट पिलाई। इस पर जांच कर रही एसआईटी ने कोर्ट के सामने एक मांग रखी कि केस से जुड़ी गोपनीय बातें सिर्फ जज को बता सकते हैं, वो भी उनके चैंबर में। जोर देकर कहा गया कि मामला इतना संगीन है, कि खुले कोर्ट में वकीलों के सामने भी ये बातें नहीं की जा सकती। खैर कोर्ट ने चैंबर वाली बात नहीं मानी लेकिन कहा कि दो हफ्ते में ये सूचनाएं सीलबंद लिफाफे में कोर्ट को सौंप दे।

अब अगली सुनवाई तीन अगस्त को हुई। सीलबंद लिफाफा जज साहेब के सामने रखा गया। जज एस सी धर्माधिकारी और भारती डांगरे ने सीलबंद रिपोर्ट एसआईटी को वापस कर दी और कहा कि इसमें कुछ भी गोपनीय नहीं है।

अब सुनिये गोपनीय क्या है…?

गोवा के सनातन संस्था वाले मुख्यालाय में क्या होता है, ये पता लगाना गोपनीय है क्योंकि इसकी एंट्री प्रतिबंधित है। इस संस्था की बैठकें प्राईवेट इवेंट की तरह होती हैं। एक पत्रकार ने कुछ वक्त पहले सनातन संस्था की एक ऐसी ही बैठक में बतौर मीडियापर्सन शिरकत की, लेकिन उसका दावा है कि एजेंडे वाली बैठकें परदे के पीछे ही होती हैं।

क्या गोपनीय नहीं है..?

  • फॉरेंसिक साईंस लैब का ये सबूत कलबुर्गी ,पनसारे और लंकेश को मारने के लिए एक ही पिस्तौल का इस्तेमाल हुआ था।
  • उत्तर प्रदेश,गुजरात,महाराष्ट्र ,गोवा और कर्नाटक में सनातन संस्था सक्रिय है.
  • गिरीश कर्नाड समेत तकरीबन चौंतीस ऐसे लोग एक ऐसी हिटलिस्ट का हिस्सा हैं जिन्हें जान का खतरा है।
  • एनआई ने कुछ सालों पहले गोवा ,वाशी,ठाणे में हुए धमाकों में सनातन संस्था के लोगों को गिरफ्तार किया था.
  • सनातन संस्था के दो समर्थकों मालगोंडा पाटिल और योगेश नायक की उस वक्त जान चली गई जब वो स्कूटर पर बम ले जा रहे और बम पहले ही फूट गया।

और जो बिल्कुल गोपनीय नहीं है

किरण रिजिजू ने संसद में तीन साल पहले ही कह दिया था कि पनसारे,दाभोलकर और कलबुर्गी की हत्या का आपस में कोई संबंध नहीं है।

क्या गोपनीय है और क्या खुले में। वो इस बात पर निर्भर है कि आप क्या देखना चाहते हैं और क्या नजरअंदाज करना चाहते हैं।