मालदीव में राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन ने इमरजेंसी लगा दी है और सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश अब्दुल्ला सईद और पूर्व राष्ट्रपति मॉमून अब्दुल गयूम को जेल में डाल दिया है. सुप्रीम कोर्ट के तीन अन्य न्यायाधीशों ने डर कर यामीन के फैसलों पर स्वीकृति की मुहर लगा दी है.
मालदीव में जारी इस राजनीतिक उठापटक के बीच राष्‍ट्रपति अब्‍दुल्‍ला यामीन की सरकार ने ‘मित्र देशों’ में अपने दूत भेजने का ऐलान किया है, जो देश के मौजूदा हालात की जानकारी इन देशों को देकर उन्‍हें भरोसे में लेने की कोशिश करेंगे.लेकिन हैरानी की बात यह है कि यामीन सरकार ने जिन तीन तथाकथित मित्र देशों में अपने दूत भेजने की घोषणा की है, उनमें भारत शामिल नहीं है.

मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद, जो फ़िलहाल श्रीलंका में शरण लिए हुए है

मालदीव के राष्‍ट्रपति अब्‍दुल्‍ला यामीन की सरकार ने जिन तीन ‘मित्र देशों’ देशों में अपने दूत भेजने का ऐलान किया है, उनमें चीन, पाकिस्‍तान और सऊदी अरब शामिल है, जबकि क्षेत्रीय महाशक्ति होने के बावजूद  भारत की अनदेखी की गई है और भारत को ‘मित्र देशों’ की सूची से बाहर रखा गया.
यामीन सरकार की ओर से यह कदम ऐसे समय में सामने आया है, जबकि मालदीव के पूर्व राष्‍ट्रपति मोहम्‍मद नशीद ने बार-बार भारत से समर्थन की अपील की है. मालदीव में ‘बाहरी दखल’ को लेकर चीन चेतावनी के जवाब में नशीद ने दो टूक कहा कि भारत कब्जा करने वाला नहीं, बल्कि मुक्तिदाता है और उनके देश के लोग भारत से सकारात्‍मक भूमिका की उम्‍मीद करते हैं.

 
इससे पहले चीन ने कहा था कि मालदीव में हस्तक्षेप को लेकर भारत को अप्रत्‍यक्ष तौर पर चेताते हुए कहा था कि संकटग्रस्‍त देश में बाहरी ‘हस्तक्षेप’ से स्थिति और जटिल होगी. चीन का यह बयान मालदीव में भारत के ‘दखल’ की संभावनाओं के बीच आया. हालांकि नशीद की ओर से बार-बार सहयोग की अपील के बावजूद भारत ने केवल इतना कहा कि वह मालदीव के हालात से ‘चिंतित’ है. नई दिल्‍ली ने इस संबंध में जारी औपचारिक बयान में नशीद की अपील का जिक्र भी नहीं किया.
मालदीव के राष्ट्रपति अब्दुल्लाह यामीन के साथ , प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

भारत इस संबंध में क्या कदम उठाने जा रहा है, यह तो अभी स्पष्ट नहीं है, लेकिन भारत ने 1988 में मालदीव की सैन्य मदद की थी. आजादी के बाद विदेशी धरती पर भारत की पहली सैन्य कार्रवाई ‘ऑपरेशन कैक्टस’ के नाम से आज भी इतिहास के पन्नों पर दर्ज है.

क्या हुआ था 3 नवंबर 1988 को

3 नवंबर 1988 का दिन.श्रीलंकाई उग्रवादी संगठन पीपुल्स लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन ऑफ तमिल ईलम (PLOTE) के हथियारबंद उग्रवादी मालदीव पहुंचे. स्पीडबोट्स के जरिये मालदीव पहुंचे उग्रवादी पर्यटकों के भेष में थे. श्रीलंका में कारोबार करने वाले मालदीव के अब्दुल्लाह लथुफी ने उग्रवादियों के साथ मिलकर तख्ता पलट की योजना बनाई थी. पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नसीर पर भी साजिश में शामिल होने का आरोप था. श्रीलंका में हुई प्लानिंग को अब मालदीव में अंजाम देना था.

तीन नबंवर को मालदीव पहुंचे हथियारबंद उग्रवादियों ने जल्द ही राजधानी माले की सरकारी इमारतों को अपने कब्जे में ले लिया. प्रमुख सरकारी भवन, एयरपोर्ट, बंदरगाह और टेलिविजन स्टेशन उग्रवादियों के नियंत्रण में चला गया. उग्रवादी तत्कालीन राष्ट्रपति मामून अब्दुल गय्यूम तक पहुंचना चाहते थे. लेकिन इसी बीच गय्यूम ने कई देशों समेत नई दिल्ली को इमरजेंसी संदेश भेजा.
उस समय मालदीव में भारत के उच्चायुक्त थे ए के बैनर्जी. वो ग़यूम की पहले से निर्धारित भारत यात्रा के सिलसिले में दिल्ली आए हुए थे.

ओपरेशन केक्टस के बाद तातकालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और मालदीव के राष्ट्रपति

जब राजीव गांधी आये हरकत में

3 नबंवर को मालदीव पहुंचे हथियारबंद उग्रवादियों ने मालदीव की राजधानी माले की ज्यादातर सरकारी बिल्डिंगों को अपने कब्जे में लेना शुरू कर दिया. सरकारी बिल्डिंगों के साथ एयरपोर्ट, बंदरगाह और टेलिविजन स्टेशन भी उग्रवादियों के नियंत्रण में चले गए. उग्रवादियों का मकसद तत्कालीन राष्ट्रपति मामून अब्दुल गय्यूम तक पहुंचना चाहते था. राष्ट्रपति को जब इसकी भनक लगी तो उन्होंने भारत समेत कई देशों को इमरजेंसी संदेश भेजा. भारत को संदेश मिलने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को इस बारे में सभी सूचना दी गई. राजीव गांधी ने बगैर वक्त गंवाए इस पर एक्शन का मन बना लिया.

ओपरेशन केक्टस के पहले भारतीय सेना

फिर हुई सैन्य कार्यवाही

3 नवंबर की रात को ही आगरा छावनी से भारतीय सेना की पैराशूट ब्रिगेड के करीब 300 जवान माले के लिए रवाना हुए. गय्यूम की दरख्वास्त के नौ घंटे के भीतर ही नॉन स्टॉप उड़ान भरते हुए भारतीय सेना हुलहुले एयरपोर्ट पर पहुंची. यह एयरपोर्ट माले की सेना के नियंत्रण में था.

हुलहुले से लगूनों को पार करते हुए भारतीय टुकड़ी राजधानी माले पहुंची. इस बीच कोच्चि से भारत ने और सेना भेजी. माले के ऊपर भारतीय वायुसेना के मिराज विमान उड़ान भरने लगे. भारतीय सेना की इस मौजूदगी ने उग्रवादियों के मनोबल पर चोट की. इसी दौरान भारतीय सेना ने सबसे पहले माले के एयरपोर्ट को अपने नियंत्रण में लिया और राष्ट्रपति गय्यूम को सिक्योर किया. इस बीच भारतीय नौसेना के युद्धपोत गोदावरी और बेतवा भी हरकत में आ चुके थे. उन्होंने माले और श्रीलंका के बीच उग्रवादियों की सप्लाई लाइन काट दी.

कुछ ही घंटों के भीतर भारतीय सेना माले से उग्रवादियों को खदेड़ने लगी. वापस श्रीलंका की ओर भागते लड़ाकों ने एक जहाज को अगवा कर लिया. अगवा जहाज को अमेरिकी नौसेना ने इंटरसेप्ट किया. इसकी जानकारी भारतीय नौसेना को दी गई और फिर आईएनएस गोदावरी हरकत में आया. गोदावरी से एक हेलिकॉप्टर ने उड़ान भरी और उसने अगवा जहाज पर भारत के मरीन कमांडो उतार दिये. कमांडो कार्रवाई में 19 लोग मारे गए. इनमें ज्यादातर उग्रवादी थे. इस दौरान दो बंधकों की भी जान गई.

आजादी के बाद विदेशी धरती पर भारत का यह पहला सैन्य अभियान था. अभियान को ऑपरेशन कैक्टस नाम दिया गया. इसकी अगुवाई पैराशूट ब्रिगेड के ब्रिगेडियर फारुख बुलसारा कर रहे थे. दो दिन के भीतर पूरा अभियान खत्म हो गया. गय्यूम के तख्तापलट की कोशिश नाकाम हो गई. संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका और ब्रिटेन समेत कई देशों ने भारतीय कार्रवाई की तारीफ की. लेकिन श्रीलंका ने इसका कड़ा विरोध किया.

माले में ऑपरेशन कैक्टस आज भी दुनिया के सबसे सफल कमांडो ऑपरेशनों में गिना जाता है. विदेशी धरती पर सिर्फ एक टूरिस्ट मैप के जरिये भारतीय सेना ने यह ऑपरेशन किया. ऑपरेशन के बाद ज्यादातर भारतीय जवान वापस लौट आए. किसी आशंका या संभावित हमले को टालने के लिए करीब 150 भारतीय सैनिक साल भर तक मालदीव में तैनात रहे.

क्यों महत्वपूर्ण है मालदीव

मालदीव के साथ भारत के संबंध बहुत पुराने हैं. 1965 में मालदीव को सबसे पहले मान्यता देने वाले देशों में भारत शामिल था. भारत ने 1972 में वहां अपना दूतावास भी खोला.मालदीव में करीब 25 हजार भारतीय रह रहे हैं. हर साल मालदीव जाने वाले विदेशी पर्यटकों में 6% भारतीय होते हैं.
2011 तक चीन में मालदीव का दूतावास नहीं था. पर 6 साल से वह मालदीव की मदद कर रहा है.
भारत, दक्षिण एशियाई देशों, हिंद महासागर क्षेत्र में नेट सिक्युरिटी प्रोवाइडर है. इसकी सुरक्षा के लिहाज से भी मालदीव अहम है.मालदीव सार्क देशों का भी सदस्य है.वह हमेशा भारत के साथ रहा है.
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भारत जल्दबाजी के मूड में नही

अभी मालदीव को बाहरी मदद का 70% हिस्सा अकेले चीन से मिल रहा है.मालदीव के राष्ट्रपति यामीन चीनी समर्थक बताए जाते हैं. मालदीव की बड़ी आबादी चाहती है कि भारत इस संकट में उनकी मदद और यामीन पर कार्रवाई करे.
लेकिन भारत इस मामले में जल्दबाजी करने के मूड में नहीं है. श्रीलंका के अनुभव से वह सीख चुका है कि दूसरे देशों के राजनीतिक मामलों में सैन्य हस्तक्षेप करने का क्या परिणाम निकल सकता है. मालदीव के संविधान के अनुसार इमरजेंसी की घोषणा को संसद की स्वीकृति मिलनी चाहिए. यदि संसद का सत्र चल रहा हो तो 48 घंटे में और यदि न चल रहा हो तो 15 दिन में यह स्वीकृति मिल जानी चाहिए. संसद का सत्र 5 फरवरी को शुरू होने वाला था था लेकिन उसे भी टाल दिया गया है.

भारत धैर्य के साथ देखना चाहता है कि यामीन इस संबंध में क्या करते हैं. जहाँ तक अभी तक मिल रहे संकेतों का सवाल है, भारत विशेष दूत भेजने के नाशीद के अनुरोध तक को स्वीकार नहीं करना चाहता. नाशीद जब स्वयं राष्ट्रपति थे, तब उन्होंने भारत की नाराजगी की परवाह न करते हुए चीन के साथ दोस्ती बढ़ाने की कुछ ज्यादा ही कोशिश की थी, भले ही आज वे यामीन पर चीन को मालदीव की भूमि बेचने का आरोप लगा रहे हों.

फिलहाल भारत अमेरिका, सऊदी अरब और संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से मालदीव पर दबाव डालने का प्रयास कर रहा है. मालदीव की अर्थव्यवस्था पर्यटन पर टिकी है. इसलिए भारत समेत अनेक यूरोपीय देशों ने अपने-अपने नागरिकों को मालदीव से दूर रहने की सलाह दी है. दिलचस्प बात यह है कि यात्रा संबंधी ऐसा सुझाव जारी करने वालों में चीन भी शामिल है. भारत की यह भी कोशिश है कि यामीन सरकार के सदस्यों और अधिकारियों की यात्राओं पर भी प्रतिबंध लगा दिए जाएं ताकि वे भारत या अन्य देशों की यात्रा पर न जा पाएं. अभी यही कोशिश की जा रही है कि सैनिक हस्तक्षेप के अलावा अन्य सभी विकल्पों को आजमा लिया जाए.

इस क्षेत्र की महत्वपूर्ण शक्ति होने के कारण भारत बहुत दिनों तक अपनी अपेक्षित भूमिका निभाने से बच नहीं सकेगा. जल्द ही उसे कड़े फैसले लेने ही होंगे. लेकिन उनका दूरगामी लाभ तभी होगा जब वह मालदीव सरकार के साथ इस बारे में दीर्घकालिक समझ बनाए कि उसके हितों की अनदेखी नहीं की जाएगी और चीन या अन्य किसी देश के साथ अत्यधिक घनिष्ठ संबंध नहीं कायम किये जाएंगे.

नेपाल और श्रीलंका की तरह ही मालदीव भी भारत और चीन के बीच की प्रतिस्पर्धा का लाभ उठाने की कोशिश करता रहता है और भारत पर दबाव बनाने के लिए चीन की और झुकाव दिखाता है. लेकिन भविष्य में उसे ऐसी हरकतों से बाज आना पड़ेगा. इसके अलावा वहां के अभिजात वर्ग को यह भी तय करना होगा कि उसे लोकतंत्र अधिक पसंद है या तानाशाही. भारत का समर्थन काफी कुछ इस बात पर भी निर्भर करेगा कि मालदीव की आतंरिक राजनीतिक व्यवस्था सुधरती है या नहीं.
 

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Durgesh Dehriya

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