टेलीविजन हमारी ज़िंदगी मे रच बस गया है क्योंकि इसके माध्यम से घर बैठे बिठाए फिल्में, सूचना सम्बन्धी जानकारी या लेटेस्ट खबरें हम तक पहुंच जाती हैं। हालांकि, इंटरनेट जब से सस्ता हुआ है तब से टेलीविजन का उपयोग थोड़ा कम हो गया है। फिल्में और धारावाहिक अब टीवी पर आने से पहले इंटरनेट पर प्रसारित कर दिये जाते हैं। वहीं इंटरनेट पर आने वाली वेब सीरीज़ का क्रेज़ भी लगातार बढ़ रहा है।

लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है कि टेलीविजन ने खुद को नहीं बदला। टेलीविजन ने लकड़ी के डिब्बे में आने वाले टीवी बॉक्स से लेकर स्लिम ट्रिम स्मार्ट टीवी तक का सफ़र तय किया है। टेलीविजन अब पहले से स्मार्ट हो चुका है। इसमें यूट्यूब से लेकर नेटफ्लेक्स, प्ले स्टोर और गेम्स भी अब एक्सेस किये जा सकते हैं। तो चलिए, ऐसी ही रोचक बातों के साथ टेलीविजन के सफ़र की शुरुआत करते हैं।

क्या है टेलीविज़न

टेलीविजन एक इलेक्ट्रॉनिक डिवाइज है। जिसमें आप अलग-अलग चैनल पर मनोरंजक या सूचना देने वाले चैनलों का प्रोग्राम को देख सकते हैं। इन चैनलों पर विभिन्न चैनलों पर धारावाहिक, खबरें, सूचना, रियलिटी शो, एजुकेशनल कॉन्टेंट और एंटरटेनमेंट कॉन्टेंट देखा जा सकता है। इसे काफी लोग tele और Telly के नाम से भी जानते हैं।

टेलीविजन को तकनीकी भाषा मे परिभाषित किया जाए तो, “टेलीविजन एक टेलीकम्युनिकेशन मीडियम डिवाइज है जिसमें ध्वनि और चित्र ट्रांसमिशन के माध्यम से दिखाई देते हैं” टेलीविजन सेटेलाइट और रेडियो तकनीक पर आधारित है।


टेलीविजन का अविष्कार किसने किया था:

जब भी टेलीविजन के आविष्कार की बात की जाएगी तब तीन नामों को मुखरता से लिया जाएगा। ये नाम हैं Philo Farnsworth, John Logie Baird और Charles Francis Jenkins. टेलीविजन के आविष्कार में कई विद्वानों और वैज्ञानिकों का योगदान है। किसी ने थ्योरी दी तो किसी ने उसे हकीकत में बदला।

लेकिन इलेक्ट्रॉनिक टेलीविजन का अविष्कार का श्रेय फिलो टेलर फर्नवर्थ ( Philo Farnsworth ) को जाता है। फिलो ने 21 साल की उम्र में एक ऐसा उपकरण बनाया जो चलती हुई तस्वीरों को न केवल कैप्चर कर सकता था बल्कि कोड में बदलकर रेडियो किरणों के माध्यम से दूसरे डिवाइज में ट्रांसफर भी कर सकता था। दूसरी और john lojie baird ने दुनिया को टेलीविजन सिस्टम दिया था। इन्होंने रंगीन टेलीविजन प्रणाली का अविष्कार भी किया था।

विश्व में टेलीविजन:

वैश्विक स्तर पर टेलीविजन के सफ़र की बात की जाए तो, इंग्लैंड में 2 नवम्बर 1936 को बीबीसी ने लंदन के एलेक्जेंडर पैलेस से अपना टेलीविजन प्रसारण शुरू किया था। अमेरिका में 13 अप्रैल 1939 को न्यूयॉर्क में पहली बार आम जनता के लिए टेलीविजन का प्रदर्शन किया गया था। वहीं रूस के मास्को में 1959 में नियमित रूप से टेलीविजन का प्रसारण शुरू हुआ था।


भारत में टेलीविजन का आगमन:

भारत में टेलीविजन का आगमन 15 सितंबर 1959 को हुआ था। भारत मे प्रथम टेलीविजन प्रसारण में करीब 20 साल का वक्त लगा था। दरअसल, भारत उस समय तक देश मे टीवी की स्थापना को लेकर असमंजस में था। दूसरी ओर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का मानना था कि भारत एक गरीब देश है, और यहाँ टीवी जैसे महंगे माध्यम का प्रयोग नहीं किया जा सकता।

हालांकि, कुछ विशेषज्ञ मानते थे कि टीवी भारत के शैक्षणिक, सामाजिक और आर्थिक विकास में सहायता अदा करेगा। इसके बाद 1956 में यूनेस्को ने भारत मे एक सम्मेलन किया जिसका उद्देश्य भारत मे टीवी के प्रयोग को बढ़ावा देना था। सम्मेलन के बाद फिलिप्स कंपनी ने भारत सरकार को टीवी उपकरण बेचने का प्रस्ताव दिया था।


दिल्ली में किया गया था दूरदर्शन का पहला प्रसारण :

1957 में टेलीविजन स्थापना के लिए सरकार ने 40 लाख के बजट का प्रावधान किया था। इसके बाद दिल्ली के आकाशवाणी भवन में अप्रैल 1958 में टेलीविजन ट्रांसमीटर लगाया गया, वहीं आकाशवाणी रिसर्च लेबोरेटरी को स्टूडियो बनाया गया।

यहां 16 mm और 33mm के फिल्में दिखाने की व्यवस्था की गई। यह व्यवस्था टीवी की तकनीक को समझने के लिए की गई थी। जब इंजीनियर को तकनीक का पूर्ण ज्ञान हो गया तब डेढ़ साल बाद 15 सितंबर 1959 को विधिवत रूप से दिल्ली में पहली बार टीवी प्रसारण किया गया। हालांकि, इसका शुरुआती दायरा 24 किलोमीटर ही था।


आकाशवाणी और दूरदर्शन को अलग कर दिया गया था:

राष्ट्रीय प्रसारण सेवा दूरदर्शन की स्थापना दिल्ली में करने के बाद देश के अन्य शहरों में टेलीविजन केंद खोले गए। 1972 में बम्बई (आज का मुम्बई), श्रीनगर और अमृतसर में टेलीविजन केंद्र खोले गए। वहीं 1975 में कलकत्ता, मद्रास और लखनऊ में केंद खोले गए थे। 1976 में चंदा समिति ने एक रिपोर्ट पेश की थी, जिसमें दूरदर्शन और आकशवाणी को सुचारू रूप से चलाने के लिए सुझाव दिए गए थे। इनमें पहला सुझाव आकाशवाणी और दूरदर्शन को अलग करने का था। वहीं BB वर्गीज़ कमेटी ने भी इसी प्रकार के सुझाव दिए थे। इस कमेटी ने प्रेस आयोग और प्रसार भारती की स्थापना की मांग भी की थी, ताकि आकाशवाणी और दूरदर्शन को चलाया जा सके। इसके बाद 1976 में आकशवाणी और दूरदर्शन को अलग कर दिया गया था।

यूं मिला था टेलीविजन को भारत मे दूरदर्शन का नाम:

भारत मे टेलीविजन कहिए या दूरदर्शन, बात एक ही है। ये हवा हवाई बात नहीं है इसे सिद्ध किया जा सकता है। दरअसल, जब हम टेलीविजन को दो भागों में बांटते है तो शब्द बनते है टेली+ विज़न। टेली ग्रीक भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है डिस्टेंस (distance) यानी “दूर”, वहीं “विज़न” लेटिन भाषा का शब्द है और इसका अर्थ है To see यानी दर्शन। इस प्रकार टेलीविजन का अर्थ है दूरदर्शन ।

शुरुआत में टेलीविजन पर सोशल एजुकेशनल प्रोजेक्ट को अपनाया गया था। इनका प्रसारण सप्ताह में दो दिन आधे-आधे घण्टे के लिए किया जाता था। 60 के दशक में स्कूली बच्चों के लिए शाम को कार्यक्रम प्रसारित किया गया था।

रंगीन टेलीविजन का दौर:

80 के दशक में देश के शहरों में दूरदर्शन की पहुंच बनानी शुरू कर दी गयी थी। इसका कारण 1982 में होने वाले एशियाई खेल थे। एशियाई खेलों का दिल्ली में होने का एक लाभ ये हुआ कि अब श्याम और श्वेत दिखने वाला टेलीविजन रंगीन हो चला था। 1984 में देश के गांव गांव में टेलीविजन की पहुंच बनाने के लिए हर दिन एक ट्रांसमिटर लगाया जाने लगा था।


दूरदर्शन के शुरुआती धारावाहिक:

80 का दशक में दूरदर्शन एक पारिवारिक कार्यक्रम “हम लोग”, की शुरूआत की गई। इस धारावाहिक ने घर-घर मे अपनी पहचान बनाई ली थी। वहीं इस धारावाहिक के किरदार भी काफी मशहूर हो गए थे। इसके बाद भारत और पाकिस्तान के विभाजन की कहानी लेकर ” बुनियाद” धारावाहिक आया था। इस धारावाहिक ने विभाजन की त्रासदी से उस दौर की पीढ़ी को परिचित करवाया था।

इसके किरदार आलोक नाथ (मास्टर जी), अनीता कंवर (लाजो जी), विनोद नागपाल, दिव्या सेठ भी बहुत लोकप्रिय हुए। इसके बाद मालगुडी डेज़, ये जो है जिंदगी, श्रीमान- श्रीमती, रजनी, ही मैन, तमस, चित्रहार, भारत एक खोज, व्योमकेश बक्शी, और अलिफ लैला जैसे बेहतरीन धारावाहिक ने दूरदर्शन को हर घर में सदस्य बना दिया। 

रामायण, महाभारत और देख भाई देख जैसे धारावाहिकों ने अपना एक अलग ही दर्शक वर्ग तैयार कर लिया था। कहा जाता है कि रामानंद सागर निर्मित रामायण के ये हालात थे कि जब भी धारावाहिक आता था तो लोग अपने घर की साफ सफाई कर अगर बत्ती जलाकर धारावाहिक देखते थे। जिस वक्त टीवी पर रामायण आता था तो सड़को और दफ्तरों में सन्नाटा छा जाता था। लोग इस वक्त काम धन्धा छोड़ कर परिवार के साथ सिर्फ रामायण देखा करते थे। यहां तक कि राम, लक्ष्मण और सीता का किरदार निभाने वाले अरुण गोविल, सुनील लहरी और दीपिका चिखालिया को लोग सच में भगवान राम, लक्ष्मण और मां सीता मानने लगे थे।

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Sushma Tomar