एक दिन सियासत तुम्हारा नाम निसार से बदलकर नरेश कर देगी और तुम बस लोकतंत्र को बचाते रहना। नाम बदलना कोई छोटी बात नहीं है। ये तुम्हारी विरासत, तुम्हारे आब-ओ-अजदाद की कुर्बानियां, तुम्हारी तारीख़ के साथ सबसे बड़ा हमला है। यक़ीन न हो तो जाके यूरोप में उन शहरों को देख लो कि जहाँ तुम्हारे आब-ओ-अजदाद सैकड़ों साल हुकूमत किए हैं, जिस यूरोप को डार्क एज से निकाल कर वहाँ इंसानों को रहने के लायक एक ख़ूबसूरत निज़ाम दिया था वहाँ आज तुम्हारा नाम लेने वाला नहीं है। तुम्हारा बनाया हुआ शहर, तुम्हारी इमारतें, तुम्हारी तामीर की गई सड़कें आज किसी और के नाम से जानी और पहचानी जाती हैं।

सवाल ये है कि हज़रतगंज चौराहा, मुग़लसराय, औरंगजेब रोड का नाम ही क्यों बदला जा रहा है? क्या ये देश इतना साम्प्रदायिक हो चुका है कि मुस्लिम इतिहास और इनकी पहचान से जुड़ी हुई चीज़ों को देखना पसंद नहीं कर रहा है? क्या सियासत इतनी डर चुकी है जो मुसलमानों के अस्तित्व से जुड़े हुये तमाम दस्तावेजों को ख़त्म करने पे तुली है?

अगर किसी को श्रद्धांजलि ही देनी है तो उनके नाम पर अलग चौराहा या अलग रोड क्यों नहीं बनाया जा रहा है? क्यों नहीं बहुसंख्यक समाज के नाम पर बने सड़कों एवं चौराहों का नाम बदला जा रहा है?

हज़रतगंज जो कि लखनवी तहजीब-ओ-शकाफत का एक मरकज़ है, जिसकी तारीख़ दो सौ साल पुरानी है, इसका नाम आते ही अदब और तहजीब की एक रवायत सी महसूस होने लगती है, जो पूरी दुनिया में अपनी खूबसूरती के लिए मशहूर है। क्या इस चौराहे का नाम बदल देने से अटल जी की सच्ची श्रद्धांजलि पूरी हो जाएगी?

आख़िरी बात, जिन कौमों का अपना कोई इतिहास नहीं होता है वो दूसरी कौमों के इतिहास से छेड़छाड़ करके उसे अपना बनाती रहती हैं। हमारा इतिहास इतना शानदार रहा है कि अगर हम नहीं होते तो हज़रतगंज छोड़िए पूरा का पूरा लखनऊ ही नहीं होता।

आप कितने नाम बदलेंगे? सात पीढ़ियाँ गुज़र जाएँगी फिर भी बदल नहीं पाओगे क्योंकि तारीख़ के हर पन्ने पे हमारी मुहर लगी हुई है।