बधाई हो मित्रों – अब हम अमेरिका के घोषित पिछलग्गू, नाटो सदस्य बनने से बस एक कदम दूर रह गए हैं- बाकी असल में बन ही गए हैं!

क्या है कि देश नहीं झुकने देंगे जुमला सरकार ने अमेरिका से कोमकासा (कम्युनिकेशन कम्पेटिबिलिटी एंड सिक्योरिटी एग्रीमेंट) कर ही डाला।  यह अमेरिका की उन चार संधियों में से है जो वह अपने सहयोगियों (ध्यान दें- मितरों- मित्र/साथी नहीं- सहयोगियों) के साथ करता है.

बाकी चार में 2 पर वह भारत से पहले ही समझौता करवा चुका है- पहली- जनरल सिक्योरिटी ऑफ़ मिलिट्री इनफार्मेशन एग्रीमेंट पर 2002 में संघी सरकार (वाजपेयी के नेतृत्व वाली ही) से- क्या है कि 1974 में ही परमाणु परीक्षण कर परमाणु शक्ति बन चुके भारत में दूसरा परीक्षण करके उन्होंने केवल पाकिस्तान को परमाणु शक्ति बनने का मौका ही नहीं दे दिया था- दुनिया भर के प्रतिबंध झेल अर्थव्यवस्था को पटरी से भी उतार दिया था. अमेरिका के पास मौका अच्छा था, उसने घेंचा पकड़ हस्ताक्षर करवा लिया।

दूसरा किया खुद स्वघोषित 56 इंच मोदी ने- लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ़ एग्रीमेंट- 2016 में. इसके तहत दोनों देश एक दूसरे के सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल फिर से तेल भरवाने और सामग्री भरने के लिए कर सकते हैं! – कितना तो शानदार समझौता है न- भारत को आखिर क्यूबा से, कनाडा से, फ्रांस से युद्ध लड़ना है जिसके लिए उसे अमरीकी सैन्य ठिकानों से तेल भरवाना ही पड़ेगा! मास्टरस्ट्रोक सच में! बाकी अमेरिका को अगर चीन से पंगा लेना हो तो हमें मोदी जी की इस कृपा से उसे समर्थन देना होगा- बदले में जो हो सो हो!
और भारत ने किया क्यों? क्योंकि अब भारत भविष्य में अमरीका से जो जेट विमान खरीदेगा उसमें अत्याधुनिक संचार साधन लगाए जा सकते हैं (पर मोदी जी तो फ्रांस से खरीद के लाये हैं- उसमें न लगेंगे!)

बाकी- कभी विश्व में बड़ी निष्पक्ष और सम्मानित आवाज़ रहे (आज़ादी के 5 साल के भीतर फ़्रांस-वियतनाम युद्ध के बीच मध्यस्थता के लिए जो अंतर्राष्ट्रीय पैनल बना था उसका नेता भारत था, नेहरू जी थे!) हम लोग अब अमरीका को तेल लगाएंगे- माफ़ करें, भरेंगे!

वाह मोदी जी, वाह. आप तो अटल जी से भी आगे निकल गए- अमरीका के सामने एक समर्पण मुकाबले 2 की भारी बढ़त के साथ.