आमिर खान और नसीरुद्दीन शाह ही नहीं अमित शाह भी डरते हैं। पर दोनों के डर में अंतर है। आमिर और नसीर का भय प्रजा का भय है जब कि अमित शाह का भय सत्ता खोने से उपजता हुआ भय है। वैसे भी अपराधी मानसिकता का कोई व्यक्ति कितनी ही सुरक्षा में रहे, हमेशा डरता ही रहता है। मैंने अपने सेवाकाल में, बेहद खतरनाक माफिया सरगनाओं को भी सिपाही से डरते देखा है। यह अलग बात है कि वे पुलिस अफसरों से जब मिलते हैं तो विनम्रता की मूर्ति नज़र आते हैं। पर वे आदतन विनम्र नहीं होते हैं। यह विनम्रता भी मन मे पैठे भय का परिणाम होती है। और यह डर ही इन माफिया सरगनाओं से पुलिस जवानों और अपने विरोधियों तथा कभी कभी अपने बेहद करीबी गुर्गों की भी हत्या करवा देता है, उनकी हत्या का षड्यंत्र रचवाता है, कानून से समझौते करने के जुगाड़ ढुंढवाता है, और अपने इर्दगिर्द भय की चादर ताने रहता है। यह डर ही तानाशाही के वायरस को जन्म देता है, और उन्हें किसी भी तार्किक बहस से दूर रखता है। हर सवाल से वे असहज होते हैं। आखिर यह डर है किस बात का ? सत्ता पाने के बाद सत्ता खोने का डर उन्हें सोने नहीं देता है।

इन साढ़े चार सालों में, इन दो महानुभावों द्वारा, संवैधानिक संस्थाओं को गुलाम बनाये जाने की पूरी कोशिश की गई। हर संवैधानिक संस्था, चाहे वह निर्वाचन आयोग हो, केंद्रीय सतर्कता आयोग हो, सीएजी हो, या सरकार के आयकर, ईडी और सीबीआई जैसे महत्वपूर्ण विभाग जिससे अपने विरोधियों को साधा जा सके, के संविधान सम्मत संचालन में जानबूझकर बाधा उत्पन्न की गयी। जिसने भी आज़ाद खयाली और संविधान की बात की, उसे या तो सरकार की अवैधानिक ताकत से डराने की कोशिश की गयी, या बेरोज़गार ट्रॉल्स को उनपर लुहका दिया गया। देश का अधिकांश मीडिया समूह बाकायदा उपकृत होकर सरकार के सूत्र का भाष्य और परायण करने वाला वेतनभोगी दास या बटुक मीडिया बन चुका है। कल ही तो कहा था उन्होंने कि, 50 साल तक राज करेंगे वे। सामान सौ बरस का कल की खबर नहीं ! औऱ आज,उन्हें गुलामी का डर सता रहा है ?  कहते हैं यह युद्ध है। पानीपत का। तीसरा युद्ध। मराठा हारे थे जिसमें। देश गुलाम हुआ था। उस युद्ध के आक्रांता कौन था, यह तो सबको पता है, पर इस भावी पानीपत के चौथे युद्ध 2019 का एक पक्ष तो पता है जो हार से डरा है पर आक्रमणकारी कौन है , यह अभी किसी ने नहीं बताया है।

ये सचमुच में डरे हुये लोग हैं। 22 दिन की सेवा शेष रहे एक आईपीएस अफसर अलोकवर्मा और खुद द्वारा बर्खास्त किये गए एक और आईपीएस अफसर संजीव भट्ट से भी इतना डरते हैं कि एक को सारा कामधाम छोड़ कर हटा दिया और दूसरे की 22 साल पुराने एक मामले में किसी भी तरह से जमानत नहीं होने दे रहे हैं। और अब तो गुलामी का डर भी सार्वजनिक हो गया है।

उनकी आस्था लोकतंत्र में कभी नहीं रही है। रही भी तो सिर्फ उतनी ही जितने भर से वे सत्ता में आ जाँय। अक्सर तानाशाह, चुनाव की सीढ़ियों से सत्ता के शिखर पर पहुंच कर उन सीढ़ियों को कहीं लपेट कर वे रख देते हैं ताकि कोई दूसरा उन सीढ़ियों से शिखर पर आ, उन्हें चुनौती न दे सके। फिर वे यह भी भूल जाते हैं कि सीढ़ीयां रखी कहाँ है। पर जब जनता उद्वेलित और आक्रोशित होती है तो दुर्लंघ्य दिखते शिखर की ओर जाता हुआ हर मार्ग जनता के लिये सुगम बन जाता है। फिर वह सत्ताधिपति सीढ़ियों द्वारा नीचे नहीं उतारा जाता है, शिखर से नीचे एक अनजान खाई में फेंक दिया जाता है और जहां इतिहास की खोज करने वाले ही पहुंचते हैं। और कोई नहीं जाता वहां, उनकी सुधबुध लेने जो कभी तख्तनशीन थे।

अब तो सब कुछ ठीक है। प्रधानमंत्री कहते हैं, बिना भ्रष्टाचार सरकार चला कर उन्होंने दिखा दिया। रक्षामंत्री कहती हैं, साढ़े चार साल मे कोई आतंकी घटना भी नहीं हुयी है। वित्तमंत्री कहते हैं हमें ग्लोबल यानी वैश्विक अर्थव्यवस्था बनने से कोई रोक  नहीं सकता है। बस यह मत पूछिये कि, लोकपाल क्यों नहीं नियुक्त हुआ, राफेल पर जेपीसी क्यों नहीं बैठी, किसानों के लिये फसल बीमा का लाभ किसे कितना मिला, नीरव मोदी, अपने मेहुलभाई, विजय माल्या आदि आदि वसुधैव कुटुम्बकम के ब्रांड एम्बैसेडर करोड़ो रुपया बैंकों का एनपीए कर के भागे क्यों और पठानकोट, उरी और कश्मीर में होने वाली आतंकी घटनाएं क्या थीं। बस ये सवाल डराते हैं उन्हें। डर केवल गुंडे बदमाशों और भूत प्रेत का ही नही होता है, डर ऐसे सवालों का भी होता है। लोकतंत्र का लबादा ओढ़े तानाशाह सबसे अधिक ऐसे ही सवालों से डरता है। वे अक्सर यह कहते नहीं अघाते हैं कि, साढ़े चार साल में आर्थिक तरक़्क़ी हुयी, जीडीपी बढ़ी है,, लोगों का विकास हुआ, जनता प्रसन्न है,  दुनिया भर में डंका बज रहा है । आदि आदि। तब फिर अमित शाह को डर क्यों लगता है। यह कहाँ से ख्याल आ रहा है कि 2019 में हार गए तो ग़ुलाम हो जाएंगे? क्या वे अपने कार्यकर्ताओं को डरा रहे हैं ? या जीत के प्रति जोश भरने का उनका यह कोई विशेष नुस्खा है ? लेकिन यह कैसा अज़ीब नुस्खा है कि हार जाएंगे तो ग़ुलाम हो जाएंगे?

भारत के 5000 साल के गौरवशाली इतिहास में सिकन्दर से लेकर अंग्रेजों तक अनेक आक्रांता आये। उन्होंने हमें पराजित भी किया। हम पर राज भी किये उन्होनें। और, अंत में वे, या तो विशाल भारतीय समाज मे समा गए या यहां से रुखसत हो गए, पर भारतीय जन मानस उनसे कभी डरा नहीं। डरता तो बहादुरी की इतनी कहानियां हमारा समाज न समेटे होता। यह डर का फलसफा, 1925 के बाद फासिस्ट ताकतों ने अपने स्वार्थ के लिये गढ़ा है । जब डर का भय पैठ जाय तो संसार का कोई भी युद्ध  जीता नहीं जा सकता है। यहां की सैन्य परम्परा में तो मृत्यु का भी भय नहीं रहा है। फिर यह डरा क्यों रहे हैं ? कहीं यह डर अमित शाह और नरेंद्र मोदी का निजी डर तो नहीं है ? हरेन पांड्या, सोहराबुद्दीन, प्रजापति, जज बीएम लोया आदि अन्य ज्ञात अज्ञात हत्याएं, कहीं उसी डर का परिणाम तो नहीं हैं ? हम अक्सर अपना निजी डर समाज पर थोप देते हैं। खुद के डर में लोगों को अपना साझीदार बनाते हैं। लेकिन यह डर अपराधबोध का प्रतिविम्ब है और कुछ नहीं।