गुजरात से यूपी, बिहार और मध्य प्रदेश के मज़दूरों को भगाया गया। गुजरात सरकार दस दिनों बाद जागी है। मीडिया की हालत ये हो गई है कि उसे भनक तक नहीं लगी। राजनीतिक आरोप जो लग रहे हैं उसके पीछे बहुत गेम हो रहा है। कहा कुछ जा रहा है और हो कुछ रहा है। क्या आपको पता है कि गुजरात सरकार ऐसा क़ानून लाने जा रही है जिसके कारण राज्य के उद्योगों को अस्सी फ़ीसदी काम गुजरातियों को दोनों होंगे। इस अस्सी फ़ीसदी में से पचीस फ़ीसदी काम उस ज़िले के लोगों को देना होगा जहाँ उद्योग स्थापित होंगे। अगर ये क़ानून बन गया तो वैसे भी यूपी बिहार के लोगों को गुजरात से बाहर जाना होगा। क्या क़ानून बनाकर वहाँ काम कर रहे मज़दूरों को भगाया जा रहा है?

आप 25 सितंबर का इकोनोमिक टाइम्स देखिए। पीटीआई के हवाले से ख़बर छपी है। इस ख़बर के संदर्भ में अगर गुजरात की घटना को देखेंगे तो बहुत कुछ अलग नज़र आएगा। बक़ायदा मुख्यमंत्री का बयान है कि मैन्यूफ़ैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर में अस्सी फ़ीसदी काम स्थानीय लोगों को देने होंगे। अगर सभी राज्यों ने देखा देखी ये शुरू कर दिया त क्या होगा? क्या यह कानून यूपी बिहार के मज़दूरों को बाहर करने के लिए लाया जा रहा है? फ़र्ज़ किया कि यही नीति दूसरे राज्यों में बनने लगी तब क्या होगा?

ऐसा क्यों हो रहा है इस पर विचार करना चाहिए। नेता जिस विकास का पैकेज बेच रहे थे वो फट गया है। उसका किसी से कुछ लेना-देना नहीं है। चंद लोग ही अमीर हुए। विकास भचक गया है। जो मॉडल सामने बेचा जा रहा है उसमें दम नहीं है। हमें यह समझना होगा। सरकार स्थानीय लोगों को कोई काम नहीं दे पा रही है। मिडिल क्लास के लायक कोई काम नहीं है। तभी यूपी बिहार के मज़दूरों के काम पर डाका डाला जा रहा है। गुजरात के लोगों को भी इस प्रस्तावित क़ानून के नाम पर बेवक़ूफ़ बनाया जा रहा है। उन्हें काम नहीं दे सकते तो दूसरे के काम पर ताला लगाकर एक बहस पैदा की जा रही है। मक़सद वही है। बहस पैदा करना ताकि इस बहस में साइड लेते हुए आदमी वहाँ की राजनीति की साइड लेता रहे। यहाँ क्लिक करके इकोनोमिक टाइम्स का लिंक देखिए

नोट :- यह लेख वरिष्ठ पत्रकार रविश कुमार की फ़ेसबुक वाल से लिया गया है