ठंड के दिन थे, सुबह की 7 बजे थे। कड़कड़ाके की ठंड थी, मेरी बिटिया की स्कूल बस मिस हो गई थी। इसलिए मैं उसे स्कूल छोड़ने जा रहा था । रास्ते में देखता हूँ की मेरा दोस्त अपने तीन साल के बच्चे को शहर के सबसे बड़े और महंगे लेकिन बहुत दूर स्थित स्कूल की बस मैं बैठा रहा था, छोटा बच्चा लगातार रो रहा था और ठंड से ठिठुरता बच्चा लगातार अपनी माँ को याद कर रहा था । यह सब देखकर मेरा मन बहुत व्यथित हो गया था, इसलिए मैंने अपनी गुड़िया को स्कूल छोड़ा और अपने दोस्त से मिलने उसके घर चला गया।

मेरा दोस्त बड़ा व्यापारी है, आज उसके पास बँगला,गाड़ी सबकुछ है, लेकिन उसका बचपन बहुत गरीबी औऱ संघर्ष में बीता है। मैंने उससे बोला यार बच्चे को इतनी दूर वाले स्कूल में क्यो भर्ती कराया। स्कूल तो अपने इलाके में भी अच्छे है वो बोला यार तू तो जानता है अपना बचपन कैसे बीता है, मैं चाहता हूँ कि मेरा बेटा शहर के सबसे बड़े औऱ महंगे स्कूल में पढ़े और सबसे बेहतर शिक्षा हासिल करें और जो मैं नही कर पाया वो सब हासिल करें।

मैंने गुस्से में बोला वाह यार,तूने अपने बच्चे को 2 लाख रु साल वाले और 25 किलोमीटर दूर स्थित स्कूल में नर्सरी में केवल इसलिए भर्ती करा दिया ताकि तेरी शान बनी रहे। तूने एक पल भी सोचा की उस मासूम पर रोज क्या बीत रही होगी, वो रोज तेरे द्वारा थोपी हुई जंग लड़ रहा है और रोज उसे हार भी रहा है तू अपनी बचपन की टीस उसकी खुशीयो को मारकर ले रहा है मेरी बात सुनकर कमरे में एक दम चुप्पी छा गई।

दोस्त बोला बात तो तू सही कह रहा है, लेकिन आज अच्छी शिक्षा औऱ सस्ती शिक्षा कँहा मिलती है। तू भी अपने बच्चों को कौनसे सस्ते स्कूल में पढ़ा रहा है, एक ढंग के स्कूल की नर्सरी औसत फीस 40 से 50 हजार रु है। आज सस्ती अच्छी शिक्षा केवल सपना बनकर रह गया है। उसकी बात सुनकर में सहम सा गया कुछ देर पहले उस पर गुस्सा हो रहा था आज मन ही मन अपने आप पर खीज रहा था।

असल में इस देश को आज सबसे ज्यादा आवश्यकता सस्ती और अच्छी शिक्षा देने वाले संस्थाओं की है। जब इस देश की सरकार 7 साल से शिक्षा नीति नही बना पाती है, तो मुझे उसकी प्राथमिकता पता चल जाती है। 70 साल से इस देश की सरकारों ने शिक्षा के नाम पर केवल धोखा दिया है, आज निजी स्कूलों के नाम पर शिक्षा माफ़िया चल रहे है औऱ सेवा का सबसे बड़ा माध्यम अब विशुद्ध व्यापार बन कर रह गया है।

मैं कोई शिक्षाविद नही हूँ,लेकिन जीतनी भी मेरी समझ है उस हिसाब से प्री-प्रायमरी,प्रायमरी और मिडिल स्कूल की अनुमति एक ही स्कूल को नही दी जाना चाहिए और मिडिल स्कूल तक की शिक्षा सभी निजी और सरकारी स्कूलों में नि:शुल्क होना चाहिए। स्कूल आपके घर से 1 किलोमीटर से दूर नही होना चाहिए और स्कूल का पाठ्यक्रम न्यूनतम होना चाहिए और व्यवहारिक शिक्षा पर सबसे ज्यादा ध्यान देंना चाहिए।

सुझाव और भी दिए जा सकते है, लेकिन क्या सरकारे इस पर सोचेगी क्या सरकारे हमारे बच्चों के बचपन से ऐसे ही खेलेंगी । सरकारें तभी जागेगी जब आप अपने अधिकारों को जानोगे इसलिए जागिये इससे पहले की आपके बच्चों का बचपन उनसे बिछुड़ जाए । आप अपनी प्राथमिकता बदलें और सरकार अपनी प्राथमिकता अपने आप बदल लेगी ।

मिट्टी भी जमा की…. और
खिलौने भी बना कर देखें,

पर जिंदगी कभी ना मुसकुराई
फिर बचपन की तरह….

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Apurva Bhardwaj