“लव जिहाद के आरोप में दो साल की सज़ा” प्रभात ख़बर में जब यह ख़बर पढ़ी तो कई सवाल एक साथ दिमाग़ में आए. लव जिहाद को परिभाषित कब किया गया? इसे भारतीय क़ानून में बतौर अपराध कब शामिल किया गया? और लव जिहाद के लिए सज़ा का प्रावधान कब तय हुआ?

प्रभात ख़बर ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि बक्सर (बिहार) की एक अदालत ने एक व्यक्ति को लव जिहाद का दोषी पाया है और उसे दो साल के कारावास की सज़ा सुनाई है. हमने बक्सर की उस अदालत के उस फ़ैसले को निकलवाया जिसके आधार पर प्रभात ख़बर ने रिपोर्ट बनाई थी

फ़ैसला पढ़ा तो मालूम चला कि जज साहब ने ऐसा कुछ नहीं लिखा था जैसा प्रभात ख़बर ने इस मामले को बताया था. फ़ैसले में साफ़ था कि एक व्यक्ति को दहेज उत्पीड़न का दोषी मानते हुए दो साल की सज़ा हुई थी.

तो फिर प्रभात ख़बर ने ऐसी भ्रामक रिपोर्ट क्यों छापी?

इसका सिर्फ़ एक कारण था कि आरोपित लड़का मुसलमान था और उसकी शादी हिंदू लड़की से हुई थी. बस, इतना होना ही मामले को ‘लव जिहाद’ घोषित करने के लिए प्रभात ख़बर को काफ़ी लगा. तो उन्होंने सीधे-सीधे दहेज के मामले को लव जिहाद बता कर छाप दिया.

जिन लाखों लोगों ने प्रभात ख़बर की रिपोर्ट पढ़ी होगी उन्होंने निश्चित ही माना होगा कि लव जिहाद अब इस स्तर पर होने लगा है कि अदालत भी इसके लिए सज़ा सुनाने लगी है. जबकि वास्तविकता ये है कि आज तक देश की कोई भी जाँच एजेन्सी, कोई भी मंत्रालय, कोई भी विभाग लव जिहाद की पुष्टि नहीं कर सके हैं.

लेकिन प्रभात ख़बर को इससे क्या लेना-देना. उन्हें अपने पूर्वग्रह को रिपोर्ट की शक्ल देनी थी उन्होंने दे दी. उनकी ग़लत और झूठी रिपोर्ट से समाज में कितना ज़हर फैलेगा, ये उनकी चिंता का विषय नहीं है.

हमने जब प्रभात ख़बर के प्रतिनिधि से इस बारे में बात की और उन्हें उनकी ग़लती के बारे में बताया तो भूल सुधारने के बजाय उनका जवाब था, ‘खंडन या माफ़ी तो हम कभी छापते ही नहीं.’

ऐ प्रभात ख़बर, तेरी बेशर्मी को सलाम….