आज लोकसभा के 2014 से 19 तक के कार्यकाल के अंतिम अधिवेशन का अंतिम दिन था और आज ही राफेलसौदा प्रकरण में सीएजी मुख्य लेखा परीक्षक की रिपोर्ट सदन में पेश की गयी। अब यह रपट लोक लेखा समिति के पास जाएगी और वे इसमे मीन मेख निकालेंगे और जो भी होगा सामने आएगा।

सीएजी में रिपोर्ट जाने के पहले ही इस पर विवाद उठ गया है। अक्टूबर 2018 में जब सुप्रीम कोर्ट ने राफेल मामले में दायर तीन याचिकाओं को निस्तारित किया तो यह फैसला दिया कि कीमतों पर कुछ नहीं कहना है। कीमतों के बारे में सीएजी को सभी दस्तावेज दे दिए गए हैं और उन्होंने उसकी समीक्षा कर के रिपोर्ट लोक लेखा समिति को भेज दिया है। अन्य बातें प्रक्रियानुसार हैं।

लोक लेखा समिति के अध्यक्ष नेता विरोधी दल होते हैं तो इस लोक लेखा समीति के अध्यक्ष कांग्रेस के लोकसभा में नेता मल्लिकार्जुन खड़गे हैं। उन्होंने यह प्रतिवाद किया कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला तथ्यों के अनुरूप नहीं है। वे खुद पीएसी के अध्यक्ष हैं और उन्हें यह रिपोर्ट अभी तक नहीं मिली है। सीएजी ने भी प्रतिवाद किया कि उन्होंने अभी कोई ऑडिट नहीं की है।

सरकार ने तुरंत कहा कि यह भूल हो गयी है कि उन्होंने गलत हलफनामा अदालत में दायर कर दिया है, और वे संशोधित हलफनामा दायर करने जा रहें हैं। गलती का कारण टाइपोत्रुटि बताया गया। यह सामान्य भूल नहीं है। अगर यह जानबूझकर की गयी गलती नहीं है तो भी एक गम्भीर लापरवाही है। पर इस लापरवाही पर लापरवाही करने वाले अफसर को क्या दंड दिया गया यह अभी तक पता नहीं है। दण्डित किया भी गया या नहीं यह भी पता नहीं है।

आज जो सीएजी की रिपोर्ट पेश की गयी है, उसमें राफेल के मामले में मसीएजी की रिपोर्ट में मुख्य बातें निम्न है

  • सरकार ने बताया कि यूपीए सरकार की तुलना में सरकार ने 8 फीसदी सस्ते विमान खरीदे हैं।
  • पहले 18 राफेल विमानों की डिलीवरी का कार्यक्रम 126 विमानों के सौदे में प्रस्तावित समय से पांच महीनों जल्दी है।
  • कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा की गई 126-विमान सौदे की तुलना में, भारत नए अनुबंध में भारत विशिष्ट संवर्द्धन के लिए 08 फीसदी पैसा बचाने में कामयाब रहै।
  • वायुसेना ने ASQRs (एयर स्टाफ गुणात्मक आवश्यकताओं) को ठीक से परिभाषित नहीं किया है। जिससे, विक्रेताओं में से कोई भी पूरी तरह से एएसक्यूआर को पूरा नहीं कर सका।
  • खरीद प्रक्रिया के दौरान ASQR को बार-बार बदला गया। तकनीकी और मूल्य मूल्यांकन और प्रतिस्पर्धी निविदा, अधिग्रहण की प्रक्रिया में देरी के मुख्य कारकों में से हैं।
  • तकनीकी मूल्यांकन रिपोर्ट में तकनीकी मूल्यांकन प्रक्रिया की इक्विटी स्थिरता स्पष्ट नहीं थी।
  • मार्च 2015 में रक्षा मंत्रालय की एक टीम ने 126 राफेल सौदे को रद्द करने की सिफारिश करते हुए कहा था कि डसॉल्ट एविएशन सबसे कम बोली लगाने वाला नहीं था और ईएडीएस (यूरोपियन एरोनॉटिकल डिफेंस एंड स्पेस कंपनी) टेंडर आवश्यकताओं के लिए पूरी तरह से खरा नहीं उतर रहा था।
  • यूपीए काल में 126 के विमान सौदे के मुद्दे पर कैग का कहना है कि रक्षा मंत्रालय की टीम ने 2015 में कहा था कि डसॉल्ट एविएशन राफेल के प्रस्ताव को तकनीकी मूल्यांकन चरण में ही खारिज कर दिया जाना चाहिए था क्योंकि यह आरएफपी आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं था।

कैग (नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक) की रिपोर्ट आज जब राज्यसभा को सौंपी गई। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने रिपोर्ट को पक्षपाती बताते हुए खारिज कर दिया है क्योंकि सीएजी राजीव महर्षि तब वित्त सचिव थे जब 2016 में 36 राफेल लड़ाकू जेट विमानों के लिए सौदा किया गया था।

जो प्रतिक्रिया रिपोर्ट की कमियों के बारे मे आयी है, वे इस प्रकार हैं।

  • सीएजी ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, इस एनडीए द्वारा किये गये राफेल सौदे में कोई भी बैंक गारंटी नहीं है।
    इससे दसॉल्ट को लाभ हो रहा है न कि भारत सरकार को।
  • भारतीय समझौता दल ने गारंटी का आकलन किया था जो 574 मिलियन यूरो है। सीएजी के आंकड़ों के अनुसार यह बचत भी इस सौदे का लाभ है।
  • लेकिन दसॉल्ट अगर बैठ गयी तो क्या होगा?
    क्या यह किसी ने सोचा है?
  • रिपोर्ट यह भी है कि हमने कुछ अधिक पैसा अनावश्यक रूप से भी चुकाए हैं जिन्हें कुछ विशेष भारतीय खर्चे के संदर्भ में बताया गया है।
    एयरफोर्स ने इस व्यय का विरोध किया था।
    यह कैसा खर्च है?
  • यह कहते समय कि यह सौदा यूपीए के समय हुये सौदे से सस्ता है, इस तथ्य का आकलन नहीं किया गया है कि यूपीए के सौदे के समय तकनीकी हस्तांतरण एक महत्वपूर्ण शर्त थी और इसका खर्च भी सौदे में शामिल था।
    लेकिन एनडीए ने तकनीक हस्तांतरण की बात ही नहीं की है, तो क्या इसे भी बचत ही मान लिया जाय?
  • एनडीए के सौदे में सबसे विवादित विंदु अनिल अंबानी की नयी कम्पनी जो सौदे के पंद्रह दिन पहले बनी है को दसॉल्ट द्वारा ऑफसेट पार्टनर चुनना है। इस बिंदु पर सीएजी की रिपोर्ट खामोश है।

सीएजी को इस पर टिप्पणी करनी चाहिये थी कि 28 अप्रैल 2015 को ही गठित होने वाली अनिल अंबानी की कम्पनी को जो बिना किसी ज़मीन और इंफ्रास्ट्रक्चर के अभी तक है को कैसे दसॉल्ट ने चुन लिया और सरकार ने कैसे दसॉल्ट के इस निर्णय पर आपत्ति नहीं की?

  • यह बिल्कुल सही है कि दसॉल्ट को ऑफसेट पार्टनर चुनने की आज़ादी थी पर जिसे चुन रहा है उसकी पृष्ठभूमि और आर्थिक स्थिति के बारे में क्या हमारी सरकार द्वारा दसॉल्ट को नहीं बताना चाहिये था?
  • सीएजी को इस पर टिप्पणी करनी चाहिये थी। क्योंकि यह करदाता का धन है किसी सेठ साहूकार का नहीं।

राफेल में सबसे विवादास्पद बिंदु इसकी कीमत को लेकर के है। राफेल की कीमत तो ब्रह्न की तरह हो गयी है। सभी पक्ष इसे अपनी अपनी तरह से इसे व्याख्यायित कर रहे हैं।

  • विदेश राज्यमंत्री बीके सिंह के अनुसार यह सौदा, 40 % सस्ता है। यह बात 2018 में कही गयी है।
  • 2018 में ही अरुण जेटली के अनुसार यह सौदा 20 % सस्ता बताया गया था।
  • 2018 में यह सौदा 9 % सस्ता है, और यह बयान रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण का है।
  • आज 13 फरवरी 2019 को सीएजी की रिपोर्ट कह रही है कि यह सौदा 8% सस्ता है।
  • राहुल गांधी भी अलग अलग समय पर अलग अलग कीमत बता चुके हैं।

इतना कन्फ्यूजन क्यों है ? इस कन्फ्यूजन को, सीएजी की रिपोर्ट ने मौन रहकर इसे और बढ़ा दिया है।

हैरान करने वाली बात यह भी है कि इसके पहले हुए हर रक्षा सौदे की ऑडिट में रक्षा सामग्री की कीमतें भी खुल कर बतायी जाती हैं। पर राफेल मामले में कीमतों का विंदु ही गायब है। कीमतों को संकेताक्षरो से बताया गया था। जबकि 2015 में आयी सीएजी की रिपोर्ट जो रूस से खरीदे गए मिग विमानों और नौसेना के लिये हॉक विमानों के सौदे की ऑडिट के संदर्भ में है, में कीमतें, रुपये और डॉलर दोनों में स्पष्ट रूप से अंकित की गई है।

कीमत के अतिरिक्त निम्न सवाल अभी भी अनुत्तरित हैं।

  • पूरी डील सस्ती है या प्रति भविमान सस्ता है ?
  • यूपीए के राफेलसौदा में सॉवरेन गारंटी क्लॉज़ था हो दसॉल्ट कम्पनी के बैठ जाने पर हमारे पैसे को डूबने से बचाता था यानी उसकी गारंटी फ्रांस सरकार की थी।
  • इस यूपीए की डील में उक्त धन के डूबने से बचाने के लिये सरकार ने क्या एहतियाती कदम उठाए हैं?
  • यूपीए के सौदे में तकनीकी ट्रांसफर की शर्त थी जिसके अनुसार 126 विमानों के समझौते में से 18 तैयार हालत में मिलने थे और शेष 108 एचएएल में बनने थे।
  • लेकिन एनडीए के सौदे में जो 36 विमान तैयार हालत में मिलने हैं वे सबके सब फ्रांस में ही दसाल्ट द्वारा बनाये जाएंगे।
  • तकनीकी हस्तांतरण की बात क्यों छोड़ दी गयी और इसे छोड़ देने से भारत सरकार को क्या लाभ हुआ ?
  • तकनीकी हस्तांतरण से एक लाभ यह होता कि इन जहाजों का मेंटेनेंस एचएएल करता क्योंकि उसे तकनीकी जानकारी हस्तांतरण होने के बाद मिल जाती।
  • पर अब इन जहाज़ों का मेंटेनेंस कौन करेगा और कैसे करेगा जब तकनीकी हस्तांतरण की बात ही नहीं की गयी है तो ?
  • भारतीय समझौता दल के तीन अधिकारियों ने नए समझौते के संबंध में अपना विरोध यानी डिसेंट नोट जारी किया था, सीएजी का इस विंदु पर कोई टिप्पणी नहीं है।
  • एक महीने से कम समय मे नए सौदे पर निर्णय हुआ । सीएजी यह तो कहते हैं कि एक प्रक्रिया चल रही थी। पर वह प्रक्रिया क्या थी, कब से चल रही थी, और कौन कौन उस प्रक्रिया में शामिल था इस पर सीएजी रिपोर्ट में कोई उल्लेख नहीं है।
  • सॉवरेन गारंटी पर कोई बात क्यों नहीं की गयी। इस पर भी सीएजी ने कोई टिप्पणी नहीं की है।
  • इंटेग्रिटी क्लाज़ क्यों हटा दिया गया जो पहले सौदे में था इस सौदे में नहीं है। इस पर भी कोई टिप्पणी नहीं है।
  • एनडीटीवी के रवीश कुमार के ब्लॉग के अनुसार मार्च 2015 में सीएजी ने जब रूस से खरीदे जाने वाले विमान मिग-219 की ऑडिट की थी तब हर पैराग्राफ में पैसा लिखा था. अमरेकी डॉलर में भी लिखा था कि 35 मिलियन डॉलर और भारतीय रुपये में भी लिखा था 3,568 करोड़. इसी तरह मार्च 2016 में समाप्त हुए वर्ष की ऑडिट रिपोर्ट में सीएजी ने साफ-साफ लिखा है कि 24 बी ए ई हॉक एजेटी विमान की खरीद 1982 करोड़ से लेकर 1777 करोड़ लिखा है. बेशक अलग-अलग संदर्भों में दाम लिखा हुआ है, मगर सीएजी ही बताए जब मिग और हाक विमान की खरीद की ऑडिट में आप कीमत खुल कर बताते हैं तो राफेल विमान की ऑडिट में आपने कीमत क्यों नहीं बताई ?
  • रवीश के ही ब्लॉग के अनुसार, मार्च 2015 में राफेल विमान के लिए बनी कमेटी ने अपना रिक्वेस्ट ऑफ प्रपोज़ल वापस ले लिया और 126 राफेल फाइटर विमान के लिए 15 साल से चली आ रही बातचीत रद्द कर दी. उसके चंद दिनों बाद 10 अप्रैल 2015 को पेरिस में एलान होता है फ्रांस और भारत के बीच समझौता होगा। अब यहां सीएजी की रिपोर्ट में यह नहीं बताया जाता है कि कोई महीने भर से भी कम समय में वो कौन सी प्रक्रिया थी, किन प्रक्रिया के तहत पेरिस में एलान से पहले होमवर्क होता है. उसमें कौन सी कमेटी शामिल है. क्या दो सरकारों के बीच बिना होमवर्क या किसी प्रक्रिया के हो सकता है, हम इस सवाल पर बात करेंगे. सीएजी की रिपोर्ट में सिर्फ इतना लिखा है कि अलग से प्रक्रिया चल रही थी कि दास्सों एविएशन से बेहतर शर्तों पर खरीद होगी. वो प्रक्रिया क्या थी, इसका ज़िक्र नहीं मिला।
  • पेरिस में डील के एलान के बाद 12 मई 2015 को इंडियन निगोशिएटिंग टीम का गठन होता है. इसी टीम के तीन सदस्यों के एतराज़ की रिपोर्ट हिन्दू में आई थी. सीएजी की रिपोर्ट में इस टीम के ऐतराज़ का कोई ज़िक्र नहीं है.

अभी तो यह रिपोर्ट आयी है और उसकी विस्तृत समीक्षा होनी अभी शेष है। सीएजी रिपोर्ट पर सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी भी देख लीजिये कि इस रिपोर्ट की कानूनी स्थिति क्या है। एक मुक़दमे की सुनवायी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा था,

” लोकसभा के रूल्स ऑफ प्रोसीजर एंड कंडक्ट इन द बिजनेस के नियम 308 के अंतर्गत लोक लेखा समिति को सीएजी द्वारा ऑडिट की गयी सभी विषयों और विन्दुओं पर निर्णय लेने और सदन में प्रस्तुत करने का अधिकार है।

इस प्रकार यह स्पष्ट है कि सरकारी खजाने के धन का त्रुटिपूर्ण हानि को संसद की समीक्षा से परे नहीं रखा गया है। सीएजी का काम कार्यपालिका द्वारा किये जा रहे लेखा पर नियंत्रण रखना है न कि केवल ऑडिट करना है। सीएजी संसद के प्रति जवाबदेह है। ”

( In addition, it is to be noted that the PAC, under Rule 308 of the rules of procedure and conduct in the business of the Lok Sabha, has the right to decide on all issues audited by the CAG and submit its findings to the Parliament.

Therefore, it is clear that the wrongful loss of monies to the public exchequer cannot be immune to review by the Parliament. The CAG functions as a check to the Executive and not as its official auditor. The CAG is answerable to the Parliament.)

वर्तमान लोकसभा का कार्यकाल 26 मई को समाप्त हो रहा है और अप्रैल मई के चुनाव के बाद नयी लोकसभा गठित होगी। नयी लोकसभा के बाद नयी लोक लेखा समिति का गठन होगा। अब आने वाली लोकसभा में जो भी नेता विरोधी दल होगा वही लोक लेखा समिति का अध्यक्ष होगा और नए चुने जाने वाले सदस्यों में से ही नयी पीएसी का गठन होगा। अतः आगे क्या होगा अभी नहीं कहा जा सकता है।

© विजय शंकर सिंह